1. Home
  2. Hindi
  3. जानिये क्या हैं कार्बन डेटिंग जिससे निकाली जाएगी ज्ञानवापी शिवलिंग की उम्र

जानिये क्या हैं कार्बन डेटिंग जिससे निकाली जाएगी ज्ञानवापी शिवलिंग की उम्र

साइंस दिन प्रतिदिन ऐसे अविष्कार कर रहा है जिससे हम सिर्फ अपना भविष्य ही  नही संवार रहे बल्कि अतीत के बारे में भी बेहतर तरीके से जान सकते हैं . आइये जानते है ऐसी ही एक विधि के बारे में जिसका नाम है कार्बन डेटिंग.

 what is carbon dating going to use to know the age of gyanvapi shivling
what is carbon dating going to use to know the age of gyanvapi shivling

वाराणसी की जिला अदालत ने 22 सितम्बर को  ज्ञानवापी मामले में एक याचिका पर सुनवाई की है जिसमें  हिन्दू पक्ष की ओर से यह याचिका दायर की गयी है कि कार्बन डेटिंग के ज़रिये यह पता लगाया जाए कि वहां मौजूद शिवलिंग मस्जिद से पुराना है . साथ ही कोर्ट ने दूसरे पक्ष को इस याचिका पर आपत्ति जानने के लिए भी नोटिस जारी किये हैं. 

लेकिन क्या आप जानते हैं कि कार्बन डेटिंग क्या है यदि नहीं तो यहाँ पढ़े पूरी जानकारी 

क्या है कार्बन डेटिंग 

source: socratic.com

कार्बन डेटिंग एक विधि है जिसे व्यापक रूप से प्रयोग किया जाता है . इस प्रक्रिया के तहत कार्बोनिक पदार्थो की आयु का पता लगाया जाता है जो की पहले कभी जीवित रही हो क्योंकि जीवित चीजों में किसी न किसी रूप में कार्बन मौजूद होता है . इस विधि में कार्बन 12 और कार्बन 14 के बीच अनुपात देखा जाता है . कार्बन 14 एक तरीके का कार्बन रेडिओधर्मी आइसोटोप है जिसकी आधी जीवन सीमा 5730 वर्ष है इसलिए ही कार्बन डेटिंग को रडियोधर्मी पदार्थो की आयु जानने के लिए इस्तेमाल किया जाता है . यह विधि वैज्ञानिक तथ्यों को जानने में बेहद कारगार साबित होती है .हमारे वातावरण में जिस कार्बन का आइसोटोप सबसे अधिक मात्र में पाया जाता है वह कार्बन 12 है हालांकि थोड़ी मात्रा में कार्बन 14 भी मौजूद है साथ ही इन दोनों का अनुपात भी स्थिर है. 

कार्बन डेटिंग का इतिहास 

कार्बन डेटिंग तकनीक का आविष्कार 1949 में विलियर्ड लिबी ने अपने साथियों के साथ मिलकर शिकागो यूनिवर्सिटी में किया था . अपने इस आविष्कार से उन्होंने सबसे पहले एक लकड़ी की आयु का पता लगाया था .अपने इस आविष्कार के लिए इन्हें 1960 में रसायन विज्ञान के नोबेल पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया था . इस विधि को एब्सोलुट डेटिंग भी कहा जाता है . हालांकि कुछ वैज्ञानिकों का मानना है की इस विधि के माध्यम से केवल अनुमानित आय का ही पता लगाया जा सकता है. इस विधि का प्रयोग अधिकांश तौर पर पर्यावरण विज्ञान, पुरातत्व और मानव विज्ञान के द्वारा किया जाता है.

 

 जीवित वस्तुओं में कार्बन डेटिंग 

पौधे और जानवरों की आयु का अनुमान कार्बन डेटिंग के द्वारा लगाया जा सकता है  क्योंकि दोनों में ही कार्बन मौजूद होता है . पौधे फोटो सिंथेसिस के द्वारा कार्बन प्राप्त करते हैं जबकि जानवर अपने भोजन के द्वारा कार्बन प्राप्त करते हैं . हालांकि दोनों ही तरीकों में कार्बन वातावरण से लिया जा रहा है इसलिए इन दोनों में उसी मात्रा  में  कार्बन 12 और कार्बन 14 आइसोटोप मौजूद होता है जैसा की स्वयं वातावरण में होता है .  लेकिन इनकी मृत्यु के बाद वातारण से  कार्बन का प्रभाव भी खत्म हो जाता है इसलिए इनकी  मृत्यु के बाद इनके शरीर में कार्बन 12 और कार्बन 14 का अनुपात भी बदलना शुरू हो जाता है . हालांकि इस बदलाव को मापा जा सकता है जिससे की जीव का मृत्यु का अनुमानित समय भी पता लगाया जा सकता है . 

अजीवित वस्तुओं में कार्बन डेटिंग

यकीनन कार्बन डेटिंग एक बेहद कारगार विधि है जिसका प्रयोग बहुत से वैज्ञानिक कार्यों में किया गया है लेकिन फिर भी यह विधि अजीवित वस्तुओं जैसे की चट्टान इत्यादि के मामले में कारगर साबित नही हो पा रही है . इसके अलावा जिन वस्तुओं की आयु  40,000- 50,000 की सीमा तक पहुँच गयी है उनके बारे में जानना इस विधि से मुश्किल है . गौरतलब है कि कुछ मामलों में कार्बन डेटिंग को इन डायरेक्ट तरीके से इस्तेमाल कर लिया जाता है जैसे की ग्लेशियर और पोलर क्षेत्रों में आइस कोर की उम्र पता लगा लेने के लिए कार्बन डेटिंग का इस्तेमाल किया जाता है . 

 यकीनन कार्बन डेटिंग के द्वारा आयु का अनुमान लगाया जाता है और साथ ही याचिकाकर्ताओं ने इस जाँच के लिए याचिका भी दायर की है लेकिन फिर भी अभी तक यह सुनिश्चित नहीं हुआ है की क्या ज्ञानवापी शिवलिंग की जांच के लिए कार्बन डेटिंग का इस्तेमाल किया जाएगा या नही . हालांकि इस मामले में यह दलील भी सामने आ रही है की शिवलिंग के नीचे दबे हुए पौधे इत्यादि के ज़रिये किसी भी फैसले तक पहुंचना उचित नही है क्योंकि उनकी आयु पर उन्मूलन का भी असर देखने को मिलता है .