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राष्ट्रीय सतत कृषि मिशन क्या है?

जलवायु परिवर्तन के इस युग में कृषि उत्पादकता को सतत बनाना बहुत ही आवश्यक है लेकिन प्राकृतिक संसाधनों जैसे मृदा एवं जल की गुणवत्ता और उपलब्धता पर भी निर्भर करता है कृषि विकास को समुचित स्थिति विशिष्ट उपायों के माध्यम से इन दुर्लभ प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण और सतत प्रयोग को बढ़ावा देकर संधारणीय बनाया जा सकता है। इस लेख में हमने राष्ट्रीय सतत कृषि मिशन के उद्देश्य, कार्यात्मक क्षेत्र और इसकी कमियों पर चर्चा की है जो UPSC, SSC, State Services, NDA, CDS और Railways जैसी प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे छात्रों के लिए बहुत ही उपयोगी है।
Feb 21, 2019 15:22 IST
What is National Mission for Sustainable Agriculture? HN

जलवायु परिवर्तन के इस युग में कृषि उत्पादकता को सतत बनाना बहुत ही आवश्यक है लेकिन प्राकृतिक संसाधनों जैसे मृदा एवं जल की गुणवत्ता और उपलब्धता पर भी निर्भर करता है कृषि विकास को समुचित स्थिति विशिष्ट उपायों के माध्यम से इन दुर्लभ प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण और सतत प्रयोग को बढ़ावा देकर संधारणीय बनाया जा सकता है।

भारत सरकार ने बारहवीं पंचवर्षीय योजना के दौरान जलवायु परिवर्तन पर राष्ट्रीय कार्य योजना के तहत उपयुक्त अनुकूलन और शमन उपायों के माध्यम से भारतीय कृषि को जलवायु अनुकूल उत्पादन प्रणाली में बदलने के लिए बारहवीं पंचवर्षीय योजना के दौरान राष्ट्रीय सतत कृषि मिशन की शुरुआत हुई थी।

राष्ट्रीय सतत कृषि मिशन का उद्देश्य

1. कृषि को स्थान विशिष्ट एकीकृत/संयुक्त कृषि प्रणालियों को बढ़ावा दे कर और अधिक उत्पादक, सतत, लाभकारी और जलवायु प्रत्यास्थ बनाना।

2. समुचित मृदा और नमी संरक्षण उपायों के माध्यम से प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण करना।

3. मृदा उर्वरता मानचित्रों, बृहत एवं सूक्ष्म पोषक तत्वों के मृदा परीक्षण आधारित अनुप्रयोक्ता समुचित उर्वरकों के प्रयोग इत्यादि के आधार पर व्यापक मृदा स्वास्थ्य प्रबंधन पद्धतियां अपनाना ।

4. 'प्रति बूंद अधिक फसल हासिल करने के लिए व्याप्ति बढ़ाने हेतु कुशल जल प्रबंधन के माध्यम से जल संसाधनों का इष्टतम उपयोग।

5. जलवायु परिवर्तन अनुकूलन और अल्पीकरण के क्षेत्र में अन्य चालू मिशनों अर्थात राष्ट्रीय कृषि विस्तार एवं प्रौद्योगिकी मिशन, राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन, राष्ट्रीय कृषि जलवायु प्रत्यास्थता पहल (एनआईसीआरए) इत्यादि के सहयोग से किसानों एवं पणधारियों की क्षमता बढ़ाना ।

6. महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी स्कीम (मनरेगा), एकीकृत पनधारा कार्यक्रम (आईडब्ल्यूएमपी), आरकेवीवाई इत्यादि जैसी अन्य स्कीमों/मिशनों से संसाधनों को लेकर और एनआईसीआरए के माध्यम से वर्षा सिंचित प्रौद्योगिकियों को मुख्य धारा में लाते हुए वर्षा सिंचित कृषि की उत्पादकता सुधारने हेतु चयनित ब्लाकों में प्रायोगिक मॉडल, और एनएपीसीसी के तत्वाधान में राष्ट्रीय सतत कृषि मिशन के मुख्य प्रदेयों को पूरा करने हेतु प्रभावी अंतर और आांतरिक विभागीय/मंत्रालय समन्वय स्थापित करना।

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राष्ट्रीय सतत कृषि मिशन के कार्यात्मक क्षेत्र

मिशन के कार्यात्मक क्षेत्र हैं - अनुसंधान और विकास, प्रौद्योगिकियां, उत्पाद और व्यवहार, बुनियादी ढांचे और क्षमता निर्माण। इस मिशन के कार्यात्मक क्षेत्रों के आधार पर यह 10 आयामों के इर्द-गिर्द घूमता है जिसमें उपयुक्त कृषि पद्धतियों को बढ़ावा देने के लिए बीज और जल छिडकाव, कीट, पोषक तत्व, कृषि पद्धतियां, ऋण, बीमा, बाजार, सूचना और आजीविका विविधीकरण शामिल हैं। ड्राईलैंड एग्रीकल्चर; जोखिम प्रबंधन; जानकारी हासिल करना; और जैव-प्रौद्योगिकियों का उपयोग मिशन के मुख्य कार्यक्षेत्र हैं।

राष्ट्रीय सतत कृषि मिशन की कमियां

भारत का राष्ट्रीय सतत कृषि मिशन संरचनात्मक रूप से बहुत अच्छा है और यह कृषि के सामने आने वाली चुनौतियों की पहचान कर सकता है। लेकिन मिशन के प्रावधान और रणनीति आधुनिक मानक पर तैयार नहीं किये गए हैं। इस मिशन की कुछ कमियों पर नीचे चर्चा की गयी है:

1. प्रस्तावित प्रावधान और रणनीतियाँ अत्यधिक व्यापक हैं जो केवल बड़े किसानों को लक्षित कर रही हैं और शेष कमजोर हैं।

2. सतत कृषि पारिस्थितिकी तंत्र सेवाओं, जीवों और उनके पर्यावरण के बीच संबंधों के अध्ययन की समझ पर आधारित है। लेकिन मिशन की प्रस्तावित रणनीतियों ने पानी को महत्व दिया और बड़े पैमाने पर रासायनिक उर्वरकों के उपयोग की अनदेखी की गयी है। जैविक खेती की तुलना में रासायनिक उर्वरक के उपयोग के लिए अधिक सिंचाई की आवश्यकता होती है।

3. यह मिशन जलवायु परिवर्तन के कारण कृषि के सामने आने वाली चुनौतियां का कोई प्रावधान नहीं है।

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