India’s Maritime Border: कितनी है भारत की समुद्री सीमा और कहां तक हो सकती है इंडियन नेवी की तैनाती?

Last Updated: Mar 28, 2026, 19:18 IST

भारत की समुद्री सीमाएँ उसके लगभग 7,500 किमी लंबे समुद्री तट से आगे समुद्र में कई अलग-अलग क्षेत्रों में फैली हुई हैं। इन क्षेत्रों को अंतरराष्ट्रीय कानून और भारतीय कानून के तहत परिभाषित किया गया है। भारत की समुद्री सीमाओं में टेरिटोरियल वाटर्स (Territorial Waters), कंटिग्युअस जोन (Contiguous Zone), एक्सक्लूसिव इकोनॉमिक जोन (EEZ) और कॉन्टिनेंटल शेल्फ शामिल हैं। 

India’s Maritime Border: कितनी है भारत की समुद्री सीमा और कहां तक हो सकती है इंडियन नेवी की तैनाती?
India’s Maritime Border: कितनी है भारत की समुद्री सीमा और कहां तक हो सकती है इंडियन नेवी की तैनाती?

India’s Maritime Border: मिडिल ईस्ट में तेजी से बदलते घटनाक्रम और स्ट्रेट ऑफ़ होर्मुज (Strait of Hormuz) के आसपास बढ़ती हलचल के कारण इन दिनों वैश्विक समुद्री मार्ग काफी चर्चा में हैं। ऐसे माहौल में भारत की समुद्री सीमाओं और समुद्र में उसके अधिकारों को समझना एक जरुरी विषय बन जाता है। भारत की समुद्री सीमा वास्तव में कितनी दूर तक फैली हुई है और कानूनी रूप से इंडियन नेवी और अन्य समुद्री सुरक्षा एजेंसियां कहां तक कार्रवाई कर सकती हैं, इसे समझना भी जरूरी है, आइए इस विषय को विस्तार से समझते हैं।

भारत की समुद्री सीमाएँ उसके लगभग 7,500 किमी लंबे समुद्री तट से आगे समुद्र में कई अलग-अलग क्षेत्रों में फैली हुई हैं। इन क्षेत्रों को अंतरराष्ट्रीय कानून और भारतीय कानून के तहत परिभाषित किया गया है। भारत की समुद्री सीमाओं में टेरिटोरियल वाटर्स (Territorial Waters), कंटिग्युअस जोन (Contiguous Zone), एक्सक्लूसिव इकोनॉमिक जोन (EEZ) और कॉन्टिनेंटल शेल्फ शामिल हैं। 

इन सभी क्षेत्रों का निर्धारण तट की लो-वॉटर लाइन (baseline) से किया जाता है और इनके माध्यम से भारत समुद्र में अपनी संप्रभुता, अधिकार और संसाधनों पर नियंत्रण स्थापित करता है। 

कैसे तय होती है किसी देश की समुद्री सीमा:

भारत की समुद्री सीमाओं को नियंत्रित करने वाला मुख्य कानून Territorial Waters, Continental Shelf, Exclusive Economic Zone and Other Maritime Zones Act, 1976 है, जिसे भारतीय संसद ने 25 अगस्त 1976 को लागू किया था। यह कानून भारत के समुद्री क्षेत्रों की सीमाएँ तय करता है और केंद्र सरकार को अधिकार देता है कि वह राजपत्र (Official Gazette) के माध्यम से इन सीमाओं की घोषणा या संशोधन कर सके। 

इसके अलावा भारत ने United Nations Convention on the Law of the Sea (UNCLOS) को 1995 में स्वीकार किया, जिसके अनुसार विश्वभर में समुद्री क्षेत्रों की परिभाषा और अधिकारों का मानकीकरण किया गया है।

टेरिटोरियल वाटर्स (Territorial Waters) 

भारत के टेरिटोरियल वाटर्स तट की बेसलाइन से 12 नॉटिकल माइल (लगभग 22.2 किमी) तक फैले होते हैं। इस क्षेत्र में भारत को पानी, समुद्र तल, जमीन और ऊपर के हवाई क्षेत्र पर पूर्ण संप्रभुता (Full Sovereignty) प्राप्त होती है, ठीक वैसे ही जैसे भूमि क्षेत्र पर होती है। हालांकि विदेशी जहाजों को “इनोसेंट पैसेज” (शांतिपूर्ण मार्ग) की अनुमति होती है, बशर्ते वे भारत की सुरक्षा या कानून व्यवस्था के लिए खतरा न हों। युद्धपोतों को प्रवेश से पहले सूचना देनी होती है और पनडुब्बियों को सतह पर आकर अपने झंडे के साथ गुजरना होता है।

समुद्री क्षेत्र (Maritime Zone)

आधार रेखा से दूरी (Distance from Baseline)

मुख्य अधिकार/ क्षेत्राधिकार (Key Rights/Jurisdiction)

प्रादेशिक जल (Territorial Waters)

12 समुद्री मील (nautical miles)

पूर्ण संप्रभुता (जल, समुद्र तल, हवाई क्षेत्र); जहाजों के लिए निर्दोष मार्ग (innocent passage)

संलग्न क्षेत्र (Contiguous Zone)

24 समुद्री मील (nautical miles)

सुरक्षा, सीमा शुल्क, आप्रवासन, स्वच्छता पर प्रवर्तन (Enforcement on security, customs, immigration, sanitation)

अनन्य आर्थिक क्षेत्र (Exclusive Economic Zone - EEZ)

200 समुद्री मील (nautical miles)

संसाधनों पर संप्रभु अधिकार (मछली, तेल, ऊर्जा); नौवहन स्वतंत्रता (navigation freedoms)

महाद्वीपीय शेल्फ (Continental Shelf)

बाहरी किनारे तक या 200 समुद्री मील (बढ़ाया जा सकता है)

समुद्र तल/उप-मिट्टी के शोषण अधिकार (Seabed/subsoil exploitation rights)

कंटिग्युअस जोन (Contiguous Zone) – बफर जोन

टेरिटोरियल वाटर्स के बाहर कंटिग्युअस जोन एक प्रकार का बफर क्षेत्र होता है, जो बेसलाइन से 24 नॉटिकल माइल तक फैला होता है। इस क्षेत्र में भारत की पूर्ण संप्रभुता नहीं होती, लेकिन भारत को सुरक्षा, सीमा शुल्क (Customs), आव्रजन (Immigration), स्वच्छता और वित्तीय नियमों को लागू करने का अधिकार होता है। 

क्या होता है एक्सक्लूसिव इकोनॉमिक जोन (EEZ)

भारत का एक्सक्लूसिव इकोनॉमिक जोन (EEZ) तट से 200 नॉटिकल माइल तक फैला हुआ है। इस क्षेत्र में भारत को समुद्री संसाधनों पर विशेष आर्थिक अधिकार प्राप्त होते हैं। इनमें मछली पकड़ना, तेल और गैस की खोज, समुद्री ऊर्जा का उपयोग, समुद्री अनुसंधान और प्रदूषण नियंत्रण शामिल हैं। 

हालांकि इस क्षेत्र में अन्य देशों के जहाजों और विमानों को नेविगेशन और ओवरफ्लाइट की स्वतंत्रता प्राप्त रहती है। भारत का EEZ लगभग 23 लाख वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैला है।

क्या होता है कॉन्टिनेंटल शेल्फ 

कॉन्टिनेंटल शेल्फ समुद्र तल और उसके नीचे के क्षेत्र को दर्शाता है, जो महाद्वीपीय किनारे के बाहरी हिस्से तक या न्यूनतम 200 नॉटिकल माइल तक फैला होता है। इस क्षेत्र में भारत को समुद्र तल के नीचे मौजूद खनिज, तेल और गैस जैसे संसाधनों के दोहन का विशेष अधिकार प्राप्त होता है।  

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Bagesh Yadav
Bagesh Yadav

Senior Executive - Editorial

Bagesh Yadav is a journalist and current affairs analyst with over six years of experience in education journalism, national and international affairs, and digital media. He has contributed to India’s leading knowledge platforms, including Vision IAS and Only IAS, and currently serves in a senior editorial role at Jagranjosh.com, where he leads coverage across the Current Affairs and General Knowledge sections. His expertise spans breaking news, government policy analysis, world affairs, sports updates, science and technology, and visually engaging infographics. Known for his commitment to factual accuracy, editorial integrity, and audience-first storytelling, Bagesh delivers well-researched, accessible, and impactful journalism that serves millions of students, competitive exam aspirants, and informed readers across India.

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First Published: Mar 28, 2026, 19:18 IST

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