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ऊष्मीय या थर्मल प्रदूषण और इसके हानिकारक प्रभाव

16-MAY-2018 17:19
    Thermal Pollution and its harmful effects HN

    पर्यावरण प्रदूषण पुरे विश्व को अपने चपेट ले रही है, इसलिए यह एक वैश्विक चिंता का विषय बना हुआ है। प्रदूषण का अर्थ है - 'हवा, पानी, मिट्टी आदि का अवांछित द्रव्यों से दूषित होना', जिसका सजीवों पर प्रत्यक्ष रूप से विपरीत प्रभाव पड़ता है तथा अप्रत्यक्ष प्रभाव पारिस्थितिक तंत्र पर भी पड़ते हैं। आज के सन्दर्भ में ऊष्मीय या थर्मल प्रदूषण आधुनिक औद्योगिक समाज में एक वास्तविक समस्या है।

    ऊष्मीय या थर्मल प्रदूषण किसे कहते हैं?

    ऊष्मीय या थर्मल प्रदूषण ऐसी प्रक्रिया है जो पानी की गुणवत्ता को ख़त्म या कम करके उसके परिवेश के तापमान को बढ़ा देता है। जिससे तापमान में वृद्धि होती है। यह थर्मल, परमाणु, नाभिकीय, कोयले कारखाने , तेल क्षेत्र जेनरेटर, कारखानों और मिलों जैसे विभिन्न औद्योगिक संयंत्रों द्वारा शीतलक पानी का प्रयोग करने से होता है।

    दुसरे शब्दों में, बिजली संयंत्रों तथा औद्योगिक विनिर्माताओं द्वारा शीतलक पानी का प्रयोग करने के बाद जब ये पानी पुनः प्राकृतिक पर्यावरण में आता है तो उसका तापमान अधिक होता है, तापमान में बदलाव के कारण ऑक्सीजन की मात्रा में कम हो जाती है जिसके वजह से पारिस्थिथिकी तंत्र पर बुरा प्रभाव पड़ता है। उदहारण के तौर पर- ऑक्सीजन की मात्रा की कमी के वजह से जलीय जीव के उत्तरजीविता मुश्किल में पड़ सकती है।

    ऊष्मीय या थर्मल प्रदूषण के कौन-कौन से स्रोत हैं?

    1. परमाणु ऊर्जा संयंत्र

    2. कोयला से निकाला गया बिजली संयंत्र

    3. औद्योगिक प्रयास

    4. घरेलू सीवेज

    5. हाइड्रो-विद्युत शक्ति

    6. थर्मल पावर प्लांट

    उपर्युक्त स्रोतों के कारण शीतलक पानी के के तापमान सामान्य शीतलक पानी के तापमान की तुलना में 8 से 10 डिग्री सेल्सियस अधिक होता है जो ऑक्सीजन एकाग्रता को कम करता है। जिसका पारिस्थितिक तंत्र हानिकारक प्रभाव डाल सकता है।

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    ऊष्मीय या थर्मल प्रदूषण के हानिकारक प्रभाव

    ऊष्मीय या थर्मल प्रदूषण के हानिकारक प्रभावों पर नीचे चर्चा की गई है:

    1. विघटित ऑक्सीजन में कमी

    थर्मल, परमाणु, नाभिकीय, कोयले कारखाने , तेल क्षेत्र जेनरेटर, कारखानों और मिलों जैसे विभिन्न औद्योगिक संयंत्रों से निकले प्रदूषक, पानी के तापमान में वृद्धि के साथ ऑक्सीजन एकाग्रता को कम कर देती हैं। जल में मछली को जीवित रहने के लिए 6ppm (प्रति मिलियन भाग) की आवश्यकता होती है जो उच्च पानी के तापमान को बर्दाश्त नहीं कर सकता है और विलुप्ती के कगार पर आ सकते हैं।

    2. पानी के गुणों में बदलाव

    पानी का उच्च तापमान पानी के भौतिक और रासायनिक गुणों को बदल देता है। पानी की चिपचिपाहट कम होने पर वाष्प का दबाव तेजी से बढ़ जाता है। गैसों की घनत्व, चिपचिपाहट और घुलनशीलता में कमी के कारण निलंबित कणों की गति को बढ़ाती है जो जलीय जीव की खाद्य आपूर्ति को गंभीरता से प्रभावित करती हैं।

    3. विषाक्तता में वृद्धि

    प्रदूषक की एकाग्रता, पानी के तापमान में वृद्धि का कारक होता है जिसकी वजह से पानी में मौजूद जहर की विषाक्तता को बढ़ा देता है। जो जलीय जीवन की मृत्यु दर में वृद्धि कर सकती है।

    4. जैविक गतिविधियों में व्यवधान

    तापमान परिवर्तन पूरे जलीय पारिस्थितिकी तंत्र को बाधित करता है क्योंकि तापमान में परिवर्तन जैविक प्रक्रिया जैसे श्वसन दर, पाचन, विसर्जन और जलीय जीव के विकास को परिवर्तित कर सकता है।

    6. जैविक जीव की क्षति

    किशोर मछली, प्लवक, मछली, अंडे, लार्वा, शैवाल और प्रोटोजोआ जैसे जलीय जीव, बेहद संवेदनशील होते हैं जो अचानक तापमान में परिवर्तन के कारण मर जाते हैं।

    पर्यावरण प्रदूषण : अर्थ, प्रभाव, कारण तथा रोकने के उपाय

    ऊष्मीय या थर्मल प्रदूषण कैसे रोका जा सकता है?

    ऊष्मीय या थर्मल प्रदूषण के कारण उच्च तापमान को रोकने या नियंत्रित करने के लिए निम्नलिखित उपाय किए जा सकते हैं:

    1. औद्योगिक विसर्जित उष्णिय जल को प्रत्यक्ष रूप से किसी भी पानी के स्रोतों में विसर्जित करने से पहले ठंडे तालाबों, मनुष्य निर्मित जलाशयों में भाप के तकनीक, संवहन और विकिर्णन द्वारा इन्हें ठंडा किया जा सकता है।

    2. पुनर्जीवनीकरण एक ऐसी प्रक्रिया जिसके द्वारा घरेलू अथवा औद्योगिक अतिरिक्त उष्णता को पुनः कम किया जाता है।

    इसलिए, हम कह सकते हैं कि किसी भी प्रकार का प्रदूषण सीधे या अप्रत्यक्ष रूप से मनुष्यों को प्रभावित कर सकता है क्योंकि जैव विविधता का नुकसान पर्यावरण के सभी पहलुओं को प्रभावित करने वाले परिवर्तनों का कारण बनता है।

    पर्यावरण और पारिस्थितिकीय: समग्र अध्ययन सामग्री

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