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विजयनगर साम्राज्य के सम्राट या शासक

दक्षिण भारत में मुस्लिम वर्चस्व को निशाना बनाकर विजयनगर एक ऐसे शक्तिशाली साम्राज्य के रूप में उभर कर सामने आया जिसमें कई महान शासकों ने शासन किया था। 15 वीं शताब्दी के आसपास साम्राज्य में आयी गिरावट को कृष्णदेव राय के नेतृत्व में कंमाडर सलुव नरसिंह देव राय और जनरल तुलुव नरस नायक द्वारा फिर से संगठित किया गया। साम्राज्य का पतन तब शुरू हुआ जब उसे उत्तरी गठबंधन के क्रोध का सामना करना पड़ा था। साम्राज्य के अंतिम शासक, श्रीरंग प्रथम और वेंकट द्वितीय थे जिनके उत्तराधिकारी राम देव राय और वेंकट तृतीय तब तक बने रहे जब तक सामंतों ने अपनी स्वतंत्रता की घोषणा नहीं की थी।
Sep 25, 2015 16:40 IST
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साम्राज्य के इतिहास, विकास, वास्तु कृतियों और नवाचारों के बारे में अधिकांश जानकारी विदेशी यात्रियों के माध्यम से मिलती है। विजयनगर साम्राज्य की उत्पत्ति का वर्णन इतिहास के विभिन्न संस्करणों में किया गया है, कई इतिहासकारों का मत है कि विजयनगर साम्राज्य की स्थापना बुक्का राय प्रथम द्वारा की गयी थी जो कन्नड़ (होयसाल साम्राज्य के सेना कमांडर) थे जबकि अन्य का मानना है कि ये शासक तेलगू मूल के थे जिनका काकतीय साम्राज्य (अपने पतन के आसपास होयसाल साम्राज्य के उत्तरी भाग के नियंत्रक) के साथ संपर्क रहा था।

हालांकि इतिहासकारों का एकमत से मानना है कि दक्षिणी भारत में मुस्लिम प्रभाव से लड़ने के मकसद के साथ साम्राज्य के संस्थापको को एक श्रृंगेरी संत विद्यारण्य का समर्थन प्राप्त था क्योंकि ये मुस्लिम बार-बार दक्कन के हिंदू राज्यों पर हमला कर वहां के शासकों को पराजित कर रहे थे। मुस्लिम राज  में केवल एक ही साम्राज्य “होसयाल” शेष रह गया था। होयसाल साम्राज्य के राजा की मौत के बाद इसका विजयनगर साम्राज्य में विलय हो गया था जो 14 वीं शताब्दी से पहले एक शक्तिशाली साम्राज्य के रूप में उभर कर सामने आया था।

हरिहर प्रथम को पूर्व पश्चिम समुद्रधीश्वर (पूर्वी और पश्चिमी समुद्र का प्रमुख) के रूप में जाना जाता था जिसने साम्राज्य की मजबूत नींव रखी थी और तुंगभद्रा नदी के दक्षिण में चारों ओर प्रमुख क्षेत्रों पर अपना शासन मजबूत कर लिया था। बुक्का राय प्रथम ने आर्कोट, कोडावीडु के रेड्डी बंधु,  मदुरै के सुल्तान प्रमुखों को हराकर न केवल अपने साम्राज्य का पश्चिम में बल्कि तुंगभंद्रा- कृष्णा नदी के उत्तर तक विस्तार किया तथा उसका उत्तराधिकारी बना। अनेगोंडी (वर्तमान में कर्नाटक) में साम्राज्य की राजधानी स्थापित की गयी जिसे बाद में विजयनगर स्थानांतरित कर दिया गया, जहां से साम्राज्य को इसका नाम प्राप्त हुआ था।

अपनी राजसी क्षमता के साथ साम्राज्य प्रमुख रूप से दक्षिणी भारत तक फैल गया था जिसका उत्तराधिकारी हरिहर द्वितीय (बुक्का राय प्रथम का दूसरा पुत्र) था जिसने आगे चलकर अपनी साम्राज्यवादी शक्ति का पूरे दक्षिण क्षेत्र में विस्तार किया। इसके बाद साम्राज्य को देव राय प्रथम द्वारा संघटित किया गया जिसने ओड़िशा के गजपतियों को परास्त किया और साम्राज्य की सिंचाई और दुर्ग निर्माण के प्रमुख कार्यों को क्रियान्वायित किया। तत्पश्चात देव राय द्वितीय गद्दी पर आसीन हुआ जिसे संगम राजवंश का सबसे शक्तिशाली और सफल शासक के रूप में जाना जाता है। सामंती शासन की वजह आंतरिक अस्थिरता की लड़ाई रही थी। उसने श्रीलंका द्वीप पर भी आक्रमण किया और बर्मा साम्राज्य पर अपना आधिपत्य स्थापित किया।

15 वीं शताब्दी के आसपास साम्राज्य में गिरावट तब तक दर्ज की गयी जब तक कंमाडर सलुवा नरसिंह देव राय और जनरल तुलुव नरस नायक नें क्रमश: 1485 और 1491 में साम्राज्य की ताकत मजबूत करने के ज्यादा प्रयास नहीं किये थे । अंत में साम्राज्य की बागडोर कृष्ण देव राय (तुलुव नरस नायक का पुत्र) के हाथों में आ गयी जिसने विद्रोही सरदारों से युद्ध किया और डेक्कन सल्तनत आक्रमणकारियों को हराकर साम्राज्य को मजबूती प्रदान की। कृष्णदेव राय के शासन में साम्राज्य अपने शिखर पर पहुंच गया था और उसने दक्षिण में अपने सभी अधीनस्थों पर सफल नियंत्रण बनाए रखा था। अपने शासन के दौरान उसने कई स्थापत्य स्मारकों के निर्माण निर्दिष्ट कर कई निर्माण कार्य पूरे भी किये थे।

अच्युत देव राय (कृष्णदेव राय का छोटे भाई) उसका उत्तराधिकारी बना और बाद में उसकी जगह 1529 में सदाशिव राय ने ली थी जबकि वास्तविक शक्ति आलिया राम राय (कृष्णदेव राय का दामाद) के हाथों में निहित थी जिसने अंततः धोखाधड़ी और फूट का फायदा उठाकर शक्ति अपने हाथों में ले ली थी और उत्तर में राजनैतिक प्रभुत्व बढ़ाने के लिए उसने बीजापुर, बरार, गोलकुंडा, अहमदनगर और बीदर की सल्तनत के बीच अशांति पैदा कर दी। कुछ सल्तनतों ने उत्तर में उसके खिलाफ एक गठबंधन का गठन कर दिया और जनवरी 1565 में विजयनगर की सेनाओं के खिलाफ भिड़ गये। विजयनगर विजयी होकर उभरा जबकि आलिया राम राय को कैद कर मौत के घाट उतार दिया गया। इससे विजयनगर साम्राज्य में साधारण सैनिकों के ऊपर अशांति और भ्रम की स्थिति उत्पन्न हो गयी और सल्तनतों  ने उन खंडहरों में अपनी सेना में कटौती कर दी जिसे वह कभी हासिल नहीं कर सके थे। विजयनगर में एकमात्र जीवित कंमाडर तिरुमाला देव राय (राम राय का छोटा भाई) ने एक विशाल खजाने की राशि के साथ साम्राज्य छोड़ दिया।

साम्राज्य में धीरे धीरे गिरावट आने लगी थी जबकि पुर्तगालीयों के साथ व्यापार जारी था और अंग्रजों को मद्रास की स्थापना के लिए एक जमीन आवंटित कर दी गयी थी। श्रीरंग प्रथम (तिरुमाला देव राय का पुत्र) और वेंकट द्वितीय विजयनगर साम्राज्य के अंतिम शासक थे। साम्राज्य शासन के उत्तराधिकारी राम देव राय और वेंकट तृतीय द्वारा एक दशक के लिए विस्तारित कर दिया गया था जिसके बाद साम्राज्य बीजापुर और गोलकुंडा की सल्तनत के हाथों में आ गया। विजयनगर साम्राज्य के सामंतों ने खुद को स्वतंत्र घोषित कर दिया था और इसका असर 18 वीं सदी तक दक्षिण भारत के इतिहास पर पड़ा। टीपू सुल्तान की मृत्यु के बाद 1799 में मैसूर राज्य ब्रिटिश राज के अधीन आ गया था लेकिन भारत की आजादी तक यह एक राजसी राज्य बना रहा था।