राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग
संविधान के अनुच्छेद 338A में यह उल्लेख किया गया है कि अनुसूचित जनजातियों के लिए एक आयोग होगा जिसे राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग (एनसीएसटी) के नाम से जाना जाएगा। आयोग का यह कर्तव्य है कि वह संविधान के तहत अनुसूचित जनजातियों को उपलब्ध कराए गये सुरक्षा उपायों से संबंधित सभी मामलों की जांच करे।
संविधान के अनुच्छेद 338A में यह उल्लेख किया गया है कि अनुसूचित जनजातियों के लिए एक आयोग होगा जिसे राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग (एनसीएसटी) के नाम से जाना जाएगा। आयोग का यह कर्तव्य है कि वह संविधान के तहत अनुसूचित जनजातियों को उपलब्ध कराए गये सुरक्षा उपायों से संबंधित सभी मामलों की जांच करे। हालांकि, आयोग के विभिन्न कार्य और शक्तियां हैं जिनका उल्लेख संविधान में किया गया है।
राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 366 (25) उन समुदायों को अनुसूचित जनजाति के लिए सदर्भित करता है जिनका निर्धारण संविधान के अनुच्छेद 342 के अनुसार किया गया है। यह अनुच्छेद कहता है कि केवल वो समुदाय जिन्हें एक आरंभिक सार्वजनिक अधिसूचना के माध्यम से या एक संसदीय संशोधन अधिनियम के माध्यम से राष्ट्रपति द्वारा घोषित किया गया है उन्हें ही अनुसूचित जनजाति माना जाएगा।
अनुच्छेद 338A में इस बात का उल्लेख है कि अनुसूचित जनजातियों के लिए लिए एक आयोग होगा जिसे राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग के रूप में जाना जाएगा।
राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग के कार्यालय के अध्यक्ष, उपाध्यक्ष और प्रत्येक सदस्य का कार्यकाल कार्यालय में कार्यभार ग्रहण करने की तिथि से तीन वर्ष का होता है। आयोग के अध्यक्ष को एक केंद्रीय मंत्री का दर्जा प्राप्त होता है और उपाध्यक्ष को एक राज्य मंत्री का दर्जा प्राप्त होता है। आयोग के अन्य सदस्यों को भारत सरकार के एक सचिव का रैंक प्राप्त होता है।
संवैधानिक प्रावधान
संविधान के अनुसार:
• अनुसूचित जनजातियों के लिए लिए एक आयोग होगा जिसे राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग के रूप में जाना जाएगा।
• आयोग के अध्यक्ष, उपाध्यक्ष और अन्य सदस्यों की नियुक्ति राष्ट्रपति के हस्ताक्षर और मुहर सहित एक अधिपत्र के माध्यम से की जाएगी।
• आयोग के पास अपनी प्रक्रिया को नियंत्रित करने की शक्ति रहेगी।
हालांकि, केंद्र और प्रत्येक राज्य सरकारें उन प्रमुख सभी नीतिगत मामलों पर आयोग से परामर्श करेंगे जो अनुसूचित जनजातियों को प्रभावित करते हैं।
उदाहरण के लिए, भारत की अनुसूचित जनजातियां गोंड, आंध्र प्रदेश में भील, अरुणाचल प्रदेश में अपातनी व अदि जैसी जनजातियां हैं।
आयोग की शक्तियों और कार्यों का उल्लेख निम्नवत किया जा रहा है:
शक्तियां -
a) किसी भी व्यक्ति को सम्मन जारी करना और उपस्थित होने के लिए बुलाना तथा पूछताछ करना;
b) किसी भी दस्तावेजों की खोज करना और प्रस्तुत करना;
c) हलफनामों पर सबूत प्राप्त करना;
d) किसी भी न्यायालय अथवा कार्यालय से कोई भी सार्वजनिक रिकॉर्ड या उसकी प्रति की मांग करना;
e) गवाहों और दस्तावेजों की जांच के लिए मुद्दे को आयोग के पास भेजना; और
f) राष्ट्रपति शासन द्वारा, निर्धारित किसी भी मामले का निर्धारण करना।
आयोग के कार्य:
a) संविधान के तहत अनुसूचित जनजातियों को उपलब्ध कराए गये सुरक्षा उपायों से संबंधित सभी मामलों की जांच करना और उन पर नजर रखना या अन्य किसी कानून के तहत कुछ समय के लिए लागू करना या भारत सरकार के किसी भी आदेश और सुरक्षा उपायों की कार्यप्रणाली का मूल्यांकन करना;
b) अनुसूचित जनजातियों के लिए बनायी जाने वाली सामाजिक आर्थिक विकास की योजना प्रक्रिया में हिस्सा लेना और सलाह देना तथा केंद्र तथा किसी भी राज्य के अधीन उनके विकास की प्रगति का मूल्यांकन करना;
c) केंद्र या किसी राज्य द्वारा बनाये गये सुरक्षा उपायों के प्रभावी कार्यान्वयन और अनुसूचित जनजातियों के संरक्षण, कल्याण और सामाजिक-आर्थिक विकास के अन्य उपायों की रिपोर्ट तैयार करना जिसके लिए इन्हें प्रभावी बनाने की सिफारिश की गयी है;
d) राष्ट्रपति द्वारा निर्दिष्ट, और संसद द्वारा अनुसूचित जनजातियों के संरक्षण, कल्याण, विकास और उन्नति से संबंधित अन्य कार्यों के लिए बनाये गये कानूनों को लागू कर इनका निर्वहन करना
e) उन उपायों का निर्माण करना जिससे वन क्षेत्रों में रहने वाले अनुसूचित जनजातियों को लघु वन उपज से संबंधित स्वामित्व अधिकार देने की जरूरत हेतु कदम उठाना।
f) खनिज संसाधन, जल संसाधनों आदि पर कानून के अनुसार आदिवासी समुदायों के अधिकारों से संबंधित नियम तय करने के लिए और अधिक कदम उठाना।
g) जनजातियों के विकास तथा व्यावहारिक आजीविका की रणनीतियां बनाने के लिए और अधिक कदम उठाना।
h) विकास परियोजनाओं के कारण विस्थापित आदिवासी समूहों के लिए राहत और पुनर्वास उपायों की क्षमता में सुधार करने के लिए कदम उठाना।
i) अपनी भूमि या जगह से जनजातीय लोगों के अलगाव को रोकने और प्रभावी ढंग से उन लोगों का पुर्नवासन करना और उनमें पहले से ही निहित अलगाव की भावना को दूर करने के लिए कदम उठाना।