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World’s Oldest: जानें दुनिया के सबसे पुराने स्टीम इंजन फेयरी क्वीन की कहानी

भारत में मौजूद है विश्व का सबसे पुराना स्टीम इंजन फेयरी क्वीन। दिल्ली कैंट से रेवाड़ी तक अपना अंतिम सफर पूरा करने के बाद यह इंजन अब रेवाड़ी लोको शेड में पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र है। 

जानें दुनिया के सबसे पुराने स्टीम इंजन फेयरी क्वीन की कहानी
जानें दुनिया के सबसे पुराने स्टीम इंजन फेयरी क्वीन की कहानी

रेल यात्रा के दौरान ट्रेन को खींचने वाले इंजन आकर्षण का केंद्र होते हैं। बदलते दौर के साथ पुराने इंजनों का रंग-रूप भी बदलता जा रहा है, लेकिन क्या आपको पता है कि विश्व का सबसे पुराना और स्टीम से चलने वाला रेल इंजन फेयरी क्वीन आज भी मौजूद है।


इस इंजन ने अपनी अंतिम यात्रा दिल्ली से रेवाड़ी तक पूरी की थी। इसके बाद से यह रेवाड़ी के हेरिटेज लोकोशेड में मौजूद है, जहां यह लोगों के बीच आकर्षण का केंद्र रहता है। आज हम आपको इस लेख के माध्यम से दुनिया के सबसे पुराने इंजन की कहानी के बारे में बताएंगे।  


लोकोमोटिव फेयरी क्वीन इंजन का निर्माण 1855 में इंग्लैंड के लीड्स में किट्सन, थॉम्पसन और हेविट्सन द्वारा किया गया था। निर्माण होने के बाद इसी साल यह भारत में कलकत्ता के नाम से जाना जाने वाला कोलकाता पहुंचा। भारत पहुंचने पर इसकी मालिक कंपनी ईस्ट इंडियन रेलवे कंपनी द्वारा इसे फ्लीट नंबर "22" दिया गया था। खास बात यह है कि दुनिया के सबसे पुराने इंजन को 1895 तक कोई नाम नहीं मिला था। 


शुरुआत में लोकोमोटिव का उपयोग पश्चिम बंगाल में हावड़ा और रानीगंज के बीच हल्की मेल ट्रेनों को चलाने के लिए किया गया था। वहीं, 1857 के भारतीय विद्रोह के दौरान इसके द्वारा सेना की गाड़ियों को खींचा गया था। बाद में इसे बिहार में लाइन निर्माण कार्य के लिए सौंप दिया गया। 1905 में इस इंजन को डैमेज घोषित कर दिया गया था। उस समय इस इंजन को सात बार विदेशी इंजीनियरों ने बनाने का प्रयास किया था। बाद में 1971 में इसे चंदौसी जोनल ट्रेनिंग स्कूल में रेलवे के मॉडल के रूप में स्थापित किया गया। 

जब रेल संग्राहलय से वापस पटरी पर लौटा था इंजन 

चंदौसी जोनल ट्रेनिंग स्कूल से यह इंजन दिल्ली के चाणक्यापुरी स्थित भारतीय रेल संग्राहलय में संरक्षित कर दिया गया था। इस संग्राहलय को एक फरवरी 1977 को खोला गया, जिसके बाद लोग इस इंजन को देखने के लिए पहुंचे। हालांकि, इस इंजन को अभी यहां से आगे का सफर पूरा करना था। 


यही वजह रही कि साल 1997 में एक बार फिर से व्यावसायिक गतिविधियों के लिए यह 18 जुलाई से पटरियों पर उतर गया। पटरी पर लौटने के एक साल बाद यानि 1998 में गिनीज बुक ऑफ रिकॉर्ड्स द्वारा इस इंजन को नियमित संचालन में दुनिया के सबसे पुराने स्टीम लोकोमोटिव के रूप में प्रमाणित किया गया। वहीं, इसके अगले वर्ष फेयरी क्वीन ट्रेन को भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से सबसे नवीन और अद्वितीय पर्यटन परियोजना के लिए राष्ट्रीय पर्यटन पुरस्कार मिला।

2011 में बॉयलर फटने से फिर से थम गए थे पहिये 

अपने सफर के दौरान साल 2011 में इसका बॉयलर फटने से एक बार फिर से इस इंजन के पहिये थम गए थे। बॉयलर फटने के बाद इसका पटरी पर लौटना मुश्किल था, लेकिन रेलवे के इंजीनियरों ने  त्रिचुरापल्ली में नया बॉयलर तैयार किया, जिसके बाद शकूर बस्ती में बॉयलर बदलने के साथ इंजन के अन्य कल-पुर्जे ठीक कर इसे चलने लायक बनाया गया। पहले इस इंजन की रफ्तार 10 किमी प्रति घंटा हुआ करती थी। बाद में  इसे बढ़ाकर 90 किमी प्रतिघंटा किया गया। 

दिल्ली से अलवर के बीच भी यात्रा कर चुका है स्टीम इंजन

फेयरी क्वीन इंजन वाली हेरिटेज ट्रेन को राजस्थान सरकार के प्रयास से 2004 में पटरी पर लाया गया था। राजस्थान के शाही अंदाज का अहसास कराने वाली यह ट्रेन दिल्ली से अलवर के बीच भी चला करती थी। यह शनिवार को दिल्ली से अलवर व रविवार को अलवर से दिल्ली चला करती थी। मुसाफिरों को राजस्थान पर्यटन विभाग की मदद से बाला किला, सिलीसेढ़ झील और सरिस्का नेशनल पार्क आदि देखने का मौका मिलता था।