दिवाली भारत का सबसे बड़ा त्योहार है। सांस्कृतिक, धार्मिक और ऐतिहासिक रूप से इस त्योहार का अधिक महत्त्व है। यही वजह है कि हिंदू धर्म में दिवाली का पर्व बहुत ही विशेष स्थान रखता है। देश के अलग-अलग राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में हमें दिवाली की अलग-अलग रौनक देखने को मिलती है।
रोशनी का यह पर्व दीयों और लाइट की रोशनी से हर शहर, गली और कूंचे को रोशन करता है। इस कड़ी में क्या आप जानते हैं कि भारत का वह राज्य कौन-सा है, जिसे ‘दिवाली का दिल’ भी कहा जाता है। इस लेख में हम इस बारे में विस्तार से जानेंगे।
किस राज्य को कहते हैं ‘दिवाली का दिल’
भारत में उत्तर प्रदेश को सांस्कृतिक और पौराणिक लिहाज से ‘दिवाली का दिल’ (Heart of Diwali) कहा जाता है। इसके पीछे के मुख्य ऐतिहासिक और सांस्कृतिक कारण हैं, जो कि हम नीचे जानेंगे।
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क्यों कहते हैं ‘दिवाली का दिल’
यूपी को ‘दिवाली का दिल’ कहने के पीछे अलग-अलग कारण हैं, जो कि इस प्रकार हैंः
अयोध्याःदिवाली की मूल जन्मस्थली
हिंदू धर्म के मुताबिक, दीपावली के पूरे उत्सव की शुरुआत भगवान श्रीराम के 14 वर्ष के वनवास और लंका विजय के बाद अपनी जन्मभूमि अयोध्या लौटने से जुड़ी है। त्रेतायुग में उनके आगमन पर अयोध्यावासियों ने पूरी नगरी को घी के दीयों से सजाकर स्वागत किया था, जो इस त्योहार की मूल ऐतिहासिक नींव है।
अयोध्या का विश्व रिकॉर्ड 'दीपोत्सव'
आधुनिक समय में उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा अयोध्या में सरयू तट पर हर साल आयोजित होने वाला 'दीपोत्सव' गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में दर्ज होता है। यहां 25 लाख से अधिक मिट्टी के दीये एक साथ जलाए जाते हैं, जो पूरी दुनिया में दिवाली के सबसे भव्य रूप को दिखाता है।
वाराणसी की प्रसिद्ध 'देव दीपावली'
दिवाली के ठीक 15 दिन बाद यानि कार्तिक पूर्णिमा को उत्तर प्रदेश के वाराणसी में 'देव दीपावली' मनाई जाती है। लाखों दीपों की रोशनी से जगमगाते घाट इसे वैश्विक पहचान दिलाते हैं।
ब्रज क्षेत्र की गोवर्धन पूजन
दिवाली के अगले दिन मथुरा-वृंदावन यानि ब्रज क्षेत्र में भगवान श्रीकृष्ण द्वारा गोवर्धन पर्वत उठाने की लीला को लेकर अन्नकूट महोत्सव और गोवर्धन पूजा मनाई जाती है, जो इस पूरे 5-दिवसीय पर्व का एक अहम केंद्र है।
व्यापारिक लिहाज से दूसरा नाम है 'गुजरात'
यदि आर्थिक और पारंपरिक व्यापारिक रूप से देखा जाए, तो गुजरात को भी दिवाली का वाणिज्यिक केंद्र माना जाता है। यहां दिवाली साल का सबसे बड़ा उत्सव होती है, जिसके अगले दिन गुजराती नववर्ष यानि बेस्तू वरस शुरू होता है। सर्राफा, कपड़ा और डायमंड मार्केट में नए बहीखाते की सबसे बड़ी परंपरा यहीं देखने को मिलती है।
