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मौलिक कर्तव्य

42वें संशोधन अधिनियम 1976 द्वारा हमारे वर्तमान संविधान के भाग 4 में मौलिक कर्तव्य शामिल किये थे। वर्तमान में अनुच्छेद 51 A के तहत हमारे संविधान में 11 मौलिक कर्तव्य हैं जो कानून द्वारा वैधानिक कर्तव्य हैं और प्रवर्तनीय भी हैं। मौलिक अधिकारों को स्थापित करने के पीछे का उद्देश्य नागरिकों द्वारा अपने मौलिक अधिकारों का आदान-प्रदान कर अपने कर्तव्यों के दायित्वों पर जोर देकर उनका आनंद उठाना था।
Dec 24, 2015 17:07 IST
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42वें संशोधन अधिनियम 1976 द्वारा हमारे वर्तमान संविधान के भाग 4 में मौलिक कर्तव्य शामिल किये थे। वर्तमान में अनुच्छेद 51 A के तहत हमारे संविधान में 11 मौलिक कर्तव्य हैं जो कानून द्वारा वैधानिक कर्तव्य हैं और प्रवर्तनीय भी हैं। मौलिक अधिकारों को स्थापित करने के पीछे का उद्देश्य नागरिकों द्वारा अपने मौलिक अधिकारों का आदान-प्रदान कर अपने कर्तव्यों के दायित्वों पर जोर देकर उनका आनंद उठाना था।

हमारे संविधान में निम्नलिखित कर्तव्य हैं:

A) संविधान का पालन करे और उसके आदर्शों एवं  संस्थाओं, राष्ट्रध्वज तथा राष्ट्रगान का आदर करे

संविधान का पालन करने और इसके आदर्शों एवं संस्थानों, राष्ट्रीय ध्वज और राष्ट्र गान के संदर्भ में- प्रत्येक नागरिक का यह कर्तव्य है कि वह आदर्शों का सम्मान करे जिसमें स्वतंत्रता, न्याय, समानता, भाईचारा और संस्थाएं अर्थात् संस्थान, कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका शामिल है। इसलिए किसी भी अंसंवैधानिक गतिविधियों में लिप्त हुए बिना संविधान की गरिमा बनाए रखना हम सब का कर्तव्य है। संविधान में यह भी उल्लेख किया गया है कि यदि कोई भी नागरिक को राष्ट्रध्वज तथा राष्ट्रगान का अनादर करता है तो संविधान के प्रति वह दंड का भागीदार होगाएक संप्रभु राष्ट्र के नागरिक के रूप संविधान का आदर करना सबका कर्तव्य है।

B) स्वतंत्रता के लिए हमारे राष्ट्रीय स्वाधीनता आंदोलन को प्रेरित करने वाले उच्च आदर्शों का सम्मान करे

भारत के नागरिक को उन महान आदर्शों का ध्यान रखते हुए पालन करना चाहिए जो स्वतंत्रता के लिए हमारे राष्ट्रीय आंदोलन की प्रेरणा का स्त्रोत बने। एक समाज का निर्माण और स्वतंत्रता, समानता, अहिंसा, भाईचारा और विश्व शांति के लिए एक संयुक्त राष्ट्र का निर्माण करना हमारे आदर्श है। यदि भारत के नागरिक इन आर्दशों के प्रति सचेत और प्रतिबद्ध हैं, तो अलगाववादी प्रवृत्तियां कहीं भी कहीं भी जन्म नहीं ले सकती है।

C) भारत की समप्रभुता, एकता और अखंडता की रक्षा करे और अक्षुण्ण बनाए रखे:

यह भारत के सभी नागरिकों के सबसे प्रतिष्ठित राष्ट्रीय दायित्वों में से एक है। भारत में जाति, धर्म, लिंग, भाषा के आधार पर लोगों की विशाल विविधता है। यदि देश की आजादी और एकता पर कोई खतरा उत्पन्न होता है तो तब संयुक्त राष्ट्र की कल्पना करना संभंव नहीं है। इसलिए संप्रभुता लोगों के पास हमेशा रहती हैं। इसे फिर से स्मरित किया जाता है जैसा कि प्रस्ताव में इसका उल्लेख पहले भी किया गया है और मौलिक अधिकारों की धारा 19 (2) के तहत भारत की संप्रभुता और अखंडता के हित में भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के उचित प्रतिबंधों की अनुमति प्रदान की गयी है।

D) देश की रक्षा करे तथा बुलाए जाने पर राष्ट्र की सेवा करे

बाहरी दुश्मनों के खिलाफ खुद की रक्षा करना हमारा एक मौलिक कर्तव्य है। प्रौद्योगिकी और परमाणु शक्तियों में सुधार होने से युद्ध केवल भूमि पर ही नहीं लड़े जा रहें हैं इसलिए सभी नागरिक इसके लिए बाध्य हैं कि कोई भी संदिग्ध तत्व जो भारत में प्रवेश करते हैं, के प्रति जागरूक रहें और जरूरत पड़ने पर स्वयं का बचाव करने के लिए हथियार उठाने को भी तैयार रहें। थल सेना, नौसेना और वायु सेना के अलावा इसमें सभी नागरिकों को शामिल किया गया है।

E) धर्म, भाषा और प्रबंध या वर्ग पर आधारित सभी भेदभाव से परे भारत के लोगों में समरसता और समान बंधुत्व की भावना का निर्माण करें, स्त्रियों के सम्मान के विरूद्ध प्रथाओं का त्याग करें

लोगों के बीच विभिन्न विविधताएं प्रदान की गयी हैं और एक ध्वज और भाईचारे की एक नागरिकता की भावना की उपस्थिति सभी नागरिकों में स्वाभाविक रूप से होनी चाहिए। यह उल्लेख भी किया गया है कि सभी नागरिकों को संकीर्ण सास्कृतिक मतभेदों से उपर उठकर सामूहिक गतिविधि के सभी क्षेत्रों में उत्कृष्टता की दिशा में प्रयास करने की आवश्यकता है।

F) हमारी संस्कृति की गौरवशाली परंपरा का महत्व समझे और उसका परीक्षण करे

हमारी सांस्कृतिक विरासत, सबसे अमीर और समृद्ध विरासतों में से एक है, यह पृथ्वी की विरासत का भी एक हिस्सा है। इसलिए यह हमारा कर्तव्य है कि हमें अतीत से जो भी विरासत में मिला है उसकी रक्षा करें और इसे भविष्य की पीढ़ियों के लिए बनाए रखें। भारत की सभ्यता दुनिया की सबसे प्राचीन सभ्यताओं में से एक है। कला, विज्ञान, साहित्य के प्रति हमारे योगदान को पूरे विश्व में जाना जाता है और यह देश हिंदू धर्म, जैन धर्म और बौद्ध धर्म की भी जन्म भूमि रही है।

G) प्राणिमात्र के लिए दयाभाव रखे तथा प्रकृति पर्यावरण जिसके अंतर्गत झील, वन, नदी और अन्य वन्य जीव हैं, की रक्षा का संवर्धन करे

हमारे देश में प्राकृतिक भंडार और संसाधन हैं इसलिए इनकी रक्षा करना प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है। बढते हुए प्रदूषण और बड़े पैमाने पर हो रही जंगलों की गिरावट से पृथ्वी पर रहने वाली सभी मानव जातियों को भारी नुकसान हो सकता है। बढती हुयी प्राकृतिक आपदाएं इसका प्रमाण भी हैं।  राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांतों के अंतर्गत अनुच्छेद 48 ए के तहत अन्य संवैधानिक प्रावधानों में इसे और अधिक मजबूत बनाया गया है जिसमें यह उल्लेख किया गया है कि राज्य पर्यावरण की रक्षा और इसमें सुधार करेगा तथा जंगलों व अन्य वन्य जीवों का संरक्षण करेगा।  

H) मानववाद, वैज्ञानिक दृष्टिकोण तथा ज्ञानार्जन एवं सुधार की भावना का विकास करे

यह एक विदित हकीकत है कि अपने विकास के लिए लिए यह जरूरी है कि हम दुनिया भर के अनुभवों और घटनाओं से सीख लें। प्रत्येक नागरिक का यह कर्तव्य है कि तेजी से बदलती हुयी दुनिया के साथ सामंजस्य बनाए रखने के लिए वह वैज्ञानिक सोच और भावना को बढावा दें।

I) हिंसा से दूर रहें तथा सार्वजनिक संपति सुरक्षित रखें

यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि एक देश जो पूरी दुनिया में अहिंसा का उपदेश देता है वहां हम समय- समय पर निर्थक हिंसा और सार्वजनिक संपत्ति के नुकसान की घटनाओं के साक्षी बनते हैं। सभी मौलिक कर्तव्यों के उल्लंघनों के बीच यह धारा अभी बाकी है। जब भी कोई हड़ताल या बंद या फिर रैली होती है तो वहाँ उपस्थित भीड़ बसों, इमारतों जैसी सार्वजनिक संपत्तियों को नुकसान पहुंचाने तथा उन्हें लूटने की मानसिकता को विकसित करती है और नागिरक जो संरक्षक हैं वो मूक दर्शक रहते हैं।

J) व्यक्तिगत एवं सामूहिक गतिविधियों के सभी क्षेत्रों में उत्कर्ष की ओर बढने का सतत प्रयास करे जिससे राष्ट्र निरंतर बढते हुए प्रयत्न तथा उपलब्धियों की नयी ऊचाइंयों को छू

एक जिम्मेदार नागरिक होने के रूप में हम जो भी कार्य अपने हाथों में लें वह उत्कृष्ट लक्ष्य को प्राप्त करने की दिशा में आगे बढ़ना चाहिए, जिससे हमारा देश निरंतर उपलब्धियों के शीर्ष स्तर तक पहुंच सके। इस अनुच्छेद में देश को न केवल पुर्नजीवित करने और फिर से संगठित करने की क्षमता है बल्कि इसे उत्कृष्टता के उच्चतम संभव स्तर तक पहुंचाने की क्षमता है।

K) प्रत्येक माता पिता या संरक्षक द्वारा 6 से 14 वर्ष के बच्चों के लिए प्राथमिक शिक्षा प्रदान करना -यह राष्ट्रीय आयोग की सिफारिश थी कि 6 से 14 साल की उम्र के बीच के सभी बच्चों को कानूनी रूप से मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा प्रदान करने के लिए संविधान की कार्यप्रणाली की समीक्षा हो। 86 वां संशोधन अधिनियम, कानूनी रूप से 6 से 14 वर्ष के सभी बच्चों को मुफ्त औऱ अनिवार्य शिक्षा का मौलिक अधिकार प्रदान करता है

मौलिक कर्तव्यों की आलोचना

  • मौलिक कर्तव्यों को आम लोगों द्वारा समझना मुश्किल होता है
  • मौलिक कर्तव्यों की गैर न्यायोचित प्रकृति के कारण नैतिक उपदेशों के रूप में आलोचना
  • लोगों द्वारा सभी का पालन करने के बाद लागू करने की कोई आवश्यकता नहीं है।
  • भाग 4 शामिल करने के बाद मौलिक अधिकारों का मूल्य और महत्व कम हो गया है।
  • सबसे महत्वपूर्ण यह है जिसकी सिफारिश स्वर्ण सिंह समिति ने की थी वे इसमें शामिल नहीं थे, जो इस प्रकार हैं:
  1. संसद के पास कर्तव्यों के अनुपालन नहीं करने की स्थिति में जुर्माना या दंड लगाने की शक्ति है
  2. यदि किसी धारा से ऊपर की सजा दी जाती है तो इस पर किसी भी आधार पर किसी भी न्यायालय में प्रश्न नहीं किया जा सकता है।
  3. करों का भुगतान करने को मौलिक कर्तव्य के रूप में शामिल किया जाना।
  • अन्य महत्वपूर्ण कर्तव्यों में परिवार नियोजन, मतदान आदि शामिल हैं।

इस प्रकार, अंत में यह कहा जा सकता है कि सरकार के प्रय़ास तब तक सफल नहीं हो सकते हैं जब तक देश के नागरिक आम तौर पर सरकार के निर्णय लेने की प्रक्रिया में भाग नहीं लेते। यहाँ तक कि मतदान जैसे अघोषित कर्तव्यों को प्रभावी ढंग से लोगों द्वारा लागू किया जाना चाहिए। सार्वजनिक उत्साही लोगों और नेताओं को स्थानीय समुदाय की समस्याओं में रुचि लेने के लिए आगे आना चाहिए। हर नागरिक में पारिवारिक मूल्यों और शिक्षा के मामले में जिम्मेदार पितृत्व की भावना होनी चाहिए तथा बच्चे के शारीरिक नैतिक विकास को ठीक से पूरा किया जाना चाहिए।