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भारत में उच्च न्यायालय

Last Updated: Jun 25, 2016, 12:21 IST

भारतीय संविधान के अनुसार, अनुच्छेद 214– 231 भारत में उच्च न्यायालय के प्रावधानों के बारे में हैं। यह अलग– अलग राज्यों के लिए अलग– अलग उच्च न्यायालयों का प्रावधान करता है लेकिन सातवें (7वें) संविधान संशोधन अधिनियम के अनुसार एक ही उच्च न्यायालय एक से अधिक राज्य का न्यायालय हो सकता है। वर्तमान में देश में 24 उच्च न्यायालय हैं। इसमें 3 सार्वजनिक उच्च न्यायालय भी हैं।

भारत में उच्च न्यायालय
भारत में उच्च न्यायालय

भारतीय संविधान के अनुसार, अनुच्छेद 214– 231 भारत में उच्च न्यायालय के प्रावधानों के बारे में हैं। यह अलग– अलग राज्यों के लिए अलग– अलग उच्च न्यायालयों का प्रावधान करता है लेकिन सातवें (7वें) संविधान संशोधन अधिनियम के अनुसार एक ही उच्च न्यायालय एक से अधिक राज्य का न्यायालय हो सकता है। वर्तमान में देश में 24 उच्च न्यायालय हैं। इसमें 3 सार्वजनिक उच्च न्यायालय भी हैं।

उच्च न्यायालय:-

भारतीय संविधान के अनुसार, अनुच्छेद 214– 231 भारत में उच्च न्यायालय के प्रावधानों के बारे में हैं। यह अलग– अलग राज्यों के लिए अलग– अलग उच्च न्यायालयों का प्रावधान करता है लेकिन सातवें (7वें) संविधान संशोधन अधिनियम के अनुसार एक ही उच्च न्यायालय एक से अधिक राज्य का न्यायालय हो सकता है। वर्तमान में देश में 24 उच्च न्यायालय हैं। इसमें 3 सार्वजनिक उच्च न्यायालय भी हैं।

संविधान और उच्च न्यायालयों की संरचना:-

प्रत्येक उच्च न्यायालय में मुख्य न्यायाधीश और कई जज होते हैं, जिनकी नियुक्ति समय– समय पर राष्ट्रपति द्वारा की जाती है। अनुच्छेद 217 जजों की नियुक्ति के बारे में है और कहता है कि उच्च न्यायालय के प्रत्येक जज की नियुक्ति राष्ट्रपति भारत के मुख्य न्यायाधीश और राज्य के राज्यपाल के साथ विचार–विमर्श कर स्वहस्ताक्षरित अधिपत्र द्वारा करेंगे।

उच्च न्यायालय के क्षेत्राधिकार और शक्तियां:

उच्च न्यायालय के क्षेत्राधिकार और शक्तियां निम्नलिखित शीर्षों के अंतर्गत वर्गीकृत की जा सकती हैं–

(1) वास्तविक न्याय सीमा– इसका मतलब है आवेदक सीधे उच्च न्यायालय में जा सकता है और उसे अपील के माध्यम से जाने की जरूरत नहीं है। इस शक्ति का इस्तेमाल निम्नलिखित मामलों में किया जा सकता है–

  • संसद और राज्य विधान सभा के सदस्यों से संबंधित विवाद ।
  • विवाह, कानून, सहमती से तलाक, अदालत की अवमानना ।
  • मौलिक अधिकारों का हनन ( सुप्रीम कोर्ट के पास भी यह शक्ति है)।
  • दूसरे अदालतों से स्थांतरित मामले जिसमें कानून के सवाल शामिल हों।

(2) रिट न्याय सीमा– अनुच्छेद 226 कहता है कि उच्च न्यायालय अपने न्याय सीमा के भीतर आने वाले सभी उचित मामलों, किसी भी सरकार समेत किसी भी व्यक्ति या अधिकारी को निर्देश, आदेश या रिट जारी कर सकता है।

(3) अपीलीय न्याय सीमा– कहा जाता है कि अपील करने का प्राथमिक अदालत उच्च न्यायालय है यानि उच्च न्यायालय के पास अपनी सीमाओं के भीतर आने वाले अधीनस्थ अदालतों के फैसलों के खिलाफ अपील की सुनवाई करने की शक्ति है। इस शक्ति को दो श्रेणियों में बांटा जा सकता है– नागरिक न्याय सीमा और आपराधिक न्याय सीमा ।

नागरिक मामलों में इसकी न्याय सीमा में जिला अदालतों, अतिरिक्त जिला अदालतों और अन्य अधीनस्थ अदालतों के आदेश और फैसले आते हैं।

आपराधिक मामलों में इसकी न्याय सीमा में सत्र अदालतों (सेशंस कोर्ट्स) और अतिरिक्त सत्र अदालत (एडिशनल सेशंस कोर्ट) से संबंधित फैसले आते हैं। इन मामलों में 7 वर्ष से अधिक के कारावास की सजा, सत्र अदालत द्वारा दी गई मौत की सजा का क्रियान्वयन से पहले पुष्टि, को शामिल किया जाना चाहिए।

(4) अधीक्षण/ पर्यवेक्षण का अधिकार–

राज्य में सशस्त्र बलों के मामलों का निपटारा करने वाली अदालतों को छोड़कर सभी अदालतों और ट्रिब्यूनलों के अधीक्षण का अधिकार उच्च न्यायालय के पास होता है। इसलिए इस अधिकार का उपयोग कर उच्च न्यायालय निम्नलिखित कार्य कर सकता है–

  • ऐसी अदालतों से वापस बुलाना।
  • ऐसी अदालतों की प्रथाओं और कार्यवाही को विनियमित करने के लिए सामान्य नियम जारी कर सकता है और उसका प्रारूप तय कर सकता है।
  • किसी भी अदालत के अधिकारियों द्वारा रखे जा रहे किताबों और लेखा के प्रारूप को निर्धारित कर सकता है।
  • शेरिफ क्लर्क, अधिकारी और वकीलों को देय फीस तय करता है।

संविधान अधीनस्थ अदालतों पर उच्च न्यायालय के अधीक्षण के इस अधिकार पर किसी प्रकार का कोई प्रतिबंध नहीं लगाता, यह किसी व्यक्ति द्वारा अपील के माध्यम से ही हो ऐसा नहीं है, यह स्वतः संज्ञान से भी हो सकता है। यह संशोधन की प्रकृति वाला है क्योंकि यह पहले किए गए फैसलों की पुष्टि करता है। इस संदर्भ में यह विशेष कार्य के तौर पर माना जाता है क्योंकि सुप्रीम कोर्ट के पास भी उच्च न्यायालय के इस अधिकार जैसा कोई अधिकार नहीं है।

(5) अधीनस्थ अदालतों पर नियंत्रण
यह उपर दिए गए अधीक्षण और अपीलीय न्याय सीमा का विस्तार है। यह कहता है कि उच्च न्यायालय किसी भी अधीनस्थ अदालत में लंबित मामले को, अगर उसमें कानून के महत्वपूर्ण प्रश्न शामिल हों तो, उसे अपने पास ला सकता है। मामला को यहां निपटाया जा सकता है या कानून के प्रश्न का जवाब दिया जा सकता है या उसी अदालत को वापस भेजा जा सकता है। दूसरे मामले में उच्च न्यायालय द्वारा प्रस्तुत राय को मानना अधीनस्थ अदालत के लिए बाध्यकारी होगा। यह अपने सदस्यों के पोस्टिंग प्रोमोशन(पदोन्नति), छुट्टी देना, स्थांतरण और अनुशासन से संबंधित मामलों को भी देखता है। इस संबंध में यह मुख्य न्यायाधीश द्वारा दिए गए अधिकारियों और कर्मचारियों या मुख्य न्यायाधीश के निर्देशानुसार उच्च न्यायालय के ऐसे अन्य जजों को नियुक्त करता है।

(6) कोर्ट ऑफ रिकॉर्ड– इसमें फैसले, कार्यवाही और उच्च न्यायालय के कृत्यों को सर्वकालिक स्मृति के लिए दर्ज किया जाना शामिल है। इन रिकॉर्डों पर किसी भी अदालत में सवाल नहीं उठाए जा सकते। इस रिकॉर्ड के आधार पर उच्च न्यायालय को अदालत की अवमानना करने के लिए साधारण जेल या जुर्माना या दोनों एक साथ देने का अधिकार है।

(7) न्यायिक समीक्षा–

उच्च न्यायालय के अधिकार क्षेत्र में केंद्र और राज्य सरकार के विधायी और कार्यकारी आदेशों की संवैधानिकता की जांच करने का अधिकार भी शामिल है। ध्यान देने की बात है कि हमारे संविधान में कहीं भी न्यायिक समीक्षा शब्द का उल्लेख नहीं है लेकिन अनुच्छेद 13 और अनुच्छेद 226 स्पष्ट रूप से उच्च न्यायालय को यह अधिकार प्रदान करता है।

(8) केंद्र शासित प्रदेशों तक उच्च न्यायालय के अधिकार क्षेत्र का विस्तार–

संसद, कानून बनाकर उच्च न्यायालय के न्याय सीमा को किसी भी केंद्र शासित प्रदेश तक विस्तार या केंद्र शासित प्रदेश को उसके अधिकार क्षेत्र से बाहर कर सकती है।

भारत में न्यायिक प्रणाली का क्रम:

न्यायाधीशों को हटाए जाने की प्रक्रियाः
न्यायाधीशों का जांच अधिनियम उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों को हटाने या उन पर महाभियोग को नियंत्रित करता है। इसलिए उन्हें हटाने का आधार है–

  • सिद्ध दुर्व्यवहार
  • अक्षमता

इन्हें संसद के दोनों सदनों द्वारा विशेष बहुमत अर्थात सदन के कुल सदस्यों का बहुमत और उपस्थित एवं मतदान में शामिल होने वाले सदस्यों के कम– से–कम दो तिहाई सदस्यों का बहुत, द्वारा हटाए जाने संबंधी आदेश के पारित किए जाने के अनुसार राष्ट्रपति द्वारा हटाया जाता है। विस्तृत प्रक्रिया इस प्रकार है–

  1. हटाने संबंधि आरंभिक प्रस्ताव पर लोकसभा में 100 सदस्यों या राज्य सभा में 50 सदस्यों द्वारा हस्ताक्षर किया जाता है और उसे सदन के स्पीकर/ अध्यक्ष के समक्ष प्रस्तुत किया जाता है।
  2. अध्यक्ष के पास प्रस्ताव को स्वीकारने या खारिज करने का विकल्प होता है।
  3. अगर इसे स्वीकार कर लिया गया तो मामले की जांच के लिए एक समिति का गठन किया जाएगा।
  4. इस प्रकार गठित समिति में मुख्य न्यायाधीश या सुप्रीम कोर्ट के जज, उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश और एक प्रतिष्ठित विधिवेत्ता होता है।
  5. अगर समिति जज को दोषी पाती है तो सदन मामले पर विचार करता है।
  6. अगर विशेष बहुमत द्वारा संसद के प्रत्येक सदन में प्रस्ताव पारित हो जाता है तो बाद में इसे राष्ट्रपति के पास उनकी अनुमति के लिए प्रस्तुत किया जाता है।
  7. इसके बाद राष्ट्रपति जज को हटाए जाने का आदेश पारित करते हैं। जज को उस दिन से हटा दिया जाता है।( वास्तव में आज तक किसी भी जज को नहीं हटाया गया है।)

एक उच्च न्यायालय से दूसरे उच्च न्यायालय में एक जज का स्थानांतरण (अनुच्छेद 222)– इसके अनुसार भारत के मुख्य न्यायाधीश से विचार–विमर्श के बाद राष्ट्रपति एक जज को एक उच्च न्यायालय से दूसरे उच्च न्यायालय में स्थांतरित कर सकते हैं। इसके अलावा जब एक जज को इस प्रकार स्थांतरित किया जाता है तो अपनी सेवा की अवधि के दौरान, दूसरे उच्च न्यायलय के जज बनाए जाने संविधान अधिनियम प्रारंभ होने के बाद, वह अपने वेतन के अलावा संसद द्वारा कानून द्वारा निर्धारित या राष्ट्रपति के आदरेश से निर्धारित ऐसे अतिरिक्त भत्ते का हकदार होगा।

1977 के आखिर में के अशोक रेड्डी मामले में जजों के मनमानी स्थांतरण के मामले में न्यायिक समीक्षा की जाने की जरूरत है। इसलिए स्थांतरित किए जाने वाले जज के पास ही सिर्फ इसे चुनौति देने का अधिकार है।

कार्यकारी चीफ जस्टिस (मुख्य न्यायाधीश) की नियुक्ति (अनुच्छेद 223)– जब उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश का कार्यालय खाली हो या अनुपस्थिति या किसी अन्य कारण से ऐसे कोई मुख्य न्यायाधीश अपने कार्यालय में काम करने में अक्षम हों, तब कार्यालय का काम राष्ट्रपति द्वारा इस उद्देश्य के लिए नियुक्त किए गए दूसरे जज करेंगें।

हालांकि, राज्य ने न्यायिक सेवा के जिला न्यायाधीशों के अलावा अन्य कर्मचारियों की नियुक्ति राज्य के राज्यपाल राज्य लोक सेवा आयोग और राज्य के उच्च न्यायालय के साथ परामर्श के बाद बनाए गए नियमों के अनुसार करेंगे।

image source:http://www.ibtimes.co.in

Hemant Singh is an academic writer with 7+ years of experience in research, teaching and content creation for competitive exams. He is a postgraduate in International
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First Published: Jun 25, 2016, 12:21 IST

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