घाटे की वित्त व्यवस्था क्या होती है और इसके क्या उद्येश्य होते हैं?

जब कभी सरकार की आय उसके द्वारा उसके द्वारा किये जाने वाले व्ययों से कम हो जाती है तो बजट में इस प्रकार के घाटे को पूरा करने के लिए जो व्यवस्था अपनाई जाती है उसे घाटे की वित्त व्यवस्था या हीनार्थ प्रबंधन कहते है. घाटे की वित्त व्यवस्था को तीन प्रकार से पूरा किया जाता है. नए नोट छापकर, विदेशी ऋण लेकर और आंतरिक ऋण लेकर.
Mar 30, 2019 16:20 IST
    Deficit Financing

    हम में से बहुत से लोग सोचते हैं कि उनकी आय हमेशा उनके व्ययों से कम क्यों रह जाती है. दरअसल यह बात लोगों पर ही नहीं बल्कि अरबों डॉलर की अर्थव्यवस्था वाले देशों पर भी लागू होती है. अर्थात दुनिया में लगभग हर देश की सरकार घाटे की वित्त व्यवस्था का सहारा लेती है.

    घाटे की वित्त व्यवस्था का मतलब (Meaning of Deficit Financing)

    जब कभी सरकार की आय उसके द्वारा द्वारा किये जाने वाले व्ययों से कम हो जाती है तो बजट में इस प्रकार के घाटे को पूरा करने के लिए जो व्यवस्था अपनाई जाती है उसे घाटे की वित्त व्यवस्था या हीनार्थ प्रबंधन कहते है.

    घाटे की वित्त व्यवस्था को तीन प्रकार से पूरा किया जाता है. (Sources of Deficit Financing)

    1. नए नोट छापकर,

    2. विदेशी ऋण लेकर (from Developed countries and international institutions)

    3. आंतरिक ऋण लेकर अर्थात देश की जनता से ऋण लेकर ( through Ad-hoc Treasury Bills, government bonds etc)

    भारतीय दृष्टिकोण से घाटे की वित्त व्यवस्था;( Deficit Financing in India)

    भारत में जब सरकार की कुल आय (राजस्व खाता + पूँजी खाता) उसके कुल व्यय से कम हो जाती है तो इस कमी को पूरा करने के लिए सरकार रिज़र्व बैंक में जमा अपने नकद कोषों से धन निकालती है अथवा रिज़र्व बैंक तथा व्यापारिक बैंकों से ऋण लेती है या फिर नए नोट छापती है.

    ध्यान रहे कि ऊपर बताये गए तीनों उपायों से देश की अर्थव्यवस्था में मुद्रा की पूर्ती में वृद्धि हो जाती है जिसके कारण कीमतों में वृद्धि हो जाती है. इसी कारण घाटे की अर्थव्यवस्था को “मुद्रा पूर्ती विचार” भी कहा जाता है. घाटे की वित्त व्यवस्था देश के राजकोषीय घाटे के बराबर होती है.

    घाटे की वित्त व्यवस्था के निम्न उद्येश्य होते हैं; (Purposes of Deficit Financing)

    1. देश के विकास के गति देने के लिए धन की कमी को दूर करना

    2. मंदी काल में देश में व्याप्त बेरोजगारी से छुटकारा प्राप्त करने के लिए देश में अतिरिक्त निवेश को बढ़ावा देना.

    3. अर्थव्यवस्था के विभिन्न क्षेत्रों के विकास में निवेश के लिए धन की व्यवस्था करना.

    4. आकस्मिक वित्तीय आवश्यकताओं की पूर्ती और युद्धकालीन व्यय की पूर्ती के लिए वित्त की व्यवस्था करना.

    5. देश में आधारभूत संरचना के विकास करके देश के करदाताओं को यकीन दिलाना कि उनके द्वारा दिया गया टैक्स सही जगह खर्च हुआ है.  

    घाटे की वित्त व्यवस्था के प्रभाव; (Impacts of Deficit Financing)

    1. देश में मुद्रा की पूर्ती में वृद्धि होने के कारण महंगाई में वृद्धि

    2. स्फितिक दबाव के कारण औसत उपभोग स्तर में कमी

    3. आय की असमानताओं में वृद्धि क्योंकि अमीर नए निवेश के अवसर पाकर और भी अमीर होता है.

    4. बचत पर प्रतिकूल प्रभाव: - घाटे की वित्त व्यवस्था मुद्रास्फीति की ओर जाती है और मुद्रास्फीति स्वैच्छिक बचत की आदत पर प्रतिकूल प्रभाव डालती है.

    5. निवेश पर प्रतिकूल प्रभाव: - घाटे की वित्त व्यवस्था निवेश पर प्रतिकूल असर डालती है जब अर्थव्यवस्था में मुद्रास्फीति बढ़ती है, उस वक्त ट्रेड यूनियन, कर्मचारी अधिक वेतन की मांग करते हैं. यदि उनकी मांगों को स्वीकार किया जाता है तो उत्पादन की लागत बढ़ जाती है जिससे निवेशक हतोत्साहित होते हैं.

    सारांशतः यह कहा जा सकता है कि देश में घाटे की वित्त व्यवस्था इतनी बुरी नहीं है जितनी की यह दिखती है. शायद यही कारण है कि विश्व के हर अमीर देश में घाटे की वित्त व्यवस्था का प्रयोग किया जाता है.

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