Kalbelia Dance History & Origin: भारतीय लोक कला और सांस्कृतिक क्षितिज पर राजस्थान की भूमि अपना एक विशिष्ट स्थान रखती है। मरुधरा के रेतीले हवाओं से निकली कलाएं केवल भारत ही नहीं, बल्कि पूरे वल्ड को खुश करती आई हैं। इन्हीं में से एक अत्यंत मोहिनी और ऊजा से भरा लोकनृत्य है कालबेलिया नृत्य।
अपनी अद्भुत लयबद्धता, सांप जैसी लचकदार शारीरिक मुद्राओं और पारंपरिक काली पोशाक के लिए मशहूर यह नृत्य राजस्थान के सांस्कृतिक गौरव का एक प्रतीक है। प्रतियोगी परीक्षाओं से लेकर कला-प्रेमियों तक, कालबेलिया नृत्य का इतिहास और इसकी समृद्ध विरासत हमेशा से चर्चा में रही है।
राजस्थान की लोक संस्कृति की बात की जाएं, तो अपने आप कालबेलिया डांस का नाम सभी के दिमाग में आ जाता है। ये डांस आज दुनियाभर में मशहूर है, लेकिन क्या आप जानते है इसका इतिहास एक खास समुदाय से जुड़ावा है।
कालबेलिया किस राज्य का लोकनृत्य है?
कालबेलिया मुख्य रूप से राजस्थान राज्य का एक ऐतिहासिक और पारंपरिक डांस फॉर्म में से एक है। यह डांस राजस्थान के थार मरुस्थलीय क्षेत्रों, विशेष रूप से पाली, अजमेर, चित्तौड़गढ़, उदयपुर और जोधपुर जिलों में रहने वाले 'कालबेलिया' जनजाति द्वारा प्रस्तुत किया गया है।
लोकबोली में इसे 'सपेरा नृत्य' (Sapera Dance) या 'स्नेक चारमर डांस' के नाम से भी जाना जाता है, क्योंकि कालबेलिया समुदाय का पारंपरिक जीवन शैली और आजीविका प्रत्यक्ष रूप से विषधर सांप और बीन की तान से जुड़ी रही है।
कालबेलिया किस समुदाय से जुड़ा हुआ है?
क्या आप जानते हैं कि कालबेलिया किस समुदायों से जुड़ा हुआ है, यदि नहीं तो यहां देखें।
कालबेलिया राजस्थान की एक ऐसी पहचान है, जिसने राजस्थान को विश्वभर में मशहुर बनाया है। यह डांस फॉर्म एक सांपों का नृत्य दिखाने वाले एक राजस्थानी समुदाय से जुड़ा हुआ है। ये समुदाय गांव-गांव में घूमकर सांपों को पकड़ते और उनका डांस हर जगह दिखाते फिरते है। कालबेलियां डांस की शुरुआत भी कुछ ऐसे ही हुई थी। आइए जानें राजस्थान के इस लोकनृत्य की कहानी क्या है?
इतिहास और उत्पत्ति: सपेरा परंपरा से वैश्विक मंच तक
कालबेलिया लोकनृत्य का इतिहास और इसके जन्म के बारे में यहां से जानें। साथ ही, यह डांस फॉर्म इस समुदाय के संघर्षमय और घुमंतू जीवन से गहराई से जुड़ी हुई है:
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शुरुआत की धार्मिक कहानियां और समाज का माहौल: 'कालबेलिया' शब्द दो शब्दों के मेल से बनाया गया है 'काल' (समय, मृत्यु या सर्प) और 'बेलिया' (मित्र या साथी)। यह डांस प्राचीन काल से ही इस समुदाय का मुख्य कार्य जंगलों से जहरीले सांपों को पकड़ना, उनके जहर को निकालकर गांव-गांव में जाकर बीन बजाते हुए सर्पों का खेल दिखाना था।
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1972 में आया कालबेलिया समुदाय में बदलाव: साल 1972 में Wildlife Protection Act, 1972 में लागू होने के बाद सांपो को पकड़ने पर पूरी तरीके से रोक लगा दिया गया था। ऐसे में इस समुदाय ने अपनी पारंपरिक पहचान खो दी थी। साथ ही, इन लोगो के लिए पैसे कमाने की भी समस्या पैदा हो गई थी। लेकिन इस समुदाय ने हार न मानते हुए अपनी अंतर्निहित कलात्मक प्रतिभा को नया मोड़ दिया। उन्होंने सांपों की चाल, बीन की धुन और अपने शरीर की लचक को मिलाकर इस डांस के पारंपरिक हुनर को स्टेज पर लेकर आईं और गुलाबो सपेरा जैसी नर्तकियों ने इस डांस को अंतरराष्ट्रीय मंच पर पहचान दिलाई।
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अंतरराष्ट्रीय ख्याति और पद्मश्री गुलाबो: इस डांस को अंतरराष्ट्रीय लेवल पर नई पहचान दिलाने का सारा श्रेय गुलाबो सपेरा (Gulabo Sapera) को जाता है। उन्होंने विपरीत परिस्थितियों का सामना करते हुए कालबेलिया कला को देश-विदेश के मंचों पर प्रस्तुत किया, जिसके लिए उन्हें भारत सरकार द्वारा 'पद्मश्री' से सम्मानित किया गया।
कालबेलिया नृत्य की खासियत क्या है?
इस डांस की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसकी मुद्राएं सांप की मुद्रा से मिलती-जुलती होती हैं। Dance फॉर्म में महिलाएं संगीत पर अपने शरीर को बिल्कुल सांप की तरह लचकाती हुई डांस करती हैं, जो सभी लोगो को हैरान और पसन्न कर देता है। यह डांस काफी तेज रफ्तार से पुंगी और खंजरी जैसे वाद्य यंत्रों की धुन पर किया जाता है।
Kalbelia Dance में महिलाएं क्या पोशाक पहनती है?
कालबेलिया डांस केवल महिलाओं द्वारा ही पेश किया जाता है। इस डांस की पारंपरिक पोशाक में महिलाएं केवल काले रंग का चोला और एक बड़ा घेरदार लहंगा पहनती हैं। कपड़ों का काला रंग भी सांप के रंग से जोड़कर देखा जाता है। इनकी पोशाक पर रंग-बिरंगे धागों की कढ़ाई होती है। साथ ही, छोटे-छोटे शीशे और गोटे का बारीक से काम किया जाता है। घाघरे को काफी घेरदार रखा जाता है, जो डांस करते समय कमाल का इफेक्ट देता है।
कालबेलिया नृत्य की मुख्य विशेषताएं
कालबेलिया नृत्य की कलात्मकता और वेशभूषा इसे अन्य सभी लोकनृत्यों से अलग और अट्रैक्टिव बनाती है।
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सांस्कृतिक पहलू
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मुख्य डिटेल्स
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प्रस्तुति शैली
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केवल महिलाओं द्वारा नृत्य प्रस्तुत किया जाता है, जबकि पुरुष वाद्य यंत्र बजाते हैं
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मुख्य वाद्य यंत्र
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पुंगी (बीन), खंजरी, ढोलक, मंजीरा और डफली
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आकर्षक वेशभूषा
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'काली घाघरी' और 'कांचली', जिन पर गोटे, शीशों (Mirrors) और चांदी के धागों से बारीक कड़ाई होती है
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शारीरिक मुद्राएं
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नागिन जैसी लचकदार चाल, चकरी काटना और एक्रोबैटिक करतब
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यूनेस्को (UNESCO) दर्जा
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साल 2010 में यूनेस्को की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत (Intangible Cultural Heritage) में शामिल है
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कालबेलिया डांस को महिलाएं पुंगी, खंजरी और ढोलक जैसे वाद्ययंत्रों पर डांस रिदम सेट करते हैं, जिस पर महिलाएं बहुत खूबसूरती से थिरकती हैं। साथ ही, इन डांस फॉर्म के गानों की शुरुआत भी धीमी होती है, जिसे धीरे-धीरे तेज किया जाता है। ऐसी धुन पर महिलाएं धीरे-धीरे डांस करना शुरू करती है, जिससे लोगों की निगाहें हटाना काफी मुश्किल हो जाती है।
कालबेलिया नृत्य में किस मुख्य वाद्य यंत्र का प्रयोग होता है?
कालबेलिया नृत्य में पुंगी (बीन) और खंजरी जैसे वाद्य यंत्रों का प्रयोग किया जाता है।
क्या आप जानते हैं कालबेलिया नृत्य की प्रसिद्ध नर्तकी कौन हैं?
कालबेलिया नृत्य की प्रसिद्ध नर्तकी पद्मश्री गुलाबो सपेरा जी है।
