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राजपूत काल: महत्वपूर्ण घटनाक्रम

9वीं और 10वीं शताब्दी के दौरान और सोलहवीं शताब्दी के मध्य तक, राजपूतों ने भारत के विविध क्षेत्रों में महत्वपूर्ण राजनीतिक महत्ता प्राप्त की थी| ये राजपूत राज्य अपनी वीरता की वजह से भारत में मुस्लिम वर्चस्व के ख़िलाफ मुख्य बाधा के रूप में विद्यमान थे| यदि हम रामायण और महाभारत के समय के ऐतिहासिक तथ्यों पर विश्वास करें तो राजपूतों ने पूर्व काल से ही हमेशा अपने वर्चस्व की स्थिति को बनाये रखा था|
Nov 1, 2014 17:31 IST
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9वीं और 10वीं शताब्दी के दौरान और सोलहवीं शताब्दी के मध्य तक, राजपूतों ने भारत के विविध क्षेत्रों में महत्वपूर्ण राजनीतिक महत्ता प्राप्त की थी| ये राजपूत राज्य अपनी वीरता की वजह से भारत में मुस्लिम वर्चस्व के ख़िलाफ मुख्य बाधा के रूप में विद्यमान थे| यदि हम रामायण और महाभारत के समय के ऐतिहासिक तथ्यों पर विश्वास करें तो राजपूतों ने पूर्व काल से ही हमेशा अपने वर्चस्व की स्थिति को बनाये रखा था|  

राजपूत वंश के दौरान सामाजिक और सांस्कृतिक विकास

राजपूतों द्वारा भारत में लड़ी गयी कुछ महत्वपूर्ण लड़ाईयां

राजपूतों द्वारा लड़ी गयी पहली लड़ाई तराईन का प्रथम युद्ध (1191ईस्वी) था| इस युद्ध में, चौहान वंश के शासक  पृथ्वीराज चौहान ने मुस्लिम शासक मुहम्मद गोरी को थानेश्वर के पास तराईन नामक स्थान पर पराजित किया था| लेकिन पुनः अपनी शक्ति को मजबूत करने के बाद मुहम्मद गोरी ने 1192 ईस्वी  में चौहान शासक पृथ्वी राज चौहान को तराईन के द्वितीय युद्ध में पराजित कर दिया था| इसी तरह चन्दावर के युद्ध (1194 ईस्वी) में भी मुहम्मद गोरी ने  राजपूत शासक जयचंद को बुरी तरह से पराजित कर दिया था| खानवा का युद्ध (1527 ईस्वी) में मेवाड़ के राणासांगा और फ़रगना के शासक बाबर के बीच हुआ था, जिसमें राणासांगा  की पराजय हुई थी| 1528 ईस्वी में मेदिनी राय और बाबर के बीच चंदेरी का युद्ध हुआ था, जिसमें बाबर की विजय हुई थी| 1556 ईस्वी में पानीपत के द्वितीय युद्ध राजा हेम चन्द्र विक्रमादित्य और अकबर के बीच हुआ था जिसमें राजा हेम चन्द्र पराजित हुआ था|   

मुगल-राजपूत युद्ध की शुरुआत (1558 ईस्वी) में हुई थी| अकबर जैसे ही सत्ता में आया सर्वप्रथम उसने मेवाड़ को जीतने का प्रयास किया| उस समय मेवाड़ के शासक राणा उदय सिंह थे| अकबर की दिली इच्छा थी की उत्तर-भारत में उसका एकछत्र साम्राज्य कायम हो और चित्तौड़ का किला उसके अधीन हो| 1567 ईस्वी में मुगल सम्राट अकबर नें चित्तौड़ का अभियान किया और किले के बाहर के क्षेत्र पर कब्जा करना शुरू कर दिया| उस समय राणा उदय सिंह के शाही सलाहकारों ने उदय सिंह को चित्तौड़ छोड़ने की सलाह दी और उसे मेवाड़ की पहाड़ियों की तरफ जाने को कहा| युद्ध प्रारंभ हुआ और युद्ध की पूरी जिम्मेदारी उदय सिंह के दो जिम्म्मेदार सेनापरी जयमल और फत्ता नें अपने ऊपर ले ली| इन दो सेनापतियों नें करीब 8000 सिपाहियों के साथ पूरी बहादुरी के साथ मुग़ल सेना का सामना किया| इन दो सेनापतियों की वजह से ही मुग़ल सेना को मेवाड़ को जीतना काफी कठिन रहा और उन्हें नाको चने चबाने पड़े|

हल्दीघाटी का युद्ध (1576 ईस्वी) राजपूत इतिहास में सबसे महत्वपूर्ण घटना के रूप में जाना जाता है| यह युद्ध अकबर और महाराणा प्रताप प्रथम के बीच लड़ा गया था| यह राजपूत काल की सबसे बड़ी विडम्बना है कि मेवाड़ को छोड़कर करीब सभी राजपूत शासक मुग़लों के समक्ष आत्मसमर्पण कर चुके थे| महाराणा प्रताप प्रथम एक शक्तिशाली योद्धा थे| मेवाड के महाराणा उदय सिंह के ज्येष्ठ पुत्र महाराणा प्रताप में आत्मसम्मान व स्वाभिमान कूट कूट कर भरा हुआ था, अतः उन्होने मुगलों की अधीनता स्वीकार ना करते हुए उनसे लोहा लेने की ठानी| उनके प्रिय घोड़े का नाम चेतक था| ऐसा माना जाता हैं की इसी चेतक ने महाराणा प्रताप प्रथम के जीवन को किले की दीवारों को फांदकर बचाया था| किले को फांदने के क्रम में ही उस स्वामिभक्त घोड़े चेतक की मृत्यु हो गयी थी| उस स्थान पर आज एक स्मारक बना हुआ है जिसे चेतक स्मारक के नाम से जाना जाता है|

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