By Priyanka Pal18, Jul 2024 06:00 AMjagranjosh.com
कबीरदास के दोहे
भारतीय संत कवि उनके दोहे जीवन के विभिन्न पहलुओं पर गहरे और सच्चे अनुभवों को सरल और सहज भाषा में व्यक्त करते हैं।
साधु ऐसा चाहिए, जैसा सूप सुभाय। सार-सार को गहि रहै, थोथा देई उड़ाय।
ऐसे व्यक्ति की तलाश करें जो सूप की तरह हो, जो उपयोगी और महत्वपूर्ण चीजों को रखे और निरर्थक चीजों को हटा दे।
माला फेरत जुग गया, गया न मन का फेर। कर का मनका डार दे, मन का मनका फेर।
माला फेरते-फेरते उम्र बीत गई, लेकिन मन का बदलाव नहीं हुआ। माला के मोतियों को छोड़ो और मन के मोतियों को फेरो।
बड़ा हुआ तो क्या हुआ, जैसे पेड़ खजूर। पंथी को छाया नहीं, फल लागे अति दूर।
ऐसे व्यक्ति के बड़े होने का कोई फायदा नहीं होता जो अपनी जिम्मेदारियों को ना समझे, वे खजूर के पेड की तरह होता है न तो राहगीरों को छाया देता है और न ही फल आसानी से मिलता है।
रहिमन धागा प्रेम का, मत तोड़ो चटकाय। टूटे से फिर ना जुड़े, जुड़े गांठ पड़ जाय।
प्रेम का बंधन बहुत नाजुक होता है। इसे तोड़ने की कोशिश मत करो, क्योंकि एक बार टूटने के बाद यह फिर से जुड़ नहीं सकता और अगर जुड़ भी गया तो उसमें गांठ पड़ जाती है।
पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय। ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय।
किताबें पढ़ने से कोई पंडित नहीं बनता। सच्चा ज्ञान प्रेम के ढाई अक्षर को समझने से आता है।
तिनका कबहुं ना निंदिये, जो पांवन तले होय। कबहुँ उड़ी आंखिन पड़े, तो पीर घनेरी हो
छोटे से छोटे व्यक्ति का भी अपमान नहीं करना चाहिए। अगर वह तिनका जो पांव के नीचे होता है, आंख में चला जाए तो बहुत पीड़ा होती है।
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