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वारंट के साथ तलाशी और बिना वारंट के तलाशी में क्या अंतर होता है?

तलाशी वारंट जारी करने का अधिकार किसी मजिस्ट्रेट या जज या किसी अन्य योग्य अथॉरिटी को होता है. इस वारंट में पुलिस अधिकारियों को यह अधिकार दिया जाता है कि वे किसी स्थान जैसे ऑफिस, मकान, गोदाम और वाहन की तलाशी लें. कुछ संज्ञेय मामलों में पुलिस को सिर्फ सूचना और शक के आधार पर किसी व्यक्ति के घर या उस व्यक्ति की तलाशी लेने का अधिकार होता है. इसे बिना वारंट के तलाशी कहा जाता है.
Dec 31, 2018 15:38 IST
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दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 (Code of Criminal Procedure, 1973) भारत में आपराधिक कानून के क्रियान्यवन के लिये मुख्य कानून है. यह सन् 1973 में पारित हुआ तथा 1 अप्रैल 1974 से लागू हुआ. ' CrPC ' दंड प्रक्रिया संहिता का संक्षिप्त नाम है.

जब कोई अपराध किया जाता है, तो सदैव दो प्रक्रियाएं होती हैं, जिन्हें पुलिस अपराध की जांच करने में अपनाती है. एक प्रक्रिया पीड़ित के संबंध में और दूसरी आरोपी के संबंध में होती है. CrPC में इन दोनों प्रकार की प्रक्रियाओं का ब्योरा दिया गया है. दंड प्रक्रिया संहिता के द्वारा ही अपराधी को दंड दिया जाता है.

वारंट का सीधा मतलब होता है अधिकार पत्र जबकि सर्च वारंट का मतलब होता है “खोजने का अधिकार” अर्थात तलाशी वारंट.

तलाशी वारंट किसे कहते हैं?

तलाशी वारंट जारी करने का अधिकार किसी मजिस्ट्रेट या जज या किसी अन्य योग्य अथॉरिटी को होता है. इस वारंट में पुलिस अधिकारियों को यह अधिकार दिया जाता है कि वे किसी स्थान जैसे वाहन, ऑफिस, मकान, गोदाम या किसी अन्य जगह के साथ-साथ किसी व्यक्ति विशेष की तलाशी भी ले सकते हैं और सम्बंधित लोगों से पूछताछ कर सकते हैं.

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आइये अब दण्ड प्रक्रिया संहिता (CrPC) में दर्ज प्रावधानों के बारे में जानते हैं.

दण्ड प्रक्रिया संहिता (CrPC) में 2 तरह से तलाशी लेने के अधिकार दिए गये हैं,

1. तलाशी वारंट के साथ तलाशी

2. बिना वारंट के तलाशी

1. तलाशी वारंट के साथ तलाशी:

दण्ड प्रक्रिया संहिता के सेक्शन 93,94,95 और 97 के अंतर्गत तलाशी वारंट जारी किया जाता है. इस प्रकार के तलाशी वारंट के अंतर्गत पुलिस या उसके अधिकारी आपके घर, दुकान या मकान पर आएंगे और आपको मजिस्ट्रेट द्वारा जारी किया गया वारंट दिखायेंगे कि किस आधार पर आपके घर की तलाशी ली जा रही है.

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Image source:Udaya VaNi

सर्च वारंट जारी करने के उद्येश्य क्या होते हैं;

1. किसी दस्तावेज का वस्तु को प्राप्त करने या उपलब्ध करवाने के लिए

2. ऐसे किसी घर की तलाशी लेना जहाँ पर कोई चुरायी गयी संपत्ति रखी होने या किसी जाली दस्तावेज के रखे होने की संभावना हो.

3. किसी ऐसे पब्लिश डॉक्यूमेंट को प्राप्त करने के लिए जिसका सम्बन्ध किसी नकली पब्लिकेशन से हो या जो कि देश के विरुद्ध किसी साजिश से सम्बंधित हो

4. ऐसे व्यक्तियों को तलाशने के लिए जिनको कि गैर-कानूनी रूप से बंधक बनाकर कर रखा गया हो.

सेक्शन 93 के अंतर्गत जारी किया जाने वाला वारंट निम्न आधारों पर जारी किया जा सकता है;

a. जब न्यायालय को यह लगता है कि किसी व्यक्ति को सेक्शन 91 के तहत किसी डॉक्यूमेंट को अदालत के समक्ष प्रस्तुत करने को कहा गया है और वह व्यक्ति ऐसा नहीं करता है तो न्यायालय उसके खिलाफ तलाशी वारंट जारी कर सकता है.

b. जिस मामले में कोर्ट के यह लगता है कि किसी इन्क्वारी या ट्रायल का उद्येश्य, सर्च के आधार पर सोल्व किया जा सकता है.

सेक्शन 94 के अंतर्गत तलाशी वारंट:

इस धारा के अंतर्गत जिलाधिकारी, उपजिलाधिकारी और प्रथम श्रेणी न्यायिक मजिस्ट्रेट किसी स्थान की तलाशी के लिए वारंट जारी सकते हैं यदि उनको लगता है कि;

a. ऐसी जगह पर चुरायी गयी संपत्ति पाई जा सकती है.

b. इस जगह पर ऐसे चीज छुपाई गयी है जिसका सम्बन्ध किसी कोर्ट में लंबित मामले से है

सेक्शन 95 के अंतर्गत तलाशी वारंट:

इसके अंतर्गत कुछ प्रकाशनों को जब्त करने के बारे में बताया गया है;

राज्य सरकार, मजिस्ट्रेट से यह अनुरोध कर सकती है कि वह निम्नलिखित मामलों से सम्बंधित सामग्री, डॉक्यूमेंट या पब्लिकेशन को जारी करने के लिए किसी व्यक्ति या संस्था के खिलाफ वारंट जारी करे जिसका सम्बन्ध;

a. सेक्शन 124-A अर्थात देश देशद्रोह से हो. ऐसा कोई दस्तावेज जो देश के खिलाफ साजिश से जुड़ा हुआ हो.

b. सेक्शन 153 A, 153-B से हो अर्थात सामाजिक सौहार्द बिगाड़ने से जुड़ा हुआ हो.

c. सेक्शन 293 या सेक्शन 295-A से हो, अर्थात ऐसी बातें या सामग्री जो कि अश्लील श्रेणी में आतीं हैं और उनका पब्लिकेशन करना, लोगों में बाँटना गैर कानूनी है.

नोट: यहाँ पर सेक्शन 96 के बारे में भी बताना जरूरी है. यह सेक्शन कहता है कि यदि किसी व्यक्ति को लगता है कि उसकी किताबों को, समाचार पत्रों, मैगज़ीन को बिना किसी ठोस सबूत या आधारहीन रूप से जब्त कर लिया गया है तो वह सीधे उच्च न्यायालय में इस कदम के खिलाफ अपील कर सकता है.

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सेक्शन 97 के अंतर्गत वारंट:

इस प्रकार का वारंट उस स्थिति में जारी किया जाता है जब कोई व्यक्ति या पुलिस किसी अन्य व्यक्ति को गैर-कानूनी तरीके से बंदी बनाता है तो मजिस्ट्रेट को यह अधिकार है कि बंदी बनाये गए व्यक्ति को प्राप्त करने के लिए कुछ संदिग्ध जगहों की तलाशी के लिए वांरट जारी किया जाये.

इस प्रकार का वारंट, जिला जज, सब डिविजनल मेजिस्ट्रेट या प्रथम श्रेणी का न्यायिक मजिस्ट्रेट जारी कर सकता है.

2. बिना वारंट के तलाशी: इस प्रकार की तलाशी CrPC के सेक्शन 103, 153, 165 और 166 के अंतर्गत बिना तलाशी के सर्च करने की सुविधा देती है.

कुछ संज्ञेय मामलों में पुलिस को सिर्फ सूचना और शक के आधार पर किसी व्यक्ति के घर,दुकान, ऑफिस, वाहन या उस व्यक्ति की तलाशी लेने का अधिकार होता है.

सीआरपीसी के सेक्शन 103 के तहत सर्च

इस सेक्शन में मजिस्ट्रेट को यह अधिकार है कि उसकी उपस्तिथि में किसी घर, स्थान, दुकान और मकान की तलाशी ली जाये.

सीआरपीसी के सेक्शन 104 के तहत सर्च में मजिस्ट्रेट को यह अधिकार है कि वह पुलिस अधिकारी को यह अधिकार दे कि तलाशी के दौरान किसी डॉक्यूमेंट को जब्त करके कोर्ट के सामने प्रस्तुत करे.

CrPC के सेक्शन 153 में प्रावधान

CrPC के सेक्शन 153 में यह प्रावधान है कि यदि किसी पुलिस ऑफिसर को इस बात की सूचना है या शक है कि किसी दुकान या ऑफिस इत्यादि में वजन नापने के उपकरण "बाँट" या माप तौल या निरीक्षण करने वाले उपकरण इत्यादि गलत माप के हैं तो उसको यह अधिकार है कि वह उस दुकान, ऑफिस या मकान में बिना वारंट दिखाए प्रवेश कर सकता है और वहां पर पाए गए माप तौल के उपकरणों को जब्त कर सकता है और इससे सम्बंधित जानकारी मजिस्ट्रेट को सौंप सकता है.

CrPC के सेक्शन 165 में प्रावधान

जब भी किसी थाने के प्रभारी अधिकारी या जांच करने वाले पुलिस अधिकारी के पास यह मानने के लिए उचित आधार होते हैं कि किसी भी अपराध की जांच के लिए आवश्यक कुछ सवूत किसी जगह पर मिल सकते हैं तो वह बिना देरी किये बिना वारंट के ऐसी जगह पर तलाशी ले सकता है.

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Image source:Vaartha

हालाँकि उसे उस मकान या दुकान में घुसने से पहले लिखित रूप से यह बताना जरूरी होता है कि उसे उस परिसर में किस तरह के सुराग या सबूत मिलने की आशा है. इस लिखित शपथ की एक कॉपी सम्बंधित मजिस्ट्रेट और घर या ऑफिस के स्वामी को सौंपना जरूरी होता है. इसके साथ ही वह अधिकारी उसी जगह की सर्च ले सकता है जो कि सम्बंधित थाने की सीमा में आती हो.

कुट्टन पिल्लई के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि तलाशी का वांरट जारी करना मजिस्ट्रेट के विवेक पर निर्भर करता है लेकिन यह “मनमाना” नहीं होना चाहिए अर्थात किसी के अधिकारों पर प्रतिकूल प्रभाव नही पड़ना चाहिए.

इस प्रकार ऊपर दिए गए विभिन्न सेक्शन के माध्यम से आपको पता चल गया होगा कि तलाशी और तलाशी वारंट के बीच क्या अंतर होता है और दोनों तरह के वारंट किन किन मामलों में जारी किये जाते हैं.

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