क्या आप जानते हैं कि लोकतंत्र का सिद्धांत ऋग्वेद की देन है

लोकतंत्र एक ऐसी व्यवस्था है जिसमें जनता अपना शासक खुद चुनती है. लोकतंत्र शब्द को डेमोक्रेसी कहते है जिसकी उत्पत्ति ग्रीक मूल शब्द ‘डेमोस’ से हुई है. डेमोस का अर्थ है ‘जन साधारण’ और क्रेसी का अर्थ है ‘शासन’. क्या प्राचीनकाल में यह व्यवस्था हुआ करती थी और कैसी थी. इस लेख के माध्यम से जानेंगे की कैसे ,लोकतंत्र का सिद्धांत ऋग्वेद की देन हैं.
Nov 23, 2017 17:20 IST
    Concept of Democracy by Rig Veda

    लोकतंत्र में लोक का अर्थ जनता और तंत्र का अर्थ व्यवस्था होता है. अत: लोकतंत्र का अर्थ हुआ जनता का राज्य. यह एक ऐसी जीवन पद्धति है जिसमें स्वतंत्रता, समता और बंधुता समाज-जीवन के मूल सिद्धांत होते हैं. अंग्रेजी में लोकतंत्र शब्द को डेमोक्रेसी (Democracy) कहते है जिसकी उत्पत्ति ग्रीक मूल शब्द ‘डेमोस’ से हुई है. डेमोस का अर्थ है ‘जन साधारण’ और क्रेसी का अर्थ है ‘शासन’. ऐतिहासिक दृष्टि से अवलोकन करें तो भारत में लोकतंत्रात्मक शासन प्रणाली का आरंभ पूर्व वैदिक काल से ही हो गया था. प्राचीनकाल से ही भारत में सुदृढ़ लोकतांत्रिक व्यवस्था विद्यमान थी. इसके साक्ष्य प्राचीन साहित्य, सिक्कों और अभिलेखों से प्राप्त होते हैं.
    ऐसा कहना गलत नहीं होगा की लोकतंत्र का सिद्धांत वेदों की ही देन हैं. सभा और समिति का उल्लेख ऋग्वेद एवं अथर्ववेद दोनों में मिलता हैं. जिसमें राजा, मंत्री और विद्वानों से विचार विमर्श करने के बाद ही कोई फैसला लेता था. इनके माध्यम से यह पता चलता है कि उस समय राजनीती कितनी ठोस हुआ करती थी क्योंकि सभा एवं समिति के निर्णयों को लोग आपस में अच्छे द्रष्टिकोण से निपटाते थे. यहाँ तक की विभिन्न विचारधारा के लोग कई दलों में बट जाते थे और आपसी सलाह मशवरा करके निर्णय लेते थे. कभी–कभी विचारों में मदभेद के कारण आपसी झगड़ा भी हो जाता था. अर्थात ऐसा कहना गलत नहीं होगा की वैदिक काल से ही द्विसदस्यीय संसद की शुरुआत मानी जा सकती है. इंद्र का चयन भी वैदिक काल में इन्हीं समितियों के कारण ही होता था. उस समय इंद्र एक पद हुआ करता था जिसे राजाओं का रजा कहा जाता था. गणतंत्र शब्द का प्रयोग ऋग्वेद में चालीस बार, अथर्ववेद में 9 बार और ब्राह्माण ग्रंथों में अनेक बार किया गया है. वैदिक काल के पतन के बाद राजतंत्रों का उदय हुआ और वही लंबे समय तक शासक रहे.

    Democratic society of Ancient India
    Source: www.parliamentmuseum.org.com

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    क्या आप जानते हैं कि आधुनिक संसदीय लोकतंत्र के कुछ महत्वपूर्ण तथ्य जैसे की बहुमत द्वारा निर्णय लेना पहले भी प्रचलित थे. उस समय भी बहुमत से हुआ निर्णय अलंघनीय माना जाता था. वैदिक काल के पश्चात छोटे गणराज्यों का वर्णन मिलता है जिसमें जनता एक साथ मिलकर शासन से सम्बंधित प्रश्नों पर विचार करती थी. गणराज्य को प्राचीनकाल में प्रजातांत्रिक प्रणाली के रूप में परिभाषित किया जाता था. आत्रेय ब्राह्मण, पाणिनि के अष्टाध्यायी, कौटिल्य के अर्थशास्त्र महाभारत, अशोक स्तम्भों के शिलालेखों समकालीन इतिहासकारों तथा बौद्ध एवं जैन विद्वानों द्वारा रचित ग्रन्थों में तथा मनुस्मृति में इसके पर्याप्त ऐतिहासिक साक्ष्य मिलते हैं.

    Rig Vedic time democracy emerges
    Source: www. 2.bp.blogspot.com
    महाभारत के शांति पर्व में `संसद´ नामक एक सभा का उल्लेख भी मिलता है क्योंकि इसमें आम जनता के लोग होते थे, इसे जन सदन भी कहा जाता था. अगर बौध काल की बात करें तो उस समय भी लोकतंत्र व्यवस्था थी.  लिच्छवी, वैशाली, मल्लक, मदक, कम्बोज आदि जैसे गंणतंत्र संघ लोकतांत्रिक व्यवस्था के उदाहरण हैं. वैशाली के पहले राजा विशाल को चुनाव द्वारा ही चुना गया था. कौटिल्य की अर्थशास्त्र में गणराज्य को दो तरह का बताया गया है पहला अयुध्य गणराज्य एक ऐसा गणराज्य जिसमें केवल राजा ही फैसले लेता था और दूसरा श्रेणी गणराज्य जिसमें हर कोई फैसले लेने में भाग ले सकता है. वहीं पाणिनी की अष्ठाध्यायी में जनपद शब्द का उल्लेख मिलता है. जिसमें जनता द्वारा प्रतिनिधि चुना जाता था और वही शासन व्यवस्था संभालता था.
    इस लेख से यह ज्ञात होता है कि प्राचीन काल से ही कई स्थानों पर गणतंत्रीय व्यवस्था थी. जिसके सूत्र कई आलेखों से मिलते हैं. अर्थात लोकतंत्र का सिद्धांत रिग्वेदा की ही देन है.

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