रक्षाबंधन का पर्व भाई-बहन के प्यार का प्रतीक है। इतिहास के पन्नों में देखें, तो हमें इससे जुड़ी एक प्रसिद्ध घटना भी देखने को मिलती है। झांसी की रानी लक्ष्मीबाई ने 1857 की क्रांति के दौरान उत्तर प्रदेश के बांदा के नवाब रहे अली बहादुर द्वितीय को राखी भेजकर मदद मांगी थी। यह घटना भारतीय इतिहास में गंगा-जमुनी तहजीब की एक मिसाल बनी थी। क्या थी यह पूरी घटना, जानने के लिए पूरा लेख पढ़ें।
क्या था पारिवारिक रिश्ता
बांदा के नवाब अली बहादुर द्वितीय, मराठा पेशवा बाजीराव प्रथम और उनकी पत्नी मस्तानी के वंशज थे। इस नाते मराठा पेशवाओं और बांदा के नवाब परिवार का पुराना संबंध था। रानी लक्ष्मीबाई नवाब अली बहादुर द्वितीय को अपना छोटा भाई मानती थीं।
जब रानी ने भेजी राखी
सन 1857 के समय ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना ने झांसी के किले को चारों तरफ से घेर लिया था। इस बीच रानी के पास गोला-बारूद और सैनिकों की भारी कमी होने लगी थी। इसे देखते हुए उन्होंने मदद के लिए बुंदेली भाषा में एक पत्र लिखकर उसके साथ एक राखी को अपने डाकिया लाला दुलारे लाल के हाथों बांदा के नवाब को भिजवाया।
नवाब ने की मदद
जब नवाब अली बहादुर द्वितीय को अपनी मुंहबोली बहन की राखी और पत्र मिला, तो उन्होंने बिना अपनी रियासत या खजाने की चिंता किए राखी का धर्म निभाने का फैसला किया। नवाब अपनी करीब 10,000 सैनिकों की फौज और तोपखाने के साथ जंगलों के रास्ते झांसी की ओर रानी की मदद के लिए रवाना हो गए। उन्होंने ग्वालियर और काल्पी के युद्धों में रानी लक्ष्मीबाई, तात्या टोपे और राव साहब के साथ मिलकर अंग्रेजों के खिलाफ मुकाबला किया।
अंग्रेजों ने जब्त कर ली बांदा रियासत
रानी का साथ देने की वजह से अंग्रेजों ने नवाब अली बहादुर द्वितीय को हराकर उनकी बांदा रियासत को अपने कब्जे में ले लिया। उन्हें उनके परिवार के साथ इंदौर में नजरबंद कर दिया गया, जहां उन्हें केवल नाममात्र की पेंशन दी जाती थी। नवाब और रानी लक्ष्मीबाई की कहानी आज भी बुंदेलखंड में भाई-बहन के प्रेम के लिए मिसाल के तौर पर सुनाई जाती है।
