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Sun Smiling: नासा ने शेयर की सूर्य की मुस्कुराती हुई इमेज, जानें आखिर क्या हैं इसका अर्थ

हाल ही में अमेरिकी स्पेस एजेंसी नासा ने सूर्य की एक मुस्कुराती हुई तस्वीर शेयर की है. हालाकिं ये तस्वीर वैज्ञानिकों के लिए एक चिंता का विषय भी है आइये जानें इस स्माइलिंग तस्वीर के कारण और पृथ्वी पर पड़ने वाले इसके प्रभाव के बारे में

Sun Smiling
Sun Smiling

क्या आपने कभी ऐसा सोचा हैं कि हमारी पृथ्वी पर ऊर्जा का एकमात्र स्त्रोत सूर्य पास से कैसा दिख सकता है? हाल ही में अमेरिकी अन्तरिक्ष एजेंसी नासा ने सूर्य की एक मुस्कुराती हुई प्यारी सी इमेज अपने ट्वीटर हैंडल पर शेयर की है. ये तस्वीर नासा की सोलर डायनेमिक्स ऑब्जर्वेटरी द्वारा ली गई है. हालाकिं अल्ट्रा वायलेट किरणों में देखने पर इन काले धब्बों को कोरोनल होल (Coronal holes) कहा जाता है. 

क्या होता है कोरोनल होल?

 कोरोनल होल सूर्य के वायुमंडल में ऐसे क्षेत्र हैं जो सूर्य के एक्स-रे और अल्ट्रावायलेट छवियों में काले दिखाई देते हैं। ये अपनी आस-पास के क्षेत्र की तुलना में गहरे रंग के इसलिए दिखाई देते हैं क्योंकि वे आसपास के प्लाज्मा (electrified gas) की तुलना में कम घनत्व और तुलनात्मक रूप से ठन्डे क्षेत्र होते हैं और ये ओपन मैग्नेटिक फील्ड के क्षेत्र होते हैं. जहाँ सौर हवाएं बिना किसी बाधा के स्वत्रंत हो कर चलती हैं इन हवाओं को अक्सर इंटरप्लानेटरी स्पेस में संरचनाओं के विश्लेषण के संदर्भ में उच्च गति धारा के रूप में जाना जाता है. कोरोनल होल कुछ हफ्तों से लेकर महीनों तक रह सकते हैं. ये होल एक अनोखी घटना नहीं है, ये सूर्य के लगभग 11 साल के सौर चक्र में दिखाई देती है. 

आखिर क्या असर होता है इन सौर होल का ? 

वर्ष 2016 में सूर्य की सतह पर ये सोलर होल 6 से 8 की संख्या में मिले थे तब नासा ने बताया था कि "ये 'कोरोनल होल' पृथ्वी के चारों ओर के अंतरिक्ष वातावरण को समझने के लिए महत्वपूर्ण हैं जिसके माध्यम से हमारी तकनीक और अंतरिक्ष यात्री यात्रा करते हैं. 

हालाँकि इन कोरोनल होलों के बनने का कारण अभी तक स्पष्ट नहीं है, ये सूर्य के उन क्षेत्रों से संबंधित होते हैं जहां चुंबकीय क्षेत्र सतह पर वापस लूप किए बिना ऊपर और दूर चले जाते हैं. वैज्ञानिक इन तेज सौर पवन धाराओं का अध्ययन इसलिए करते हैं, क्योंकि ये हवाएं कभी-कभी पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र को भी प्रभावित करती हैं. जिसे भू-चुंबकीय तूफान कहा जाता है. इन भू-चुंबकीय तूफानों से न केवल विभिन्न उपग्रह प्रभावित होते हैं बल्कि पृथ्वी के संचार तंत्र भी प्रभावित होता है.  

भू-चुंबकीय तूफान कैसे प्रभावित करता है पृथ्वी को ?

अमेरिकी एजेंसी नेशनल ओशनिक एंड एटमॉस्फेरिक एडमिनिस्ट्रेशन यानी NOAA के अनुसार, भू-चुंबकीय तूफान (geomagnetic storms) पृथ्वी के मैग्नेटोस्फीयर यानी चुम्बकीय मंडल से संबंधित है. चुम्बकीय मंडल किसी ग्रह के चारों और का ऐसा स्थान होता है जो मैग्नेटिक फील्ड से प्रभावित होता है. जब एक उच्च गति वाली सौर धारा पृथ्वी पर आती है, तो कुछ विशेष परिस्थितियों में ये ऊर्जावान सौर पवने ध्रुवों पर वायुमंडल से टकराती हैं. ये भू-चुंबकीय तूफान मैग्नेटोस्फीयर की एक बड़ी अशांति का कारण बनते हैं क्योंकि इन सौर पवनों से पृथ्वी के आसपास के अंतरिक्ष वातावरण में ऊर्जा का पर्याप्त प्रवाह होता है।

तीव्र सौर पवनों के पृथ्वी पर पहुंचने की स्थिति में, परिणामी भू-चुंबकीय तूफान, पृथ्वी के ऊपरी वायुमंडल यानी आयनोस्फीयर में परिवर्तन का कारण बन सकतें हैं. आयनोस्फीयर पृथ्वी की सबसे बाहरी परत होती है इसकी ऊंचाई 80 km से शुरू होती है और पृथ्वी के संचार माध्यम के लिए इस परत का प्रयोग होता है. अर्थात रेडियो और जीपीएस के सिग्नल वायुमंडल की इस परत से परावर्तित हो कर गुजरते हैं, और इसलिए संचार माध्यम भी प्रभावित हो सकते हैं.