जहाँगीर ने ऐसा ना किया होता तो भारत अंग्रेजों का गुलाम कभी ना बनता
1615 में जहांगीर के दरबार (मुगल सम्राट) में सर थॉमस रो की भारत यात्रा ने अंग्रेजों के लिए भारत में व्यापार के दरवाज़े खोल दिए, लेकिन जानने योग्य यह है कि भारतीय भूमि पर ऐसा क्या हुआ जिससे इस तुच्छ तथ्य ने जहांगीर के कदमो को भारतीय इतिहास में एक दिलचस्प झलक बना दी।
भारत मे अंग्रेजों के आगमन को एक नये युग का सूत्रपात माना जा सकता है। सन् 1600 ई. में कुछ अंग्रेज व्यापारियों ने इंग्लैण्ड की महारानी एलिजाबेथ से, भारत से व्यापार करने की अनुमति ली। इसके लिए उन्होंने ईस्ट इण्डिया कम्पनी नामक एक कम्पनी बनाई।
उस समय भारत पर मुगल बादशाह ज़हाँगीर का शासन था। हॉकिंस अपने साथ इंग्लैण्ड के बादशाह जेम्स प्रथम का एक पत्र ज़हाँगीर के नाम लाया था। उसने सन 1608-09 के दौरान ज़हाँगीर के राज-दरबार में स्वयं को राजदूत के रूप में पेश किया तथा घुटनों के बल झुककर उसने बादशाह ज़हाँगीर को सलाम किया। चूंकि वह इंग्लैण्ड के सम्राट का राजदूत बनकर आया था, इसलिए ज़हाँगीर ने भारतीय परम्परा के अनुरूप अतिथि का विशेष स्वागत किया तथा उसे सम्मान दिया। जब अंग्रेजों का दूत कैप्टेन हाकिंस मुग़ल सम्राट जहाँगीर के दरबार में भारत से व्यापार करने की अनुमति लेने गया तो जहाँगीर ने अनुमति नही दी ।
लेकिन 1615 तक ऐसा क्या हुआ कि जब टोमस रो जहाँगीर के दरबार में व्यापार की अनुमति लेने गया तो जहाँगीर ने उसे ना सिर्फ व्यापार की अनुमति दे दी बल्कि उसे काफी सम्मान भी दिया। तो क्या आप इस बात का अंदाजा लगा सकते हैं कि जहाँगीर ने ऐसा क्यों किया और इस अनुमति ने पूरे भारत को कैसे गुलामी में धकेल दिया। आइये जानते हैं उस घटना के बारे में-

घटना तब की है जब जहांगीर की बेटी जहाँआरा अपने 30वें जन्मदिन के जश्न की तैयारी के दौरान गंभीर रूप से जल गई जिससे सम्राट परेशान हो गया और डर गया। सम्राट ने उसके अच्छा होने के लिए, हाकिमो और वैद्यों की पूरी सेना लगा दी और साथ-साथ प्रार्थना करने के लिए पवित्र स्थानों की यात्रा भी की परन्तु उसकी बेटी की हालत वैसी ही रही। जबकि भारत एक ऐसे देशों में से था जहा की आयुर्वेदिक प्रणाली बहुत विकसित थी लेकिन दुर्भाग्य से ये चिकित्सा भी विफल रही।
जहांगीर के दरबार में सर थॉमस रो (जेम्स मैं के राजदूत) की यात्रा के दौरान उन्होंने पाया कि जहांगीर परेशान था और इसलिए उन्होंने कारण पूछा। तब जहांगीर ने उसे अपनी बेटी की जली चोटों की हालत के बारे में और भारतीय हकीम / वैद् के असफल प्रयास के बारे में बताया । फिर थॉमस रो ने ब्रिटिश डॉक्टर की मदद से और ब्रिटिश मेडिकल सिस्टम (आधुनिक समय का एलोपैथिक) के माध्यम से उसकी बेटी का इलाज करने के लिए उसकी अनुमति मांगी।

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सर थॉमस रो (जो एक अंग्रेजी चिकित्सक था) को जहांगीर की बीमार बेटी के इलाज के लिए मुगल अन्त:पुर (Harem) (मुगल अन्त:पुर में प्रवेश करने वाला पहला यूरोपीय था) में प्रवेश करने की अनुमति मिल गई । एक सप्ताह के भीतर जहांगीर की बेटी की जली हुई त्वचा ठीक होने लगी और अन्य कुछ हफ्तों में वह अपने पैरों पर चलने लगी । मुगल सम्राट जहांगीर सर थॉमस रो का बहुत आभारी था और उसने अपनी बेटी की जान बचाने के लिए बदले में कुछ भी देने के लिए उससे वादा कर दिया था।

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फिर सर थॉमस रो ने ब्रिटिश देशवासियों को मुगल दायरे के प्रशासन में व्यापार के लिए अनुमति देने के लिए कहा । जहांगीर अनुमति देना कभी नहीं चाहता था क्योंकि पुर्तगाली भारतीयों को पहले से ही परेशान कर रहें थे लेकिन अपने वादे की खातिर उसने रॉयल आदेश (अर्थात् फरमान) जारी करके अंग्रेजों को व्यापार के लिए अनुमति दे दी थी।
इस तरह से जहांगीर की बेटी की जान बचाने के लिए ब्रिटिश लोगो को भारत में मुक्त व्यापार करने की अनुमति मिल गई थी और फिर यही ब्रिटिशों ने 250 वर्षों तक भारत पर शासन किया। जहाँगीर ने ये बिलकुल नहीं सोचा था की बेटी की जान को बचाने के लिए जो वादा किया था वो उसके परिवार के वंश की मौत पर मुगलों का व्यय बन जायेगा।
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