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राज्य मानवाधिकार आयोग

Last Updated: Dec 18, 2015, 17:13 IST

मानव संरक्षण अधिकार अधिनियम (1993), के आधार पर राज्य स्तर पर राज्य मानवाधिकार आयोग बना है। एक राज्य मानवाधिकार आयोग भारतीय संविधान की सातवीं अनुसूची में राज्य सूची और समवर्ती सूची के अंतर्गत शामिल विषयों से संबंधित मानव अधिकारों के उल्लंघन की जांच कर सकता है। मानव अधिकार (संशोधन) अधिनियम, 2006  में एक अध्यक्ष के साथ तीन सदस्य शामिल होते हैं। अध्यक्ष, उच्च न्यायालय का एक सेवानिवृत्त मुख्य न्यायाधीश होना चाहिए। आयोग के अध्यक्ष और सदस्यों का कार्यकाल पांच वर्ष का होता है।

राज्य मानवाधिकार आयोग
राज्य मानवाधिकार आयोग

मानव संरक्षण अधिकार अधिनियम (1993), के आधार पर राज्य स्तर पर राज्य मानवाधिकार आयोग बना है। एक राज्य मानवाधिकार आयोग भारतीय संविधान की सातवीं अनुसूची में राज्य सूची और समवर्ती सूची के अंतर्गत शामिल विषयों से संबंधित मानव अधिकारों के उल्लंघन की जांच कर सकता है।

संरचना

मानव अधिकार (संशोधन) अधिनियम, 2006  में एक अध्यक्ष के साथ तीन सदस्य शामिल होते हैं। अध्यक्ष, उच्च न्यायालय का एक सेवानिवृत्त मुख्य न्यायाधीश होना चाहिए। इसके अन्य सदस्य होने चाहिए,

(I) जिला न्यायाधीश के रूप में कम से कम सात साल के अनुभव के साथ राज्य में उच्च न्यायालय का सेवारत या सेनानिवृत न्यायाधीश या जिला न्यायाधीश|

(II)  एक व्यक्ति के पास मानव अधिकारों से संबंधित व्यावहारिक अनुभव या ज्ञान होना चाहिए|

राज्य का राज्यपाल समिति के सिफ़ारिश से जिसमें मुख्यमंत्री प्रमुख के रूप में, विधान सभा के स्पीकर, गृह राज्य मंत्री और विधान सभा में विपक्ष के नेता शामिल होते हैं अध्यक्ष व अन्य सदस्यों की नियुक्ति करता है| अध्यक्ष और विधान परिषद के विपक्ष के नेता भी समिति के सदस्य हो सकते हैं, यदि राज्य में विधान परिषद हो|

आयोग के अध्यक्ष और सदस्यों का कार्यकाल पांच वर्ष का होता है या जब तक वे 70 वर्ष की आयु प्राप्त कर लें, जो भी पहले हो| उनके कार्यकाल के पूरा होने के बाद, वे राज्य सरकार या केंद्र सरकार के अधीन आगे रोजगार के पात्र नहीं होते हैं। हालांकि, अध्यक्ष या सदस्य एक और कार्यकाल के लिए योग्य होते हैं (यदि वे 70 वर्ष की तय आयु सीमा के भीतर हों)|

आयोग के कार्य

मानव अधिकार अधिनियम, 1993 के संरक्षण के अनुसार; नीचे दिए गए राज्य मानवाधिकार आयोग के कार्य हैं  :

(क) आयोग के समक्ष पीड़ित द्वारा स्वतः संज्ञान या याचिका पर पूछताछ करना या किसी भी व्यक्ति का मानव अधिकारों के उल्लंघन की शिकायत करना या एक लोक सेवक द्वारा इस तरह के उल्लंघन की रोकथाम में लापरवाही करना

(ख) इस तरह के कोर्ट के अनुमोदन के साथ एक न्यायालय के समक्ष मानव अधिकारों के उल्लंघन के किसी भी आरोप से जुड़े किसी भी कार्यवाही में हस्तक्षेप करना।

(ग) राज्य सरकार के नियंत्रण में किसी भी जेल या अन्य संस्था का दौरा करना और कैदियों के रहने वाली जगह को रहने लायक बनाने के लिए सम्बंधित लोगों को निर्देश देना|

(घ) तत्समय प्रभाव के लिए संविधान के तहत मानव अधिकारों के संरक्षण के लिए दिये गए सुरक्षा उपायों की समीक्षा करना तथा उसके प्रभावी कार्यान्वयन के लिए उपायों की सिफ़ारिश करना|

(च) मानव अधिकारों के क्षेत्र में अनुसंधान का जिम्मा लेना व उसे बढ़ावा देना।

(छ) समाज के विभिन्न वर्गों के बीच में मानव अधिकारों की साक्षरता को फैलाना और इन अधिकारों के संरक्षण के लिए उपलब्ध सुरक्षा उपायों के बारे में जागरूकता को बढ़ावा देना।

(झ) मानव अधिकारों के क्षेत्र में काम कर रहे गैर सरकारी संगठनों और संस्थाओं के प्रयासों को प्रोत्साहित करना।

(ट) इस तरह के अन्य कार्य की ज़िम्मेदारी लेना करना जिससे मानव अधिकारों को बढ़ावा देने के लिए विचार किया जा सके।

आयोग के अधिकार   

• आयोग के पास अपनी प्रक्रिया को नियंत्रित करने का अधिकार निहित है।

• आयोग के पास सिविल अदालत के सभी अधिकार होते हैं और इसकी कार्यवाही में एक न्यायिक प्रतिष्ठा होती है।

• यह राज्य सरकार या किसी अन्य प्राधिकारी के अधीनस्थ से जानकारी या रिपोर्ट प्रस्तुत करने के लिए कह सकता हैं।

आयोग के पास तत्समय प्रभाव के लिए किसी भी व्यक्ति को किसी भी विशेषाधिकार के अधीन जो किसी भी कानून के तहत हो, पूछताछ करने का अधिकार है, सार्थक मसलों पर पूछताछ से संबन्धित मसलों पर जानकारी पेश करने का अधिकार है| इसके होने के एक वर्ष के भीतर आयोग इस मामले पर गौर कर सकता है।

विवेचना

राज्य मानवाधिकार आयोग के सीमित अधिकार होते हैं और इसकी कार्यप्रकृति केवल सलाहकार की है| आयोग के पास मानव अधिकारों के उल्लंघन करने वालों को दंडित करने का अधिकार नहीं होता है| यहां तक की पीड़ित को आर्थिक राहत के साथ यह किसी भी प्रकार की राहत प्रदान नहीं कर सकता|

राज्य मानवाधिकार आयोग की सिफ़ारिशें राज्य सरकार या प्राधिकारी पर बाध्य नहीं हैं, लेकिन आयोग को एक महीने के भीतर उसकी सिफारिश पर की गई कार्रवाई के बारे में सूचित किया जाना चाहिए।

निष्कर्ष

राज्य मानवाधिकार आयोग को अपने अधिकार बढ़ाने की आवश्यकता है। इसे पीड़ितों को न्याय दिलवाने में विभिन्न तरीकों से बढ़ाया जा सकता है। आयोग के पास पीड़ित को आर्थिक राहत के साथ साथ अंतरिम और तत्काल राहत प्रदान करने का अधिकार होना चाहिए। आयोग के पास मानव अधिकारों का उल्लंघन करने वालों को दंडित करने का अधिकार भी होना चाहिए, जो भविष्य में इस तरह के कार्यों को करने में निवारक के रूप में काम कर सकें| आयोग की कार्यप्रणाली में राज्य सरकार का हस्तक्षेप कम से कम होना चाहिए क्योंकि यह आयोग के कामकाज को प्रभावित कर सकता है|

Hemant Singh is an academic writer with 7+ years of experience in research, teaching and content creation for competitive exams. He is a postgraduate in International
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First Published: Dec 18, 2015, 17:13 IST

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