उत्तर प्रदेश का इतिहास उठाकर देखें, तो हमें यहां इतिहास के पन्नों में कई बड़ी घटनाएं देखने को मिलती हैं। इनमें एक घटना ऐसी भी है, जिसमें यूपी के एक जिले के लिए 200 सालों तक युद्ध चला था। इस दौरान कई सैनिक मारे गए और अंत में एक शासक को इस जिले की गद्दी मिली। कौन-सा है यह जिला और क्यों और किसके बीच चला था युद्ध, जानने के लिए पूरा लेख पढ़ें।
किस जिले के लिए 200 साल चला था युद्ध
इतिहास में कन्नौज पर अधिकार स्थापित करने के लिए लड़े गए इस लंबे संघर्ष को 'त्रिपक्षीय संघर्ष'कहा जाता है। 8वीं शताब्दी से लेकर 10वीं शताब्दी के मध्य यानि लगभग 780 ई. से 950 ई. तक लगभग 200 सालों तक तीन शक्तिशाली राजवंशों के बीच कन्नौज को लेकर युद्ध चला था।
कन्नौज को लेकर क्यों चला था युद्ध
गुप्त साम्राज्य के पतन के बाद और विशेष रूप से सम्राट हर्षवर्धन के शासनकाल में पाटलिपुत्र का महत्त्व घट गया था और कन्नौज पूरे उत्तर भारत की राजनीतिक और आर्थिक गतिविधियों का केंद्र बन गया था। उस दौर में माना जाता था कि जिस राजा का अधिकार कन्नौज पर होगा, वही 'चक्रवर्ती सम्राट' या पूरे उत्तर भारत का स्वामी कहलाएगा।
इसलिए भी जरूरी था कन्नौज
कन्नौज गंगा-यमुना के अधिक उपजाऊ मैदानी क्षेत्र यानि दोआब में स्थित था। यहां से कृषि टैक्स और रेशम मार्ग पर नियंत्रण करना आसान था।
किस-किसके बीच हुआ था युद्ध
यह युद्ध भारत के तीन अलग-अलग दिशाओं के सबसे शक्तिशाली साम्राज्यों के बीच लड़ा गया था। इनमें गुर्जर-प्रतिहार राजवंशमालवा और राजस्थान क्षेत्र के शासक रहे प्रमुख रूप से वत्सराज, नागभट्ट द्वितीय और मिहिर भोज शामिल है। वहीं, पाल राजवंश में बंगाल और बिहार क्षेत्र के बौद्ध धर्मानुयायी शासक जैसेः धर्मपाल और देवपाल व राष्ट्रकूट राजवंश से दक्कन क्षेत्र के शासक रहे ध्रुव, गोविंद तृतीय व इंद्र तृतीय शामिल थे।
किसने जीता युद्ध
लगभग 200 वर्षों के लंबे युद्ध के बाद अंत में गुर्जर-प्रतिहार राजवंश कन्नौज पर अपना स्थायी अधिकार जमाने में सफल रहा और उन्होंने इसे अपनी साम्राज्यवादी राजधानी बनाया। हालांकि, 200 सालों तक लगातार युद्ध लड़ने के कारण तीनों प्रमुख राजवंशों की आर्थिक व सैन्य शक्ति पूरी तरह खत्म हो गई। इस बात का लाभ उठाकर 11वीं सदी में गजनवी और बाद में मोहम्मद गोरी जैसे मध्य एशियाई आक्रमणकारियों के लिए भारत पर हमला करना बेहद आसान हो गया।
