भारत का इतिहास उठाकर देखें, तो हमें अलग-अलग सुल्तानों का राज देखने को मिलता है। यही वजह है कि दिल्ली को सात बार बसाया गया और सात बार उजाड़ा गया। इस कड़ी में दिल्ली में कभी एक ऐसे सुल्तान का भी राज रहा है, जिसने कब्रों के ऊपर गुंबद बनाकर मकबरे बनवाने की शुरुआत की थी। आज इस सुल्तान को 'मकबरों का जनक' भी कहा जाता है। इस लेख में हम विस्तार से जानेंगे।
किसे कहा जाता है 'मकबरों का जनक'
अब हम यह जान लेते हैं कि आखिर किस सुल्तान को 'मकबरों का जनक' कहा जाता है। आपको बता दें कि यह उपाधि दिल्ली सल्तनत के गुलाम वंश के तीसरे शासक शम्सुद्दीन इल्तुतमिश को 'मकबरों का जनक' कहा जाता है। इल्तुतमिश ने भारत के इतिहास इस्लामी मकबरे को बनवाना शुरू किया था। अब हम इस बारे में विस्तार से जानेंगे।
Related Stories
क्यों कहा जाता है 'मकबरों का जनक'
दिल्ली में साल 1231 ईस्वी में इल्तुतमिश ने दिल्ली में भारत के इस्लामी मकबरे का निर्माण करवाया था, जिसे 'सुल्तानगढ़ी का मकबरा' के नाम से जाना जाता है। उन्होंने कब्र के ऊपर गुंबर निर्माण शुरू करवाया, जिसेक बाद इतिहासकारों द्वारा उन्हें 'मकबरों का जनक' की उपाधि दी गई।
भारत का पहला मकबरा
भारत का पहला मकबरा सुल्तानगढ़ी का मकबरा है। इल्तुतमिश ने इस मकबरे का निर्माण अपने बड़े बेटे नासिरुद्दीन महमूद की याद में कराया था। नासिरुद्दीन महमूद बंगाल के गवर्नर हुआ करते थे। साल 1229 ईस्वी में कम समय में उनकी मृत्यु हो गई। ऐसे में अपने बेटे के दुख में डूबे सुल्तान ने दिल्ली के वसंत कुंज क्षेत्र के पास इस मकबरे का निर्माण कराया था।
किले की वास्तुकला
यह मकबरा बाहर से दिखने में छोटा किला जैसा दिखता है, जिसके चारों ओर बुर्ज बने हुए हैं। यहां की खास बात तहखाना है। नासिरुद्दीन की कब्र तहखाने में बनी हुई है, जिसके ऊपर चबूतरा बना हुआ है। मकबरे का निर्माण लाल बलुआ पत्थर और ग्रेनाइट से किया गया है।
इल्तुतमिश का मकबरा
इल्तुतमिश ने लगभग 1235 ईस्वी में दिल्ली के कुतुब मीनार परिसर में अपने खुद के मकबरे का निर्माण भी शुरू करवाया था। यह एक चौकोर इमारत है, जिसके अंदर की दीवारों पर कुरान की आयतें बहुत ही बारीक तरीके से उकेरी गई हैं।
