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सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) का अवलोकन

सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) का अर्थ सस्ती कीमतों पर खाद्य और खाद्यान्न वितरण के प्रबंधन की व्यवस्था करना है। गेहूं, चावल, चीनी और मिट्टी के तेल जैसे प्रमुख खाद्यान्नों को इस योजना के माध्यम से सार्वजनिक वितरण की दुकानों द्वारा पूरे देश में पहुंचाया जाता है। इस योजना का संचालन उपभोक्ता मामलों, खाद्य और सार्वजनिक वितरण के मंत्रालय द्वारा किया जाता है। इस योजना का मुख्य मकसद सस्ती दरों पर देश के कमजोर वर्ग को खाद्यान्न उपलब्ध कराना है।
Mar 23, 2016 13:59 IST
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सार्वजनिक वितरण प्रणाली का अर्थ सस्ती कीमतों पर खाद्य और खाद्यान्न वितरण के प्रबंधन की व्यवस्था करना है। गेहूं, चावल, चीनी और मिट्टी के तेल जैसे प्रमुख खाद्यान्नों को इस योजना के माध्यम से सार्वजनिक वितरण की दुकानों द्वारा पूरे देश में पहुंचाया जाता है। इस योजना का संचालन उपभोक्ता मामलों, खाद्य और सार्वजनिक वितरण के मंत्रालय द्वारा किया जाता है। इस योजना का मुख्य मकसद सस्ती दरों पर देश के कमजोर वर्ग को खाद्यान्न उपलब्ध कराना है।

सार्वजनिक वितरण प्रणाली के उद्देश्य और विस्तार

  • भारत में सार्वजनिक वितरण प्रणाली का मूल उद्देश्य उपभोक्ताओं को सस्ते और रियायती कीमतों पर आवश्यक उपभोग की वस्तुएं प्रदान करना है तांकि उन्हें वस्तुओं की बढती हुई कीमतों के प्रभाव से बचाया जा सके और जनसंख्या के न्यूनतम पोषण की स्थिति को भी बनाए रखा जा सके। इस प्रणाली को चलाने के लिए सरकार खरीद मूल्य पर व्यापारियों/ मिलों और उत्पादकों के साथ बाजार का एक बिक्री योग्य अधिशेष खरीद लेती है। इस प्रकार अनाज (मुख्यत: गेहूं और चावल) को खरीदकर इसे ग्राहकों में वितरित करने के लिए उचित राशन दुकानों और / या बफर स्टॉक के एक नेटवर्क के माध्यम से उपभोक्ताओं को वितरित किया जाता है। खाद्यान्न के अलावा, भारत में सार्वजनिक वितरण प्रणाली में खाद्य तेल, चीनी, कोयला, मिट्टी के तेल और कपड़े का भी वितरण किया जाता है। भारत में सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) में वितरित की जाने वाली वस्तुओं में सबसे महत्वपूर्ण वस्तुएं चावल, गेहूं, चीनी और मिट्टी का तेल है।
  • भारत में सार्वजनिक वितरण प्रणाली पूरी आबादी को कवर करती है, जिसका यह अर्थ नहीं है कि इसका प्रत्यक्ष लक्ष्य कामकाजी लोग हैं। राशन कार्ड उन सभी लोगों को जारी किए जाते हैं जिनके पास विश्वसनीय आवासीय पता हो।
  • पीडीएस का सालाना व्यय लगभग तीस हजार करोड़ रुपये से अधिक का है जिसमें लगभग 160 लाख परिवार आते हैं और यह शायद दुनिया में अपनी तरह की वितरण वाला सबसे बड़ा नेटवर्क है।
  • सार्वजनिक वितरण प्रणाली के लिए खाद्यान्न उपलब्ध कराने वाली मुख्य एजेंसी भारतीय खाद्य निगम (FCI)  की स्थापना 1965 में हुई थी। निगम का प्राथमिक कार्य अनाजों और अन्य खाद्य पदार्थों की खरीद, ब्रिकी, भंडारण, आंदोलन, सप्लाई, वितरण करना है। इसका मुख्य मकसद सुनिश्चत कराना है कि एक तरफ किसान को उसकी उपज का सही मूल्य मिल सके है और दूसरी तरफ उपभोक्ताओं को भारत सरकार द्वारा तयशुदा कीमतों पर केंद्रीय मूल्यों पर खाद्यान्न मिल सके।

खाद्य सुरक्षा व्यवस्था में खामियां

भारत में सार्वजनिक वितरण प्रणाली की विभिन्न मोर्चों पर आलोचना की गई है। मुख्य आलोचनाएं इस प्रकार हैं:

1. सार्वजनिक वितरण प्रणाली से गरीबों के लिए सीमित लाभ: कई अध्ययनों से यह पता चलता है कि ग्रामीण क्षेत्रों में गरीबों को पीडीएस से ज्यादा फायदा नहीं हुआ है जिस कारण उन्हें खुले बाजार पर अधिकर निर्भर रहना पडता है जहां अधिकांश वस्तुओं की कीमतें सार्वजनिक वितरण प्रणाली  तुलनामें बहुत अधिक होती हैं। "पीडीएस के माध्यम से सबसे गरीब 20 प्रतिशत परिवारों तक ही अनाज पहुंच पाता है जो बहुत ही कम है"। सभी राज्यों में खर्च होने वाले एक रूपये में से केवल 22 पैसे ही गरीबों तक पहुँचते हैं। केवल गोवा, दमन और दीव में ही 1 रूपये में से 28 पैसे गरीबों तक पहुँचते हैं।

2. पीडीएस लाभ में क्षेत्रीय विषमताएं: सार्वजनिक वितरण प्रणाली के लाभ के वितरण में काफी क्षेत्रीय असमानताएं हैं। उदाहरण के लिए, 1995 में, चार दक्षिणी राज्य, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, केरल और तमिलनाडु के पास देश के कुल खाद्यान्न का लगभग आधा हिस्सा (48.7 फीसदी) वितरित हुआ था जबकि 1993-94 में पूरे देश की तुलना में इन राज्यों में गरीबी रेखा से नीचे की आबादी सिर्फ 18.4 फीसदी थी। इसकी तुलना में, चार उत्तर भारतीय राज्यों, बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान, उत्तर प्रदेश और ओडिशा (या बीमारू राज्य) में 1993-94 में 47.6 फीसदी से ज्यादा की जनसंख्या गरीबी रेखा से नीचे की थी जिनको सार्वजनिक वितरण प्रणाली में अखिल भारतीय स्तर पर केवल 10.4 फीसदी अनाज प्रदान किया गया था।

3. सिर्फ शहरी लोगों तक पहुच: अधिकांश अर्थशास्त्रियों ने यह पाया है कि पीडीएस योजना लंबे समय से अभी भी शहरी क्षेत्रों तक ही सीमीत है, जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में इसकी पहुंच अभी भी बहुत अपर्याप्त है।

4. खाद्य सब्सिडी का बोझ: भारत में सार्वजनिक वितरण प्रणाली में अत्यधिक सब्सिडी अथवा छूट दी जाती है और इससे सरकार पर एक काफी राजकोषीय बोझ पड़ता है। सन1980-81 के 662 करोड़ रुपये की खाद्य सब्सिडी 1991-92 में बढ़कर 2,850 करोड़ रुपये हो गई। 2010-11 में यह 62.930 करोड़ रुपये थी और वर्ष 2011-12 में 72,823 करोड़ रुपये हो गई।

5. संचालन में असक्षमता: भारत सरकार के औद्योगिक लागत एवं मूल्य ब्यूरो (BICP) और कुछ शोधकर्ताओं ने यह पाया कि भारतीय खाद्य निगम के संचालन में कई अक्षमतांए हैं। खाद्यान्न के संचालन की आर्थिक लागत और 'अन्य लागतें' (जिसमें आकस्मिक खरीद, वितरण लागत और भाड़े की लागत शामिल है) खरीद मूल्य में वृद्धि के कारण बढ़ रही हैं।

6. पीडीएस के परिणामस्वरूप कीमतों में वृद्धि: कुछ अर्थशास्त्रियों ने कहा है कि सार्वजनिक वितरण प्रणाली का संचालन ही वास्तविक रूप से चौतरफा मूल्य वृद्धि का कारण है। यही कारण है कि हर साल सरकार द्वारा खाद्यान्न की बड़ी खरीद वास्तव में खुले बाजार में शुद्ध मात्रा की उपलब्धता को कम कर देती है।

7. पीडीएस में धांधली: सार्वजनिक वितरण प्रणाली की एक और आलोचना प्रणाली में लीकेज से संबंधित है जो परिवहन और भंडारण तथा खुले बाजार के डायवर्जन के रूप में होते हैं। लीकेज का प्रमुख हिस्सा भ्रष्टाचार है जिसके कारण खाद्यान्न खुले बाजार में पहुंचता है न कि उन लोगो तक जिनके लिए यह भेजा गया था ।

सार्वजनिक वितरण प्रणाली का अर्थ सस्ती कीमतों पर खाद्य और खाद्यान्न वितरण के प्रबंधन की व्यवस्था करना है। गेहूं, चावल, चीनी और मिट्टी के तेल जैसे प्रमुख खाद्यान्नों को इस योजना के माध्यम से सार्वजनिक वितरण की दुकानों द्वारा पूरे देश में पहुंचाया जाता है। इस योजना का संचालन उपभोक्ता मामलों, खाद्य और सार्वजनिक वितरण के मंत्रालय द्वारा किया जाता है। इस योजना का मुख्य मकसद सस्ती दरों पर देश के कमजोर वर्ग को खाद्यान्न उपलब्ध कराना है।

सार्वजनिक वितरण प्रणाली के उद्देश्य और विस्तार

  • भारत में सार्वजनिक वितरण प्रणाली का मूल उद्देश्य उपभोक्ताओं को सस्ते और रियायती कीमतों पर आवश्यक उपभोग की वस्तुएं प्रदान करना है तांकि उन्हें वस्तुओं की बढती हुई कीमतों के प्रभाव से बचाया जा सके और जनसंख्या के न्यूनतम पोषण की स्थिति को भी बनाए रखा जा सके। इस प्रणाली को चलाने के लिए सरकार खरीद मूल्य पर व्यापारियों/ मिलों और उत्पादकों के साथ बाजार का एक बिक्री योग्य अधिशेष खरीद लेती है। इस प्रकार अनाज (मुख्यत: गेहूं और चावल) को खरीदकर इसे ग्राहकों में वितरित करने के लिए उचित राशन दुकानों और / या बफर स्टॉक के एक नेटवर्क के माध्यम से उपभोक्ताओं को वितरित किया जाता है। खाद्यान्न के अलावा, भारत में सार्वजनिक वितरण प्रणाली में खाद्य तेल, चीनी, कोयला, मिट्टी के तेल और कपड़े का भी वितरण किया जाता है। भारत में सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) में वितरित की जाने वाली वस्तुओं में सबसे महत्वपूर्ण वस्तुएं चावल, गेहूं, चीनी और मिट्टी का तेल है।
  • भारत में सार्वजनिक वितरण प्रणाली पूरी आबादी को कवर करती है, जिसका यह अर्थ नहीं है कि इसका प्रत्यक्ष लक्ष्य कामकाजी लोग हैं। राशन कार्ड उन सभी लोगों को जारी किए जाते हैं जिनके पास विश्वसनीय आवासीय पता हो।
  • पीडीएस का सालाना व्यय लगभग तीस हजार करोड़ रुपये से अधिक का है जिसमें लगभग 160 लाख परिवार आते हैं और यह शायद दुनिया में अपनी तरह की वितरण वाला सबसे बड़ा नेटवर्क है।
  • सार्वजनिक वितरण प्रणाली के लिए खाद्यान्न उपलब्ध कराने वाली मुख्य एजेंसी भारतीय खाद्य निगम (FCI)  की स्थापना 1965 में हुई थी। निगम का प्राथमिक कार्य अनाजों और अन्य खाद्य पदार्थों की खरीद, ब्रिकी, भंडारण, आंदोलन, सप्लाई, वितरण करना है। इसका मुख्य मकसद सुनिश्चत कराना है कि एक तरफ किसान को उसकी उपज का सही मूल्य मिल सके है और दूसरी तरफ उपभोक्ताओं को भारत सरकार द्वारा तयशुदा कीमतों पर केंद्रीय मूल्यों पर खाद्यान्न मिल सके।

खाद्य सुरक्षा व्यवस्था में खामियां

भारत में सार्वजनिक वितरण प्रणाली की विभिन्न मोर्चों पर आलोचना की गई है। मुख्य आलोचनाएं इस प्रकार हैं:

1.       सार्वजनिक वितरण प्रणाली से गरीबों के लिए सीमित लाभ: कई अध्ययनों से यह पता चलता है कि ग्रामीण क्षेत्रों में गरीबों को पीडीएस से ज्यादा फायदा नहीं हुआ है जिस कारण उन्हें खुले बाजार पर अधिकर निर्भर रहना पडता है जहां अधिकांश वस्तुओं की कीमतें सार्वजनिक वितरण प्रणाली  तुलनामें बहुत अधिक होती हैं। "पीडीएस के माध्यम से सबसे गरीब 20 प्रतिशत परिवारों तक ही अनाज पहुंच पाता है जो बहुत ही कम है"। सभी राज्यों में खर्च होने वाले एक रूपये में से केवल 22 पैसे ही गरीबों तक पहुँचते हैं। केवल गोवा, दमन और दीव में ही 1 रूपये में से 28 पैसे गरीबों तक पहुँचते हैं।

 

 

2.       पीडीएस लाभ में क्षेत्रीय विषमताएं: सार्वजनिक वितरण प्रणाली के लाभ के वितरण में काफी क्षेत्रीय असमानताएं हैं। उदाहरण के लिए, 1995 में, चार दक्षिणी राज्य, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, केरल और तमिलनाडु के पास देश के कुल खाद्यान्न का लगभग आधा हिस्सा (48.7 फीसदी) वितरित हुआ था जबकि 1993-94 में पूरे देश की तुलना में इन राज्यों में गरीबी रेखा से नीचे की आबादी सिर्फ 18.4 फीसदी थी। इसकी तुलना में, चार उत्तर भारतीय राज्यों, बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान, उत्तर प्रदेश और ओडिशा (या बीमारू राज्य) में 1993-94 में 47.6 फीसदी से ज्यादा की जनसंख्या गरीबी रेखा से नीचे की थी जिनको सार्वजनिक वितरण प्रणाली में अखिल भारतीय स्तर पर केवल 10.4 फीसदी अनाज प्रदान किया गया था।

 

3.       सिर्फ शहरी लोगों तक पहुच: अधिकांश अर्थशास्त्रियों ने यह पाया है कि पीडीएस योजना लंबे समय से अभी भी शहरी क्षेत्रों तक ही सीमीत है, जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में इसकी पहुंच अभी भी बहुत अपर्याप्त है।

 

4.       खाद्य सब्सिडी का बोझ: भारत में सार्वजनिक वितरण प्रणाली में अत्यधिक सब्सिडी अथवा छूट दी जाती है और इससे सरकार पर एक काफी राजकोषीय बोझ पड़ता है। सन1980-81 के 662 करोड़ रुपये की खाद्य सब्सिडी 1991-92 में बढ़कर 2,850 करोड़ रुपये हो गई। 2010-11 में यह 62.930 करोड़ रुपये थी और वर्ष 2011-12 में 72,823 करोड़ रुपये हो गई।

 

5.       संचालन में असक्षमता: भारत सरकार के औद्योगिक लागत एवं मूल्य ब्यूरो (BICP) और कुछ शोधकर्ताओं ने यह पाया कि भारतीय खाद्य निगम के संचालन में कई अक्षमतांए हैं। खाद्यान्न के संचालन की आर्थिक लागत और 'अन्य लागतें' (जिसमें आकस्मिक खरीद, वितरण लागत और भाड़े की लागत शामिल है) खरीद मूल्य में वृद्धि के कारण बढ़ रही हैं।

 

6.       पीडीएस के परिणामस्वरूप कीमतों में वृद्धि: कुछ अर्थशास्त्रियों ने कहा है कि सार्वजनिक वितरण प्रणाली का संचालन ही वास्तविक रूप से चौतरफा मूल्य वृद्धि का कारण है। यही कारण है कि हर साल सरकार द्वारा खाद्यान्न की बड़ी खरीद वास्तव में खुले बाजार में शुद्ध मात्रा की उपलब्धता को कम कर देती है।

 

7.       पीडीएस में धांधली: सार्वजनिक वितरण प्रणाली की एक और आलोचना प्रणाली में लीकेज से संबंधित है जो परिवहन और भंडारण तथा खुले बाजार के डायवर्जन के रूप में होते हैं। लीकेज का प्रमुख हिस्सा भ्रष्टाचार है जिसके कारण खाद्यान्न खुले बाजार में पहुंचता है न कि उन लोगो तक जिनके लिए यह भेजा गया था ।