योग विचारधारा: प्राचीन भारतीय साहित्य दर्शन

क्या आप जानते हैं कि योग शब्द के दो अर्थ हैं: पहला जोड़ और दूसरा समाधि| यानी स्वयं से आप जब तक नहीं जुड़ेंगे तब तक समाधि तक पहुँचना कठिन होगा| देखा जाए तो योग एक प्रकार का विज्ञान है. यह व्यक्ति के सभी पहलुओं पर काम करता है चाहे भौतिक हो, मानसिक हो, भावनात्मक, आत्मिक या अध्यात्मिक हो. इसे ऐसे समझा जा सकता है कि दो मुख्य सत्ताओं का समन्वय ही योग विचारधारा का शाब्दिक अर्थ है और योग शब्द की उत्पत्ति संस्कृत मूल यूजा (YUJA) जिसका अर्थ है एक-दुसरे को जोड़ना या एकजुट करना, से हुई है | मानव यौगिक तकनीकों के शारीरिक प्रयोग तथा ध्यान का प्रयोग कर मुक्ति को प्राप्त कर सकता है और इस तरह पुरुष प्रकृति से पृथक हो जाता है |

योग विचारधारा की उत्पत्ति दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व में पतंजलि के योगसूत्र से हुई है |

इसमें व्यायाम के समय विभिन्न मुद्राओं का अहम योगदान है, जिन्हें आसन भी कहा जाता है और श्वास से सम्बंधित व्यायाम को प्राणायाम कहा जाता है |

वे साधन जिनसे स्वतंत्रता प्राप्त की जा सकती है

इन्हें प्राप्त करने के मार्ग

यम

स्व-नियंत्रण का अभ्यास करना

नियम

व्यक्ति के जीवन को संचालित करने वाले नियमों का अवलोकन तथा पालन

प्रत्याहार

कोई विषय या वस्तु का चयन

आसन

योगासनों द्वारा शारीरिक नियंत्रण

प्राणायाम

श्वास-लेने सम्बन्धी खास तकनीकों द्वारा प्राण पर नियंत्रण

धारणा

किसी नियत बिंदु पर मन को स्थिर करना

ध्यान

किसी चयनित विषय पर ध्यान एकाग्र करना

समाधि

मन तथा पिंड का विलय ही स्वंय के पूर्ण रूप से विच्छेद होने का कारण है

ऊपर बताई गई तकनीकों का योग विचारधारा समर्थन करती है क्योंकि इससे मनुष्यों को अपने मन, शरीर तथा ज्ञानेन्द्रियों पर नियंत्रण करने में सहायता मिलती है| लेकिन हमें याद रखना चाहिए कि जब तक पथ-प्रदर्शक या गुरु में विश्वास न हो तब तक इन व्यायामों से सहायता नही मिल सकती है | इससे ध्यान करने में एकाग्रता मिलती हैं पर सांसारिक विषयों से ध्यान हटाने पर |

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प्राचीन भारतीय साहित्य दर्शन के बारें में आप क्या जानते है

प्राचीन भारतीय साहित्य में दर्शन की पुरानी परम्परा रही है | कई दार्शनिक जीवन और मृत्यु के रहस्यों अर्थात इनमें स्थित संभावनाओं का पता लगाने की कोशिश में लगे रहते है | उनके द्वारा बताए गए दर्शन तथा धार्मिक संप्रदाय एक-दूसरे को प्रभावित करते हैं |

 Source: www.indianetzone.com

समय के साथ सामाजिक बदलाव जैसे कि वर्ण का विभाजित होना, राज्य कि सीमाओं का निर्धारण होना आदि के कारण विभिन्न दार्शनिक विचारधाराओं में भी अंतर स्पष्ट होने लगा और सभी दार्शनिक इस बात पर सहमत हुए कि हर मनुष्य को निम्नलिखित चार लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए प्रयास करना चाहिए :

1.  जीवन का लक्ष्य, आर्थिक साधन या धन अर्थात अर्थ | अर्थशास्त्र में अर्थव्यवस्था से सम्बंधित मुद्दों पर चर्चा की गई है |

2.  जीवन का लक्ष्य, सामाजिक व्यवस्था का विनियमन अर्थात धर्म | धर्मशास्त्र में राज्य से सम्बंधित चर्चा की गई है |

3.  जीवन का लक्ष्य, शारीरिक सुख-भोग या प्रेम अर्थात काम | कामशास्त्र या कामसूत्र की रचना यौन विषयों पर विचार डालने के लिए की गयी है |

4.  जीवन का लक्ष्य, मोक्ष अर्थात मुक्ति | दर्शन से सम्बंधित कई ग्रंथ हैं, जिनमें मुक्ति की चर्चा की गई है |

सभी विद्धानों ने कहा है कि सभी मनुष्यों का उदेश्य जीवन के चक्र से मुक्त होना ही होता है |

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