भारत में मुगलों ने 1526 से लेकर 1857 तक राज किया था। इस दौरान देश में कई मुगल हुए, जिनके शासनकाल में मुगल साम्राज्य का विस्तार किया गया। हालांकि, इनमें से इकलौते मुगल शासक ऐसे भी रहे हैं, जिनकी मृत्यु भारत से बाहर हुई थी। कौन थे यह मुगल शासक, जानने के लिए पूरा लेख पढ़ें।
वह मुगल शासक, जिसे भारत से बाहर ले जाया गया
भारत में मुगल साम्राज्य की नींव बाबर ने रखी थी, जो कि पहले मुगल बादशाह थे। उनकी मृत्यु 1530 में आगरा में हुई थी और शुरुआत में उन्हें वहीं दफनाया गया था, लेकिन उनकी अंतिम इच्छा के अनुसार बाद में उनके अवशेषों को अफगानिस्तान के काबुलले जाकर 'बाग-ए-बाबर' में दफनाया गया।
वह मुगल शासक, जिनकी भारत से बाहर हुई मृत्यु
मुगलों के अंतिम मुगल बादशाह यानि कि बहादुर शाह जफर-2 इकलौते ऐसे मुगल शासक हैं, जिन्हें जीते-जी भारत से देश निकाला कर दिया गया था और जिनकी मृत्यु और दफन पूरी तरह से भारत से बाहर रंगून, म्यांमार में हुई। बहादुर शाह जफर-2 की मृत्यु और दफन दोनों ही विदेशी धरती पर हुए, इसलिए इतिहास में उन्हें भारत से बाहर अंतिम सांस लेने वाले सबसे प्रमुख मुगल शासक के रूप में याद किया जाता है।
कौन थे बहादुर शाह जफर-2
बहादुर शाह जफर-2 का पूरा नाम मिर्जा अबू जफर सिराजुद्दीन मुहम्मद बहादुर शाह जफर था। वह भारत के 20वें और अंतिम मुगल शासक थे, जिन्होंने 1837 से 1857 तक दिल्ली के लाल किले की गद्दी संभाली। उन्हें लेकर खास बात यह है कि वह सिर्फ एक शासक ही नहीं, बल्कि उर्दू के एक बहुत बड़े और संवेदनशील शायर भी थे। उनके दरबार में गालिब, जौक और मोमिन जैसे महान कवि हुआ करते थे।
1857 का स्वतंत्रता संग्राम और गिरफ्तारी
1857 की क्रांति के दौरान भारतीय सैनिकों और क्रांतिकारियों ने 82 वर्ष के बुजुर्ग बहादुर शाह जफर को ही भारत का वास्तविक सम्राट घोषित किया था। हालांकि, जफर ने नाममात्र का नेतृत्व किया था, लेकिन अंग्रेजों के खिलाफ यह विद्रोह का सबसे बड़ा प्रतीक बन गया था। सितंबर 1857 में अंग्रेजों ने दिल्ली पर फिर से कब्जा कर लिया था।
ऐसे में जफर ने हुमायूं के मकबरे में शरण ली थी, जहां से ब्रिटिश मेजर विलियम हडसन ने उन्हें उनके बेटों के साथ गिरफ्तार कर लिया था। मेजर हडसन ने जफर के सामने ही उनके बेटे मिर्जा मुगल व मिर्जा खिजर सुल्तान और पोते की गोली मारकर हत्या कर दी थी।
कैसे हुआ देश निकाला
अंग्रेजों ने लाल किले में जफर पर मुकदमा चलाया और उन्हें विद्रोह का दोषी ठहराया था। उनकी वृद्धावस्था को देखते हुए उन्हें मृत्युदंड न देकर देश से निर्वासित करने की सजा दी गई थी। अक्टूबर 1858में अंग्रेजों ने बहादुर शाह जफर, उनकी पत्नी जीनत महल, उनके बचे हुए बेटों और कुछ सेवकों को गुप्त रूप से दिल्ली से रंगूनभेज दिया था।
रंगून में उन्हें एक साधारण लकड़ी के घर में बहुत सख्त पहरे में रखा गया। उन्हें लिखने के लिए कागज और कलम तक देने से मना कर दिया गया था। 7 नवंबर 1862 को 87 वर्ष की आयु में रंगून में ही उनकी मृत्यु हो गई थी।
अंग्रेजों को क्या डर था
अंग्रेजों को डर था कि जफर की मजार भारत या बर्मा में विद्रोह का केंद्र न बन जाए। इसलिए, उनकी मृत्यु के कुछ ही घंटों के भीतर अंग्रेजों ने उन्हें एक अनजानी जगह पर बिना किसी नाम-पट्टिका के दफना दिया और जमीन को समतल कर दिया, ताकि किसी को कब्र का पता न चले।
हालांकि, 1991 में यांगून में एक नाले की खुदाई के दौरान इत्तेफाक से उनकी असली ईंटों की बनी कब्र का पता चला। आज वहां एक स्मारक बना हुआ है, जहां दुनिया भर से लोग उन्हें श्रद्धांजलि देने पहुंचते हैं।
