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सहकारी समितियां

सहकारी समितियां स्वैच्छिक सहयोग का एक रूप हैं| अनुच्छेद 19 के अनुसार सहकारी समितियों का गठन करना एक मूल अधिकार है और नीति निर्देशक तत्वों का अनुच्छेद 43(ब) सहकारी समितियों के विकास को बढावा देता है| सहकारी समिति व्यक्तियों की एक ऐसी स्वायत्त संस्था है जो संयुक्त स्वामित्व वाले और लोकतांत्रिक आधार पर नियंत्रित उद्यम के जरिए अपनी समान्य, आर्थिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए स्वेच्छा से एकजुट होते हैं।
Dec 30, 2015 10:04 IST
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सहकारी समितियों का मुख्य उद्देश्य अपने सदस्यों को सेवाएं प्रदान करना है| यह एक तरह का व्यापार है जिसमें समान वर्ग और समान व्यवसाय के व्यक्ति साझे लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए एकजुट हो जाते हैं|

संवैधानिक प्रावधान

अनुच्छेद 19 के अनुसार सहकारी समितियों का गठन करना एक मूल अधिकार है और नीति निर्देशक तत्वों का अनुच्छेद 43(ब) सहकारी समितियों के बढावा देने की व्यवस्था करता है और कहता है कि राज्य सहकारी समितियों के स्वैच्छिक गठन,स्वायत्त कार्यप्रणाली , लोकतान्त्रिक नियंत्रण और व्यावसायिक प्रबंधन को बढ़ावा देने का प्रयास करेगा|

  • 243ZH में परिभाषा दी गयी है
  • 243ZI में सहकारी समितियों के समावेशन का वर्णन है
  • 243ZJ में बोर्ड के सदस्यों की संख्या तथा उनके कार्यकाल और इसके कार्यालयी कर्मचारियों का वर्णन है
  • 243ZK में बोर्ड सदस्यों के निर्वाचन का वर्णन है
  • 243ZL में बोर्ड के प्रतिबंधों व स्थगनों तथा अंतरिम प्रबंधन का वर्णन है
  • 243ZM में समितियों के लेखा और खातों का वर्णन है
  • 243ZN में  आम बैठक बुलाने का वर्णन है
  • 243ZO में सदस्य के जानकारी प्राप्त करने के अधिकार का वर्णन है
  • 243ZP में लाभों का वर्णन है
  • 243ZQ में अपराधों और दंडों का वर्णन है
  • 243ZR बहु-राज्यीय सहकारी समितियों पर लागू होता है
  • 243ZS संघशासित क्षेत्रों पर लागू होता है
  • 243ZT वर्त्तमान कानूनों के लागू रहने से सम्बंधित है

हकारिता की स्थिति का विश्लेषण और उसका कार्यान्वयन

विकासशील देश होने के कारण, भारत में प्रारंभ से सहकारी समितियां प्रचलित रही थी| सहकारी समितियां भारत के ग्रामीण विकास का कारण और परिणाम दोनों है | वर्त्तमान में भारत में 5 लाख से भी ग्रामीण सहकारी समितियां उपस्थित हैं| अब वे, सदस्यों की संख्या के मामले में,व्यवसायिक लेन-देन के मामले में और अपने सदस्यों के सामाजिक-आर्थिक कल्याण में योगदान के मामले में भारत की ग्रामीण अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण स्थान रखती हैं| भारत में ग्रामीण विकास सहकारी समितियों की सफलता पर बहुत अधिक निर्भर रहा है| उन्होंने कुछ क्षेत्रों और स्थानों में तो अच्छा प्रदर्शन किया है लेकिन अन्य स्थानों पर वे अच्छा प्रदर्शन नहीं कर पायीं| इनका विश्लेषण निम्न बिन्दुओं के माध्यम से किया जा सकता है:

  • भारत में अधिकतर सहकारी समितियां लघु स्तरीय हैं और यहाँ तक कि जो बड़ी समितियां है वे भी जब शुरू हुई थीं तो लघु स्तरीय ही थीं|
  • लघु स्तरीय सहकारी समितियों का नेतृत्व प्रबंधकों और सचिव स्तर के अधिकारियों द्वारा किया जाता है और अन्य सदस्य सहकारी समितियों के रोजमर्रा के कार्य देखते हैं|
  • अधिकतर सहकारी समितियों में अनुशासन और पाबन्दी का अभाव देखा गया है|
  • सहकारी समितियों में उचित स्वच्छता और आधारभूत अवसंरचना का अभाव है|
  • कार्य दक्षता और मानक प्रक्रिया भी सामान्य स्तर से भी काफी निम्न है|
  • भारत में सहकारी समितियों की कार्यप्रणाली से सम्बंधित अंतिम निर्णय अध्यक्ष और प्रबंधकों द्वारा लिए जाते हैं|
  • इसी तरह के अवरोध बड़ी सहकारी समितियों में भी स्थानीय नेताओं द्वारा पैदा किये जाते हैं|
  • कई बार इन सहकारी समितियों में आवश्यकता से अधिक कर्मचारी पाए जाते हैं ताकि राजनीतिज्ञों द्वारा निर्वाचन लाभ प्राप्त किया जा सके |
  • कुशल व्यक्ति तक को कम वेतन दिया जाता है और इसीलिए इनकी दक्षता क्रमशः घटती जा रही है|
  • बोर्ड और प्रबंधकों के बीच के सम्बन्ध बेहतर नहीं हैं|
  • पुरूस्कार प्रदर्शन पर आधारित नहीं है|
  • कार्य करने की परिस्थितियाँ अत्यंत ख़राब हैं|