भारत के आधुनिक इतिहास और स्वतंत्रता संग्राम में हमें एक महत्त्वपूर्ण घटना पढ़ने को मिलती है। यह घटना सूरत अधिवेशन में हुई थी, जो कि 1907 में हुआ था। इस घटना को सूरत विभाजन के नाम से जाना जाता है, जिससे देश के स्वतंत्रता संंग्राम को नई दिशा मिली थी। आज भी भारतीय इतिहास में इस अधिवेशन को महत्त्वपूर्ण माना जाता है, जिसे लेकर अक्सर परीक्षाओं में सवाल पूछे जाते हैं।
सूरत विभाजन में क्या हुआ था
गुजरात के सूरत में दिसंबर, 1907 में ताप्ती नदी के किनारे कांग्रेस का वार्षिक अधिवेशन चल रहा था, जिसमें अलग-अलग विचारों के कारण भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस दो धड़ों यानि कि नरम दल (Moderates) और गरम दल (Extremists) में विभाजित हो गई थी।
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क्या था विभाजन का मुख्य कारण
1905 में जब बंगाल का विभाजन हुआ, तो कांग्रेस में अलग-अलग विचारधाराओं की वजह से तनाव बढ़ गया था। नरम दल में गोपाल कृष्ण गोखले और फिरोज शाह मेहता जैसे नेता थे, जिनका मानना था कि अंग्रेजों के खिलाफ Prayer, Petition और Protest के जरिये अपनी आवाज उठानी चाहिए।
वहीं, गरम दल में लाला लाजपत राय, बाल गंगाधर तिलक और बिपिन चंद्रपाल थे, जिनका मानना था कि अंग्रेजों के सामने हाथ जोड़ने के बजाय आंदोलन को पूरे देश में फैलाना होगा और स्वराज हासिल करना होगा।
अध्यक्ष पद को लेकर हो गया था विवाद
सूरत अधिवेशन में गरम दल वाले चाहते थे कि अधिवेशन का अध्यक्ष लाला लाजपत राय या बाल गंगाधर तिलक को बनाया जाए, लेकिन नरम दल वाले इसके सख्त खिलाफ थे। दरअसल, इस अधिवेशन को नागपुर में करने का निर्णय लिया गया था, जो कि गरम दल का गढ़ हुआ करता था। हालांकि, अंतिम समय पर इसे सूरत में करने का निर्णय लिया गया, जिससे तिलक के समर्थकों का प्रभाव कम हो सके।
सूरत अधिवेशन में क्या हुआ?
इस अधिवेशन में पहले से ही माहौल गर्म था। नरम दल की ओर से डॉ. रास बिहारी घोषको कांग्रेस का अध्यक्ष घोषित कर दिया गया। वहीं, गरम दल के नेता रहे बाल गंगाधर तिलक मंच से स्वदेशी और बहिष्कार के प्रस्तावों पर अपनी बात रखना चाहते थे, लेकिन उन्हें बोलने की अनुमति नहीं मिली।
इस वजह से अधिवेशन में दोनों पक्षों के बीच बहस हो गई थी, जिसके बाद पुलिस को बुलाना पड़ा और अधिवेशन स्थगित हो गया। इस अधिवेशन के बाद गरम दल के नेता और उनके समर्थक कांग्रेस से बाहर हो गए थे।
बाल गंगाधर तिलक को हुई जेल
इस अधिवेशन में हुई फूट का फायदा उठाते हुए अंग्रेजों ने बाल गंगाधर तिलक पर 1908 में राजद्रोह चलाया और उन्हें म्यांमार की मांडले जेल में डाल दिया। वहीं, दोनों पक्षों के अलग होने से राष्ट्रीय आंदोलन धीमा हो गया था।
