उत्तर प्रदेश की संस्कृति में नौटंकी नृत्य बहुत ही महत्त्वपूर्ण भाग माना जाता है। संगीत, नृत्य, अभिनय और शायरी व दोहों के अनूठे संगम वाली यह कला मुख्य रूप से उत्तर प्रदेश के अवध, ब्रज और रोहिलखंड क्षेत्रों में बसी हुई है। आज भी इस कला और इसके कलाकारों द्वारा नौटंकी का उतना ही महत्त्व बनाए रखा गया है, जितना इसकी उत्पत्ति के समय हुआ करता था। क्या था नौटंकी का इतिहास और कहां से हुई इसकी उत्पत्ति, जानने के लिए पूरा लेख पढ़ें।
'नौटंकी' नाम की उत्पत्ति और इतिहास
ऐसा माना जाता है कि 'नौटंकी' नाम मुल्तान की एक प्रसिद्ध लोककथा 'शहजादी नौटंकी' से पड़ा। इस राजकुमारी पर आधारित एक प्ले इतना लोकप्रिय हुआ कि इससे जुड़े सभी लोक नाट्यों को 'नौटंकी' कहा जाने लगा। नौटंकी का विकास 19वीं शताब्दी की शुरुआत में 'स्वांग'और 'भगत' लोक नाट्य शैलियों से हुआ था।
नौटंकी के प्रमुख घराने
उत्तर प्रदेश में नौटंकी के मुख्य रूप से दो पारंपरिक घराने प्रसिद्ध हैं:
हाथरसी शैलीः हाथरस शैली के संस्थापक पंडित नत्थाराम गौड़ हैं। इसमें गायन और संगीत पर अधिक जोर दिया जाता है। इस शैली में शास्त्रीय संगीत और उच्च स्वर शैली में गायन का अधिक प्रभाव होता है।
कानपुरी शैलीः इस शैली में संवाद और अभिनय में अधिक जोर होता है। इस शैली की भाषा अधिक सहज और लोगों से जुड़ी हुई होती है। इसमें सामाजिक मुद्दों और मनोरंजन का मिक्सचर होता है।
नौटंकी का प्रमुख वाद्ययंत्र कौन-सा है
नौटंकी का सबसे प्रमुख और जरूरी वाद्ययंत्र 'नगाड़ा'है। इसके अलावा शहनाई, ढोलक, हारमोनियम और मंजीरा का प्रयोग भी किया जाता है। नगाड़े की तेज थाप ही दर्शकों को नाटक शुरू होने का संकेत देती है। नौटंकी में संवाद सामान्य गद्य में नहीं होते, बल्कि कविता, दोहा, चौपाई और गजल के रूप में गाकर बोले जाते हैं।
नौटंकी में होता है ‘रंगा’
नौटंकी में एक सूत्रधार यानि Narrator होता है, जिसे 'रंगा' कहा जाता है, जो कथा को आगे बढ़ाता है और पात्रों का इंट्रोडक्शन देता है।
नौटंकी के प्रमुख विषय
नौटंकी के प्रमुख विषयों मेंसत्यवादी हरिश्चंद्र, भक्त प्रह्लाद, नल-दमयंती, रामायण और महाभारत के प्रसंग शामिल होते हैं। इसके अलावा, अमर सिंह राठौड़, आल्हा-ऊदल, सुल्ताना डाकू, राजा भरथरी, दहेज प्रथा, बेटी बचाओ, साक्षरता और भ्रष्टाचार जैसे मुद्दों को भी शामिल किया जाता है। नौटंकी के प्रमुख कलाकारों की बात करें, तो इनमें पंडित नत्थाराम शर्मा, गुलाब बाई और कृष्णा कुमारी का नाम लिया जाता है।
