Kargil War Hero: 15 गोलियां लगीं, हाथ टूटा, लेकिन हौसला नहीं, कारगिल के ‘परमवीर’ योगेंद्र सिंह यादव की कहानी

Kargil Vijay Diwas 2026: कारगिल विजय दिवस की 27वीं वर्षगांठ पर पूरा देश उन वीर सपूतों को नमन कर रहा है, उन्ही में से एक परमवीर चक्र विजेता सूबेदार मेजर (मानद कैप्टन) योगेंद्र सिंह यादव भी है, जिनकी कहानी आज हम बताने जा रहे है। 

Jul 25, 2026, 11:17 IST
करगिल के 'परमवीर' योगेंद्र यादव के अद्मय साहस की कहानी
करगिल के 'परमवीर' योगेंद्र यादव के अद्मय साहस की कहानी

Kargil Vijay Diwas 2026: हर साल 26 जुलाई का दिन देश के लिए गर्व, सम्मान और भावुक कर देने वाली यादों का प्रतीक होता है। इसी दिन 1999 में भारतीय सेना ने कारगिल की दुर्गम चोटियों से पाकिस्तानी घुसपैठियों को खदेड़कर तिरंगा लहराया था। 

इस जीत की 27वीं वर्षगांठ पर पूरा देश उन वीर सपूतों को श्रद्धांजलि दे रहा है, जिन्होंने मातृभूमि की रक्षा के लिए अपना सब कुछ न्योछावर कर दिया था।

करगिल के 'परमवीर' योगेंद्र यादव

कारगिल के इन अमर योद्धाओं में एक नाम ऐसा है, जिसकी बहादुरी आज भी हर भारतीय के दिल में जोश भर देती है जो है परमवीर चक्र विजेता सूबेदार मेजर (मानद कैप्टन) योगेंद्र सिंह यादव। महज 18 साल की उम्र में उन्होंने जो साहस दिखाया, वह भारतीय सैन्य इतिहास के सबसे प्रेरणादायक अध्यायों में दर्ज है।

मौत सामने थी, लेकिन कदम नहीं रुके

कारगिल युद्ध के दौरान भारतीय सेना के सामने सबसे बड़ी चुनौती थी टाइगर हिल पर दोबारा कब्जा करना। करीब 18 हजार फीट की ऊंचाई पर स्थित इस टॉप तक पहुंचना किसी असंभव मिशन से कम नहीं था। दुश्मन ऊपर से लगातार गोलियां बरसा रहा था, जबकि भारतीय जवानों को लगभग सीधी चट्टानों पर चढ़कर आगे बढ़ना था। 

इस खतरनाक मिशन में सबसे आगे थे ग्रेनेडियर योगेंद्र सिंह यादव। उन्होंने अपनी जान की परवाह किए बिना रस्सियों के सहारे चढ़ाई की और साथियों के लिए रास्ता बनाया।

15 गोलियां लगीं, हाथ टूट गया, लेकिन हौसला नहीं टूटा

दुश्मन की गोलीबारी में योगेंद्र सिंह यादव गंभीर रूप से घायल हो गए। उनके शरीर में कई गोलियां लगीं और एक हाथ भी बुरी तरह जख्मी हो गया। लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी।

उन्होंने अपने घायल हाथ को बेल्ट से बांधा, साथियों का हौसला बढ़ाया और दुश्मन के बंकरों पर हमला जारी रखा। उन्होंने कई पाकिस्तानी सैनिकों को मार गिराया और टाइगर हिल पर कब्जा दिलाने में अहम भूमिका निभाई। 

सबसे कम उम्र के परमवीर चक्र विजेताओं में शामिल

Kargil War Hero Yogendra Yadav: योगेंद्र सिंह यादव का जन्म 10 मई 1980 को उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर जिले के औरंगाबाद अहीर गांव में हुआ था। उनके पिता करण सिंह यादव भी भारतीय सेना में थे और 1965 व 1971 के भारत-पाक युद्ध में देश की सेवा कर चुके थे।

देशभक्ति उन्हें विरासत में मिली थी। कम उम्र में ही उन्होंने सेना जॉइन की और 18 ग्रेनेडियर्स का हिस्सा बने। कारगिल युद्ध में उनकी अद्वितीय वीरता के लिए उन्हें भारत का सर्वोच्च सैन्य सम्मान परमवीर चक्र प्रदान किया गया। वह इस सम्मान को पाने वाले सबसे कम उम्र के सैनिकों में से एक हैं।

आखिर कैसे शुरू हुआ था कारगिल युद्ध?

साल 1999 में पाकिस्तान समर्थित सैनिकों और घुसपैठियों ने नियंत्रण रेखा (LoC) पार कर कारगिल, द्रास और बटालिक सेक्टर की कई ऊंची चोटियों पर कब्जा कर लिया था। उनका मकसद श्रीनगर-लेह राष्ट्रीय राजमार्ग को ब्लॉक कर लद्दाख से भारत का संपर्क कमजोर करना था।

इसके जवाब में भारतीय सेना ने ऑपरेशन विजय शुरू किया। करीब दो महीने तक चले भीषण संघर्ष के बाद भारतीय जवानों ने एक-एक चोटी पर दोबारा कब्जा किया। 26 जुलाई 1999 को भारत ने कारगिल युद्ध में ऐतिहासिक जीत हासिल की और तभी से हर साल यह दिन कारगिल विजय दिवस के रूप में मनाया जाता है।

वीरता की यह कहानी हमेशा प्रेरित करेगी

योगेंद्र सिंह यादव की कहानी सिर्फ युद्ध जीतने की नहीं, बल्कि अदम्य साहस, अटूट हौसले और मातृभूमि के लिए सब कुछ न्योछावर कर देने की मिसाल है। यही कारण है कि उनका नाम आज भी हर भारतीय के दिल में सम्मान और गर्व के साथ लिया जाता है।

Bagesh Yadav

Senior Executive - Editorial

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