भारत में गरीबी और गरीबी रेखा से नीचे की जनसंख्या
रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर सी. रंगराजन की अध्यक्षता में एक विशेषज्ञ समीति के अनुसार गरीबी की परिभाषा इस प्रकार है, "ग्रामीण क्षेत्रों में 32 रुपया प्रतिदिन और कस्बों तथा शहरी क्षेत्रों में 47 रुपये प्रतिदिन खर्च करने वाले लोगों को गरीब नहीं कहा जा सकता है।" रंगराजन समिति के अनुमान के अनुसार, 2009-10 के 29.8% के मुकाबले 2011-12 के दौरान गरीबी रेखा से नीचे की जनसंख्या (बीपीएल) घटकर 21.9% रह गई थी जबकि 2004-05 के दौरान यह 37.2% फीसदी थी।
योजना आयोग (अब नीति आयोग) हर वर्ष के लिए समय-समय पर गरीबी रेखा और गरीबी अनुपात का सर्वेक्षण करता है जिसके सांख्यिकी और कार्यक्रम मंत्रालय का राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण कार्यालय (एनएसएसओ) बड़े पैमाने पर घरेलू उपभोक्ता व्यय के सैंपल सर्वे लेकर कार्यान्वित करता है।
आम तौर पर इन सर्वेक्षणों को पंचवार्षिक आधार (हर 5 वर्ष में) पर किया जाता है। हालांकि इस श्रृंखला में पिछले पाँच साल का सर्वेक्षण, 2009-10 (एनएसएस का 66वां दौर) में किया गया था। 2009-10 का वर्ष भारत में गंभीर सूखे की वजह से एक सामान्य वर्ष नहीं था, एनएसएसओ ने 2011-12 में बड़े पैमाने पर एक बार फिर सर्वेक्षण (एनएसएसओ का 68वां दौर) किया।
गरीबी को कैसे परिभाषित किया गया है?
भारत में गरीबी रेखा को परिभाषित करना हमेशा से ही एक विवादास्पद मुद्दा रहा है, विशेष रूप से 1970 के मध्य में जब पहली बार इस तरह की गरीबी रेखा का निर्माण योजना आयोग द्वारा किया गया था, जिसमें ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में क्रमश: एक वयस्क के लिए 2,400 और 2,100 कैलोरी की न्यूनतम दैनिक आवश्यकता को आधार बनाया गया था। डीटी लकड़ावाला और बाद में वाई के अलघ जैसे अन्य दूसरे अर्थशास्त्री समय-समय पर होने वाले गरीबी रेखा के सर्वेक्षण कार्य में शामिल रहे हैं।
हाल ही में इसमें कुछ संशोधनों के साथ गरीब लोगों की अन्य बुनियादी आवश्यकताओं पर विचार किया गया, जिसमें आवास, वस्त्र, शिक्षा, स्वास्थ्य, स्वच्छता, वाहन, ईंधन, मनोरंजन, आदि शामिल था, ताकि प्रकार गरीबी रेखा की परिभाषा को और अधिक यतार्थवादी बनाया जा सके। यह कार्य यूपीए सरकार के कार्यकाल के दौरान सुरेश तेंदुलकर ने 2009 और सी रंगराजन ने 2014 में किया।
तेंदुलकर समिति ने नए मानक तय किये जिसके अनुसार ग्रामीण क्षेत्रों में 27 रूपये और शहरी क्षेत्रों में 33 रूपये प्रतिदिन खर्च करने वालों को गरीबी रेखा से ऊपर रखा गया, और इस मानक के अनुसार गरीबी रेखा वाली आबादी में 22 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई की गई। यह काफी विवादस्पद रहा, क्योंकि संख्याओं को वास्तविकता से परे माना गया। बाद में रंगराजन समिति ने इस सीमा को बढा दिया जिसमें ग्रामीण क्षेत्रों में 32 रूपये और शहरी क्षेत्रों में 47 रूपये प्रतिदिन खर्च करने वालों को गरीबी रेखा रसे बाहर रखा गया और गरीबी रेखा में 30 फीसदी गिरावट की बात कहीं गई।
गरीबी रेखा
गरीबी रेखा के आंकलन का पुराना फार्मूला वांछित कैलोरी आवश्यकता पर आधारित है। इसमें अनाज, दालें, सब्जियां, दूध, तेल, चीनी आदि वो खाद्य वस्तुएं शामिल थी जो जरूरतमंद कैलोरी प्रदान करते हैं। कैलोरी की जरूरत उम्र, लिंग और कार्य पर निर्भर करती है जो एक एक व्यक्ति करता है। भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में औसत कैलोरी आवश्यकता 2400 कैलोरी, प्रति व्यक्ति प्रति दिन है, जबकि शहरी क्षेत्रों में यह 2100 कैलोरी प्रति व्यक्ति प्रति दिन है। चूंकि ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले लोग स्वंय को ज्यादा शारीरिक कार्यों में व्यस्त रखते हैं इसलिए ग्रामीण क्षेत्रों में कैलोरी की आवश्यकताओं को शहरी क्षेत्रों की तुलना में अधिक रखा गया। इन गणनाओं के आधार पर, वर्ष 2000 में ग्रामीण क्षेत्रों में 328 रुपये प्रति माह और शहरी क्षेत्रों में 454 रुपये प्रति माह कमाने वाले मानक को गरीबी रेखा में शामिल किया गया था। इस तरह वर्ष 2000 में, ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले और 1,640 रुपये प्रति महीने से भी कम कमाई वाले पांच सदस्यों के एक परिवार को गरीबी रेखा के नीचे रखा गया।

स्रोत: एनएसएसओ डेटा
गरीबी रेखा के आंकलन और विवाद
आयोग के ताजा अनुमान के मुताबिक, शहरों में 28.65 रुपये और ग्रामीण इलाकों में 22.42 रुपये से ज्यादा रोज खर्च करने वाले लोग गरीब नहीं हैं। इस पैमाने की बड़े पैमाने पर सामाजिक कार्यकर्ताओं द्वारा आलोचना की गई। इस मापदंड के अनुसार भारत में गरीबों की संख्या 2004-05 के 40.72 करोड़ से घटकर 2009-10 में 34.47 करोड़ रह गई है। यह गणना तेंदुलकर पैनल की पद्धति के अनुसार की गई थी।
बीपीएल जनसंख्या में भारतीय राज्यों की स्थिति: (एनएसएसओ डाटा)

यह बहुत ही दयनीय स्थिति है कि, भारत को एक विकासशील देश भी कहा जाता है और अभी भी यहां गरीबी रेखा से नीचे इतनी बड़ी आबादी रहती है।