By Priyanka Pal15, May 2024 05:50 PMjagranjosh.com
भारतीय संस्कृति का प्रतिबिंब लोककलाओं में झलकता है। इन्हीं लोककलाओं में कठपुतली कला भी शामिल है। यह देश की सांस्कृतिक धरोहर होने के साथ-साथ प्रचार-प्रसार का सशक्त माध्यम भी हैं।
कठपुतली
कठपुतली कला इंसानों की सबसे उल्लेखनीय और सरल आविष्कारों में से एक है। इस कला का इतिहास बहुत पुराना है।
कठपुतली नाटक
ईसा पूर्व चौथी शताब्दी में पाणिनी की अष्टाध्यायी में नटसूत्र में कठपुतली नाटक का उल्लेख मिलता है। कहानी सिंहासन बत्तीसी में भी विक्रमादित्य के सिंहासन की बत्तीस पुतलियों का उल्लेख है।
कठपुतली कला के प्रकार
धागा कठपुतली, यह शैली अत्यंत समृद्ध और प्राचीन है। राजस्थान, उड़ीसा, कर्नाटक और तमिलनाडु में यह शैली बहुत लोकप्रिय है।
छाया कठपुतली
इस शैली में कठपुतलियां चपटी होती हैं, यह शैली उड़ीस, केरल, आन्ध्र प्रदेश, कनार्टक, महाराष्ट्र और तमिलनाडु में बहुत लोकप्रिय है।
दस्ताना कठपुतली
इस शैली को भुजा, कर या हथेली पुतली भी कहा जाता है। इस शैली में अंगूठे और दो अंगुलियों की सहायता से कठपुतलियां सजीव हो उठती है। उत्तर प्रदेश, उड़ीसा, पश्चिमी बंगाल और केरल में लोकप्रिय है।
छड़ कठपुतली
यह शैली वैसे तो दस्ताना कठपुतली का अगला चरण है लेकिन यह उससे काफी बड़ी होती है। यह कला पश्चिमी बंगाल तथा उड़ीसा में बहुत लोकप्रिय है।
प्राचीनतम कला
कठपुतली कला विश्व के प्राचीनतम कलाओं में से एक है जिसे रंगमंच प्रदर्शित किया जाता है। इस कला में विभिन्न प्रकार की गुड्डे गुड़ियों, जोकर आदि पात्रों के रूप में बनाया जाता है।
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