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दीन-ए-इलाही

दीन-ए-इलाही को 1582 ईस्वी में अकबर द्वारा प्रतिपादित किया गया था. इसे तौहीद-ए-इलाही के नाम से भी जाना जाता था.
Aug 28, 2014 13:33 IST
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दीन-ए-इलाही को 1582 ईस्वी में अकबर द्वारा प्रतिपादित किया गया था. इसे तौहीद-ए-इलाही के नाम से भी जाना जाता था. इसमें दीन शब्द को बाद के काल में जोड़ा गया था. दीन-ए-इलाही में रहस्यवाद, प्रकृति पूजा और दर्शन आदि शामिल थे. अकबर के इस धार्मिक सिद्धांत में किसी भी नबी को मान्यता नहीं दी गयी थी. यह शांति और सहिष्णुता की नीति का समर्थन करता था. इस सिद्धांत के अनुसार प्रत्येक बदनामी भरे कार्य, कामुकता और वासना आदि जिसे घृणित गतिविधियों की मनाही थी. इसके अनुसार जानवरों के वध को निषिद्ध किया गया था और ब्रह्मचर्य का सम्मान किया गया था.

अकबर की दीन-ए-इलाही की प्रमुख विशेषतायें निम्नलिखित हैं:

1. इसमें गाय का मांश प्रतिबंधित किया गया था.
2. निर्माता के रूप में सूर्य की पूजा की शुरूआत की गई थी.
3. पारसियों के पवित्र देवता अग्नि की पूजा को शामिल किया गया था.
4. हिन्दुओं द्वारा किया जाने वाला हवान कार्य (अग्नि अनुष्ठान) को प्रोत्साहित किया गया था.

दीन-ए-इलाही को अबुल फजल, बीरबल और फैजी द्वारा स्वीकार किया गया था. हालांकि  दूसरे अन्य दरबारी लोग इस धर्म के प्रति उदासीन बने रहे. अकबर की मृत्यु के साथ ही इस नए धर्म की समाप्ति हो गयी लेकिन इसने मुग़ल साम्राज्य की एकता और एकीकरण में महत्वपूर्ण योगदान दिया.

मजहर नामा क्या था?

मजहर नामा के अनुसार मुग़ल सम्राट ही राज्य का सबसे बड़ा पमुख है और उसके स्था पर मुजतहिद का कोई स्थान नहीं है. धर्म के सन्दर्भ में यदि कोई विवाद उठता है तो मुग़ल सम्राट का निर्णय अंतिम होगा और उसके निर्णय के अनुसार ही सभी को चलना पड़ेगा. अकबर के इस कार्य ने साम्राज्य के अन्दर किसी भी प्रकार के विरोध जोकि धर्म से जुड़े थे, को समाप्त कर दिया. इस सन्दर्भ में अकबर का निर्णय अंतिम और अकाट्य होता था.

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