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वाणिज्यिक बैंकों का संचालन

राष्ट्रीयकरण के बाद ग्रामीण क्षेत्रों में बैंक ऋण के सन्दर्भ में जबरदस्त मांग और विस्तार देखा गया.
Sep 1, 2014 17:54 IST
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1. राष्ट्रीयकरण के बाद ग्रामीण क्षेत्रों में बैंक ऋण के सन्दर्भ में जबरदस्त मांग और विस्तार देखा गया. यह वस्तुतः संसाधनों के विविधीकरण और संरचना में उपभेदों के परिणामस्वरुप संभव हुआ था. इस तरह के त्वरित विकास और विविधिकरण नें कार्यक्रमों के निर्धारण में गिरावट का आगाज़ किया था. विशेष तौर पर गरीबी उन्मूलन से जुड़े कार्यक्रमों के सन्दर्भ में व्यापक कमी देखी गयी.
2. जो ग्रामीण क्षेत्रों में शाखाओं की भारी संख्या के उद्घाटन तो हुए लेकिन उनकी पर्याप्त व्यापार की क्षमता नहीं थी. इसके अलावा भारी संख्या में लिए गए ऋण जिनका भुगतान संभव नहीं हो पाया इसकी वजह से भी इन बैंकों को भारी नुक्सान का सामना करना पड़ा.
3. वाणिज्यिक बैंकों ने उधार के सन्दर्भ में सहकारी समितियों द्वारा किये गए भद्दे कार्यों और  भौगोलिक अंतर को समाप्त किया है.
4. वाणिज्यिक बैंकों की वसूली की स्थिति काफी विकट है.
5.  ग्रामीण ऋण- जमा अनुपात का स्तर 1991 के 1.58% की तुलना में 2001 में 0.73% हो गया. इसका अर्थ था की ग्रामीण क्षेत्रों से जुटाए गए ऋण का इस्तेमाल किसी और क्षेत्र में कर दिया गया.  
6. ऋणों के सन्दर्भ में यह परेशानी ना केवल एक वाणिज्यिक बैंक से दुसरे वाणिज्यिक बैंक के बीच है बल्कि वाणिज्यिक बैंकों और सहकारी ऋण संरचना के बीच भी है. दूसरी तरफ सरकारी विभागों ने भी गंभीर आयाम ग्रहण कर लिया है.
7. 1990 के दशक में छोटे और सीमांत किसानों के लिए ऋण संवितरण का कार्य अत्यंत धीमा हो गया था. वैकल्पिक प्रावधानों के अंतर्गत बैंकों को संसाधन उपलब्ध कराये गए. ताकि वे ग्रामीण विकास के सन्दर्भ में ग्रामीण बुनियादी ढांचा विकास फंड में निवेश कर सकें और संसाधनों का निर्माण कर सकें. साथ ही लघु एवं सीमांत किसानों के लिए प्रत्यक्ष वित्त में वृद्धि की दर को कम करने के लिए भारतीय लघु उद्योग विकास बैंक के साथ जमा रखने को प्राथमिकता दी गयी.

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