भारत में क्या ‘Right to Sleep’ है मौलिक अधिकार, जानें यहां
भारतीय संविधान के मुताबिक, हमारे पास कुल 6 मौलिक अधिकार हैं। इन मौलिक अधिकारों में जीने का अधिकार भी शामिल है। हालांकि, क्या आप जानते हैं कि सोने का अधिकार(Right To Sleep) क्या मौलिक अधिकारों में आता है या नहीं ? इस लेख के माध्यम से हम इस बारे में जानेंगे।
भारतीय संविधान में आपने 6 मौलिक अधिकारों के बारे में पढ़ा और सुना ही होगा। ये मौलिक अधिकार हमें समाज में समानता के अधिकार से लेकर जीवन के अधिकार को लेकर बताते हैं। इस बीच सोने का अधिकार(Right to Sleep) भी चर्चाओं में रहता है। ऐसे में क्या आप जानते हैं कि क्या सोने का अधिकार मौलिक अधिकारों में है या नहीं? जानने के लिए यह लेख पढ़ें।
क्या ‘Right to Sleep’ है मौलिक अधिकार ?
आपको बता दें कि सोने का अधिकार यानि कि ‘Right to Sleep’ एक मौलिक अधिकार(Fundamental Right) माना जाता है। हमारे संविधान में इसे सीधे तौर पर नहीं लिखा गया है, बल्कि सुप्रीम कोर्ट ने अनुच्छेद 21 के तहत इसकी व्याख्या की है।
इस अनुच्छेद के तहत हमें जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार की गारंटी मिलती है।
क्यों और कब आया अधिकार
आपको साल 2011 का दिल्ली का रामलीला मैदान वाला मामला याद ही होगा। इस दौरान पुलिस द्वारा रामलीला मैदान में धरने के दौरान आधी रात को सो रहे लोगों पर लाठियां बरसाई गईं थी। इसके बाद साल 2012 में यह अधिकार चर्चा में आया था।
क्या था फैसला ?
रामलीला मैदान बनाम गृह सचिव मामले में कोर्ट की ओर से कहा गया था कि नींद लेना एक मौलिक मानवीय आवश्यकता होती है। ऐसे में यह जीवन के अधिकार का हिस्सा है। कोर्ट ने यह माना था कि नींद में खलल डालना व्यक्ति के मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य को प्रभावित करता है। ऐसे में यह अनुच्छेद 21 का उल्लंघन भी करता है।
‘Right to Sleep’ का असली अर्थ क्या है ?
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‘Right to Sleep’ एक प्रकार का शांति का अधिकार है। इसके तहत रात के समय 10 बजे से लेकर सुबह 6 बजे तक किसी भी व्यक्ति और संस्था बिना अनुमति लिए तेज आवाज में गाने या फिर शोर नहीं मचा सकती, जिससे किसी अन्य व्यक्ति की नींद प्रभावित हो।
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पुलिस द्वारा किसी भी आरोपी या गवाह को पूरी रात सोने न देते हुए उससे पूछताछ भी नहीं की जा सकती है। इसे प्रताड़ना माना जाता है।
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कोर्ट के मुताबिक, पर्याप्त नींद के बिना एक व्यक्ति स्वस्थ जीवन नहीं जी सकता है। ऐसे में इसे जीवन के अधिकार से जोड़ा गया है।
कब मान्य नहीं है ‘Right to Sleep’
‘Right to Sleep’ होने के बावजूद भी इसके कुछ मामलों में अपवाद देखे गए हैं। क्योंकि, यह मौलिक अधिकार का हिस्सा है, लेकिन इसे अपनी मर्जी से कभी भी और कहीं भी इस्तेमाल नहीं किया जा सकता हैः
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यदि कोई व्यक्ति किसी ऐसे पेशे में है, जहां कई बार रात में जागना जरूरी होता है, तो इस मामले में ‘Right to Sleep’ मान्य नहीं होगा।
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यदि आप इस अधिकार का उपयोग किसी ऐसे स्थान पर कर रहे हैं, जिससे किसी को बाधा हो रही है या फिर यह सार्वजनिक सुरक्षा के लिए नहीं है, तो इसका दावा नहीं किया जा सकता है।
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