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1500 साल शासन करने वाले चोल साम्राज्य की सांस्कृतिक उपलब्धियां

चोल वंश के काल में कला और सस्कृति का विकास अपन चरम पर था. चोल राजाओं को कला से विशेष लगाव था जिसके चलते उन्होंने विभिन्न कलाकृतियों का निर्माण कराया. यहाँ पढ़ें पूरी जानकारी 

Cultural achievements of chola dynasty who ruled for fifteen hundred years
Cultural achievements of chola dynasty who ruled for fifteen hundred years

यदि इतिहास के पन्नो को पलटकर देखा जाए तो यह बखूबी पता चलता है की भारत की वास्तुकला उन राजवंशों की देन है जिन्होंने कभी भारत पर राज किया. यह सामाजिक, आर्थिक व सांस्कृतिक कलाकृतियाँ उन राजवंशों के जीवन का हिस्सा थी.

भारत में भिन्न-भिन्न प्रकार की सांस्कृतिक कलाकृतियाँ देखी जाती है जिसका कारण यह है की भारत पर अलग अलग संस्कृति के लोगों ने राज किया. इस देश की मिट्टी में रजवाड़ों के शासन के अवशेष भी मिले हुए है और मुगलों के भी. इन सबने अपने शासन की कोई न कोई छाप ज़रूर छोड़ी हुई है. 

भारत पर ऐसे ही एक राजवंश ने राज किया जिसने 1500 साल तक भारत की ज़मीन को अपने नाम रखा लेकिन इस राजवंश की पहचान केवल उसके इतने लम्बे समय तक शासन के लिए नही है बल्कि उसके द्वारा भारतीय सभ्यता में सांस्कृतिक,साहित्यिक और वास्तुकला के योगदान के लिए हैं. 

दक्षिण भारत पर सबसे लम्बे समय तक शासन करने वाले चोल साम्राज्य की तमिल और भारतीय सभ्यता में सांस्कृतिक उपलब्धियां उत्कृष्ट रही हैं. कला के क्षेत्र में उन्नति के लिए उन्होंने कोई भी अथक प्रयास किये. इनके इसी सांस्कृतिक उपलब्धियों में कुछ निम्नलिखित हैं . 

1. नटराज ( Dancing figure of shiva)

Source: metmuseum.org 

नटराज भगवान शिव की आकृति है जिसमें वह नाचते हुए प्रतीत होते हैं.  नटराज की यह आकृति चोल वंश के संरक्षण में मध्यकालीन युग के दौरान पूर्ण रूप से विकसित हुई. 

यदि इतिहास के सबूतों को खंगाला जाए तो यह पता चलता है की चोल वंशीय भगवान शिव के अनुनायी थे . इनके द्वारा बनवाए गये अधिकाँश मन्दिर इनके पसंदीदा भगवानों को ही समर्पित हैं . इनमें मुख्य रूप से नटराज ही प्रसिद्ध है जो की आगे चलकर चोल वंश का प्रतीत बन गया. 

पीतल की बनी यह आकर्षक मूर्ती वर्तमान में नई दिल्ली के संग्रहालय में स्थित है. 

2 बृहदेश्वर मन्दिर , तंजावुर 

Source: the decor journal india 

प्रसिद्ध बृहदेश्वर मन्दिर भारत की सबसे उत्तम कलाकृतियों में से एक है. द्रविडियन शैली से प्रेरित यह मन्दिर तंजावुर में कावेरी नदी के किनारे पर स्थित है . भगवान शिव से चोल वंशियों का ख़ासा लगाव था इसलिए यह मन्दिर भी भगवान शिव का ही है. मन्दिर में मौजूद शिलालेख के अनुसार इस मन्दिर का डिज़ाइन कुंजरा मल्लन राजा राम के द्वारा बनाया गया था. 

3. काम्बा रामयनम और पेरिया पूर्णम

Source: chidambara vilas

चोल वंशीय राजाओं का कला और साहित्य में विशेष रूझान था इसी कारण से उनके शासनकाल में इन्हें बहुत अधिक प्रोत्साहन भी मिला.  इन राजाओं ने तमिल विद्वानों और लेखकों में अपने राज में विशेष संरक्षण भी दिया. यह काल साहित्य के भक्ति काल के नाम से भी जाना जाता है क्योंकि इस दौरान अधिकाँश काम धार्मिक थे .

पेरियापुराणम एक तमिल काव्य वृतांत है जिसमें 63 तमिल शैव धर्म के विहित कवी, नायानार के बारे में बताया गया है. काम्बा रामायण वाल्मीकि के द्वारा लिखी गयी रामायण के आधार पर लिखी गयी है. 

4. चोल वंश के दौरान पीतल की ढलाई

Source: navacholasculpture

चोल वंश का नाम उन वंशों के नाम में शीर्ष पर गिना जाता है जिनके काल में कला अपने चरम पर थी. इस काल के दौरान कला और साहित्य को बहुत प्रोत्साहन मिला जिससे इनका बहुत अधिक विका भी देखने को मिलता है . 

यह काल पीतल की मूर्तियों के निर्माण के लिए भी प्रसिद्द है . इस काल में पीतल से बनी धातुएं एक विशेष तकनीक के तहत बनाई गयी थी जिसे लॉस्ट-वैक्स कास्टिंग तकनीक कहते हैं. इससे यह सुनिश्चित किया जाता था की इस  प्रकार का यह एकलौती कलाकृति है. 

5. चोल मन्दिरों के आभूषण 

Source: mamtadoshi

मान्यता के अनुसार मंदिरों के आभूषण 9वीं सदी से ताल्लुक रखते हैं. इन आभूषणों का प्रयोग देवी-देवताओं को सजाने में होता था. देवी- देवताओं के अलावा राजघराने के लोग भी इन आभूषणों का प्रयोग करते थे. अधिकांश आभूषण सोने के ही बने होते थे लेकिन नृतिकियाएँ आभूषण के डिज़ाइन को सस्ते धातु में बनवाकर पहनती थी. 

6. ऐरावातेश्वर मन्दिर, कूंभकोणम 

Source: lifeberrys.com

तमिलनाडु के इस बेहद खूबसूरत शहर में लाखों की संख्या में श्रद्धालु इस मन्दिर के दर्शन के लिए आते हैं . यह मन्दिर उन धार्मिक धरोहर का हिस्सा है जिनका नाम UNESCO की विश्व धरोहर में दर्ज है . चोल राजाओं के द्वारा इस मंदिर का निर्माण 12वीं सदी में हुआ था. इस मन्दिर में ऐरावत हाथी की प्रतिमा है जिसे स्वर्ग का राजा माना जाता है. ऐरावातेश्वर जटिल पत्थर की नक्काशी के साथ कला और वास्तुकला की एक गैलरी है परन्तु इसका आकार ख़ास बड़ा नही है. 

7  गंगाईकोंदाचोलपुरम मन्दिर

 

Source:  wikimediacommons 

इस मंदिर की संरचना राजेंद्र प्रथम के शासनकाल में हुई थी. तमिलनाडु का इस मन्दिर का नाम गंगाईकोंदा चोलापुरम गाँव के नाम पर रखा गया है. पत्थरों से बना यह मन्दिर चोल वंश की कला और साहित्य को बीएड खूबसूरत अंदाज़ में दर्शाता है साथ ही राजेंद्र चोल के काल के इतिहास का जीवित उदाहरण है.