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भारतीय दर्शनशास्त्र के विधर्मिक स्कूलों की सूची

दर्शन का शाब्दिक अर्थ होता है यथार्थ की परख के लिये एक दृष्टिकोण। प्राचीन भारतीय साहित्य में दर्शन की लंबी परम्परा रही है। कई दार्शनिक जीवन और मृत्यु के रहस्यों तथा इन दोनों शक्तियों के परे स्थित सम्भावनाओं का पता लगाने में रत रहे हैं। इस लेख में, हमने भारतीय दर्शनशास्त्र के विधर्मिक स्कूलों को सूचीबद्ध किया है, जो UPSC, SSC, State Services, NDA, CDS और Railways जैसी प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे छात्रों के लिए बहुत ही उपयोगी है।
Oct 18, 2018 16:59 IST
Heterodox Schools of Indian Philosophy HN

दर्शन का शाब्दिक अर्थ होता है यथार्थ की परख के लिये एक दृष्टिकोण। प्राचीन भारतीय साहित्य में दर्शन की लंबी परम्परा रही है। कई दार्शनिक जीवन और मृत्यु के रहस्यों तथा इन दोनों शक्तियों के परे स्थित सम्भावनाओं का पता लगाने में रत रहे हैं। भारतीय दार्शनिक विचारधारा को समय की दृष्टि से चार कालों में विभाजित कर सकते हैं-

1. वैदिक काल में वेद से उपनिषद तक रचा साहित्य समाहित है।

2. महाभारत काल - चार्वाक और गीता का युग।

3. बौद्ध काल - जैन तथा बौद्ध धर्म का युग।

4. उत्तर बौद्ध काल - न्याय, वैशेषिक, सांख्य, योग, पूर्व तथा उत्तर मीमांसा का युग।

भारतीय दर्शनशास्त्र के विधर्मिक स्कूल

भारतीय दर्शन को दो विचारधाराओं में विभाजित किया जाता है जिसको परंपरागत या रुढ़िवादी विचारधारा और धर्म-विरोधी या विधर्मिक विचारधारा बोला जाता है। परंपरागत या रुढ़िवादी विचारधारा का मानना था की वेद ज्ञान के सर्वोच्य ग्रन्थ हैं जिनमे मुक्ति का रशय निहित है। वही धर्म-विरोधी या विधर्मिक विचारधारा वेदों की मौलिकता में आस्था नहीं रखते थे और इश्वर के अस्तित्व पर प्रशन खड़े करते हैं। भारतीय दर्शनशास्त्र के विधर्मिक स्कूलों पर नीचे चर्चा की गयी है:

1. आजीविक विधर्मिक दर्शन स्कूल

यह भारतीय दर्शनशास्त्र के विधर्मिक स्कूलों (नास्तिक) स्कूलों में से एक है। मकखली गोसाला इस दर्शन के समर्थक थे। वे वर्धमान महावीर के पहले शिष्य थे। उनके अनुसार ब्रह्मांड की हर वस्तु भाग्य और भाग्य के साथ समन्वयित है। यह दर्शन कर्म, घातकता और चरम निष्क्रियता में विश्वास रखता था। बिंदुसार (मौर्य सम्राट) के दौरान यह बहुत लोकप्रिय था।

2. उच्छेदवाद विधर्मिक दर्शन स्कूल

इस विधर्मिक दर्शन स्कूल के अनुसार आत्मा के भी नष्ट हो जाने का सिद्धांत होता है। प्राचीन काल में अजित केशकंबली के सिद्धांत को उच्छेदवाद के नाम से जाना जाता था। इस सिद्धांत के अनुसार मृत्यु के बाद कोई भी पदार्थ स्थायी नहीं रहता। शरीरस्थ सभी पदार्थों के अस्थायित्व में विश्वास करनेवाले इस मत की मान्यता थी कि मृत्युपरांत पृथ्वी, जल, तेज और वायु नामक चार तत्व अपने मूल तत्व में लीन हो जाते हैं। देह के भस्म हो जाने के बाद कुछ भी शेष नहीं रहता, आत्मा भी नहीं। आत्मा की सत्ता मिथ्या है। इस सिद्धांत का दूसरा नाम जड़वाद भी है। बुद्धकाल में इसका विरोधी मत शाश्वतवाद के नाम से प्रसिद्ध था जो पाँच तत्वों के साथ ही सुख, दु:ख एवं आत्मा को भी नित्य एवं अचल मानता था।

3. नित्यवादी विधर्मिक दर्शन स्कूल

पकुधा कच्कायाना इस दर्शन का समर्थक था। उनके अनुसार, पृथ्वी, पानी, आग, हवा, खुशी, दुख और आत्मा अनंत है।

योग विचारधारा: प्राचीन भारतीय साहित्य दर्शन

4. संदेहवादी विधर्मिक दर्शन स्कूल

संजय बेलाथीपुत्त इस दर्शन का समर्थक था। इस सिद्धांत की मान्यता है कि जहाँ विश्व की कुछ वस्तुओं का निश्चयात्मक ज्ञान संभव है, वहाँ कुछ ऐसे तत्व या पदार्थ भी हैं जो अज्ञेय हैं, अर्थात् जिनका निश्चयात्मक ज्ञान संभव नहीं है। अज्ञेयवाद, संदेहवाद से भिन्न है; संदेहवाद या संशयवाद के अनुसार विश्व के किसी भी पदार्थ का निश्चयात्मक ज्ञान संभव नहीं है।

5. अक्रियावादी विधर्मिक दर्शन स्कूल

यह गौतम बुद्ध के समकालीन एक प्रसिद्ध दार्शनिक मतवाद था। यह मत भारत में बुद्ध के समय कुछ अपधर्मी शिक्षकों की मान्यताओं पर आधारित था। यह सिद्धांत एक प्रकार का स्वेच्छाचारवाद था, जो व्यक्ति के पहले के कर्मो का मनुष्य के वर्तमान और भविष्य पर पड़ने वाले प्रभाव के पारंपरिक कार्मिक सिद्धांत को अस्वीकार करता था। इस मत की मान्यताओं के अनुसार, न तो कोई कर्म है, न कोई क्रिया और न कोई प्रयत्न।

श्रमण आंदोलन की वजह से ही विधर्मिक दर्शन की शुरुवात हुई थी, जिसमें आत्मा को स्वीकार करने या इनकार करने से लेकर, परमाणु, एंटीनोमियन नैतिकता, भौतिकवाद, नास्तिकता, अज्ञेयवाद, स्वतंत्र इच्छा के लिए घातकता, पारिवारिक जीवन के लिए अति तपस्या का आदर्शीकरण, सख्त सख्ती से स्वीकार करने या इनकार करने से लेकर, सख्त अहिंसा (अहिंसा) और शाकाहार हिंसा और मांस खाने की अनुमति के लिए जैस मूल्यों पर विचार किया गया था।

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