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History of Ancient India: जानें सिन्धु घाटी सभ्यता के बारे में जिसमें मिले कुछ भव्य नगर और कलाकृतियाँ

सिन्धु घाटी सभ्यता न केवल भारत की बल्कि विश्व की भी सबसे प्राचीन सभ्यता है. आइये जानें इस सभ्यता के विषय में महत्वपूर्ण बातें 

Indus Valley civilization
Indus Valley civilization

History of Ancient India: वर्ष 1921 में दया राम साहनी द्वारा सिन्धु घाटी सभ्यता की खोज की गई थी ये सभ्यता न केवल भारत की बल्कि विश्व की भी सबसे प्राचीन नगरीय सभ्यता है. इस सभ्यता का विस्तार भारत के उत्तर पश्चिम राज्यों, पाकिस्तान और अफगानिस्तान तक था. ऐसा माना जाता है कि ये सभ्यता मिस्त्र की दजला-फ़रात सभ्यता और इराक की सभ्यता के समकालीन थी. इस सभ्यता की सर्वप्रथम खोज हडप्पा में हुई थी इसी कारण इसे हडप्पा सभ्यता भी कहा जाता है. 
आइये जानें इस सभ्यता के बारे में कुछ महत्वपूर्ण बातें 

भारत का इतिहास सिन्धु घाटी से शुरू हुआ माना जाता है. इस सभ्यता में कई पूर्ण रूप से विकसित नगर मिले हैं जिन्हें अब के नगरों से विकास में कहीं कम नहीं आँका जा सकता है. यहाँ मिले प्रमुख नगरों में मोहनजोदड़ो, सुत्कान्गेडोर, चन्हुदड़ो, आमरी, कालीबंगन, लोथल, बनावली, राखीगढ़ी और धौलावीरा प्रमुख हैं. राखीगढ़ी हडप्पा सभ्यता में मिले नगर में सबसे बड़ा नगर है इस नगर के अवशेष वर्तमान हरियाणा राज्य से मिले हैं. हडप्पा सभ्यता में व्यापार उन्नत था और यहाँ से खेती के भी साक्ष्य मिले हैं। यहाँ से मटर, तिल, खजूर, रुई आदि की खेती के साक्ष्य और कृषि प्रणाली के चिन्ह मिले हैं. 

हडप्पा का नगर नियोजन 

हडप्पा सभ्यता अपनी नगर-नियोजन प्रणाली के लिए विश्व प्रसिद्ध है. यहाँ सड़के एक दूसरे को सम कोण पर काटती थी नालियां ढकी हुई थी सभी घरों के दरवाजे मुख्य रूप से गलियों में खुलते थे. घर एक दो और कुछ जगह तीन मंजिल के भी मिले हैं घरों में रसोई और स्नानागार और आंगन की पर्याप्त सुविधा थी . 
घरों से जल निकासी की पर्याप्त सुविधा थी.
अन्न भंडारों का निर्माण हड़प्पा सभ्यता के नगरों की एक प्रमुख विशेषता थी. 
लोथल और धौलावीरा जैसे स्थानों पर संपूर्ण विन्यास मज़बूत और नगर दीवारों द्वारा भागों में विभाजित थे.

कृषि 
कालीबंगन से कृषि के पर्याप्त साक्ष्य मिले हैं. साथ ही यहाँ के अन्य नगरों से भी गेहूँ, जौ, सरसों, तिल, मसूर आदि के उत्पादन के साक्ष्य मिले हैं. गुजरात के कुछ स्थानों से बाजरा उत्पादन के जबकि लोथल, कोल्डिहवा, और रंगपुर से चावल के प्रयोग के साक्ष्य मिले हैं. 
सिन्धु सभ्यता से ही सर्वप्रथम कपास के साक्ष्य मिले हैं. कालीबंगन से कृषि भूमि पर आड़ी तिरछी रेखाओं के साक्ष्य मिले हैं जो ये दर्शाते हैं कि यहाँ दो या तीन कृषि उपजें एक साथ प्रयोग की जाती थी. 

अर्थव्यवस्था-
हडप्पा सभ्यता से अनगिनत संख्या में मुहरें मिली हैं जिनसे स्पष्ट होता है कि यहाँ व्यापारी वर्ग बड़ी संख्या में उपस्थित था  लोथल से एक मनका निर्माण का कारखाने के भी साक्ष्य मिले हैं. इसके साथ ही यहाँ से एकसमान लिपि, वजन और मापन की पर्याप्त जानकारी के साक्ष्य भी से मिले हैं. 
यहाँ के लोग पत्थर ,धातुओं, सीप या शंख का व्यापर करते थे, यहाँ उत्खनन में मिस्त्र की सभ्यता की मोहरे भी मिली हैं जिससे ये पता चलता है की हडप्पा का व्यापार न केवल आंतरिक था बल्कि बाह्य भी था.   
यहाँ से व्यापार की वस्तु विनिमय प्रणाली के भी पर्याप्त साक्ष्य मिलते हैं. 
लोथल में एक बंदरगाह भी मिला है जिससे साबित होता है कि इनके पास अरब सागर के तट पर कुशल नौवहन प्रणाली भी मौजूद थी.
यहाँ के लोगों ने उत्तरी अफगानिस्तान में अपनी व्यापारिक बस्तियाँ स्थापित की थीं जहाँ से ये लोग मध्य एशिया से सुगमता पूर्वक व्यापार करते थे.  
हड़प्पाई लोग प्राचीन ‘लैपिस लाजुली’ मार्ग से व्यापार करते थे जो संभवतः उच्च लोगों की सामाजिक पृष्ठभूमि से संबधित था.

शिल्पकला -
हड़प्पाई लोग कांस्य मूर्तियाँ बनाने की कला से परिचित थे यहाँ से कांस्य की नृतकी की मूर्ति मिली है जो विश्व प्रसिद्ध है.  
तांबा राजस्थान की खेतड़ी खान से प्राप्त किया जाता था और टिन अनुमानतः अफगानिस्तान से लाया जाता था.
बुनाई उद्योग में प्रयोग किये जाने वाले ठप्पे बहुत सी वस्तुओं पर पाए गए हैं जिनसे पता चलता है कि यहाँ के लोगों को शिल्पकला का पूर्ण ज्ञान था. 
बड़ी-बड़ी ईंट निर्मित संरचनाओं, भव्य इमारतों, पक्की सड़कों और घरों के वास्तुकला के आधार पर यह पता चलता है कि,     नगर में राजगीरी जैसे महत्त्वपूर्ण शिल्प के साथ साथ राजमिस्त्री वर्ग भी रहता था. 
हड़प्पाई नाव, मनका, और मुहरें बनाने की विधि से भली- भाँति परिचित थे. टेराकोटा की मूर्तियों का निर्माण हड़प्पा सभ्यता की महत्त्वपूर्ण शिल्प विशेषता थी. 
मिट्टी के बर्तन बनाने की विधि पूर्णतः प्रचलन में थी, हड़प्पा वासियों की स्वयं की विशेष बर्तन बनाने की विधियाँ थीं, हड़प्पाई लोग चमकदार बर्तनों का निर्माण करते थे.
यहाँ से मिट्टी के खिलौने, दाढ़ी वाले पुरुष की मूर्ति, टेराकोटा और पत्थरों की मूर्तियाँ भी मिली हैं यहाँ से किसी मंदिर के साक्ष्य नहीं मिले हैं लेकिन प्रकृति देवी और एक पुरुष के साक्ष्य मिले हैं जिनके आस-पास कई जंतु हैं जिस कारण इन्हें पशुपति माना जा रहा है.
यहाँ से टेराकोटा बैल, एक सिंग वाले बैल, कुत्ते और अन्य जानवरों के भी साक्ष्य मिले हैं.