भारत में चुनाव आयोग एक संवैधानिक संस्था है, जिस पर देश में स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराने की जिम्मेदारी होती है। ऐसे में जब मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) को हटाने की मांग संसद तक पहुंचती है तब यह सिर्फ राजनीतिक बहस का विषय नहीं रहता, बल्कि संविधान में तय प्रक्रिया भी चर्चा में आ जाती है।
हाल के दिनों में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को लेकर विपक्ष और चुनाव आयोग के बीच बयानबाजी तेज हुई है। विपक्ष की ओर से महाभियोग प्रस्ताव की बात कही गई, जबकि आयोग ने अपने फैसलों को तीनों चुनाव आयुक्तों की सर्वसम्मति से लिया गया बताया है।
चुनाव आयोग के फैसलों को लेकर क्या है विवाद?
एक अंग्रेजी अखबार की रिपोर्ट में दावा किया गया कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले कुछ महीनों में आयोग के कामकाज और कुछ फैसलों को लेकर आंतरिक आपत्तियां दर्ज कराईं। रिपोर्ट में यह भी दावा किया गया कि पिछले साल हुए स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) के दौरान कुछ महत्वपूर्ण फैसलों की जानकारी दोनों चुनाव आयुक्तों को पहले नहीं दी गई थी।
हालांकि, चुनाव आयोग ने इन दावों के बीच स्पष्ट किया कि किसी संवैधानिक संस्था में विचार-विमर्श, सुझाव और असहमति होना सामान्य प्रक्रिया का हिस्सा है। आयोग के मुताबिक SIR और तकनीक से जुड़े सभी अंतिम फैसले तीनों चुनाव आयुक्तों की पूर्ण सहमति से लिए गए थे।
कैसे होती है CEC और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति?
भारत में चुनाव आयोग की व्यवस्था संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत आती है। CEC और अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के लिए 2023 का कानून भी महत्वपूर्ण है।
वर्तमान व्यवस्था के तहत राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता और प्रधानमंत्री द्वारा नामित केंद्रीय कैबिनेट मंत्री वाली तीन सदस्यीय चयन समिति की सिफारिश पर मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति होती है।
नियुक्ति के बाद CEC और चुनाव आयुक्त का कार्यकाल अधिकतम 6 वर्ष या 65 वर्ष की आयु, जो भी पहले हो, तक होता है।
मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाना इतना मुश्किल क्यों?
संविधान के अनुच्छेद 324(5) के तहत CEC को उसी तरीके और उन्हीं आधारों पर हटाया जा सकता है, जिन आधारों पर सुप्रीम कोर्ट के जज को हटाया जाता है।
यानी CEC को केवल साबित कदाचार या अक्षमता के आधार पर हटाया जा सकता है। यही वजह है कि इस पद को राजनीतिक दबाव से सुरक्षित रखने के लिए हटाने की प्रक्रिया काफी कड़ी रखी गई है।
वहीं, किसी अन्य चुनाव आयुक्त या क्षेत्रीय चुनाव आयुक्त को हटाने के लिए CEC की सिफारिश जरूरी होती है।
क्या है महाभियोग की प्रक्रिया?
CEC को हटाने की प्रक्रिया संसद से शुरू होती है। इसके लिए लोकसभा या राज्यसभा में एक प्रस्ताव पेश किया जाता है, जिसमें कदाचार या अक्षमता के स्पष्ट आरोप होने चाहिए।
प्रस्ताव को आगे बढ़ाने के लिए लोकसभा में कम से कम 100 सांसदों और राज्यसभा में कम से कम 50 सांसदों के हस्ताक्षर जरूरी होते हैं।
इसके बाद निर्धारित संसदीय प्रक्रिया के तहत आरोपों की जांच होती है। यदि मामला आगे बढ़ता है, तो दोनों सदनों में प्रस्ताव को विशेष बहुमत से पारित होना जरूरी है। यानी दो-तिहाई समर्थन की जरूरत होती है।
क्या किसी CEC को अब तक महाभियोग से हटाया गया है?
अब तक भारत में किसी भी मुख्य चुनाव आयुक्त को इस प्रक्रिया के जरिए पद से नहीं हटाया गया है।
बताते चलें कि CEC ज्ञानेश कुमार को हटाने की मांग को लेकर विपक्ष की ओर से प्रस्ताव लाने की कोशिश जरूर हुई, लेकिन अप्रैल में राज्यसभा के सभापति और लोकसभा अध्यक्ष ने उनके खिलाफ दोनों सदनों में दिए गए प्रस्तावों को स्वीकार नहीं किया।
