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भारत में प्राकृतिक वनस्पति

प्राकृतिक वनस्पति का मतलब है वह वनस्पति जो मनुष्य द्वारा विकसित नहीं की गयी है । यह मनुष्यों से मदद की जरूरत नहीं है और जो कुछ भी पोषक तत्व इन्हें चाहिए, प्राकृतिक वातावरण से ले लेते है। जमीन की ऊंचाई और वनस्पति की विशेषता के बीच एक करीबी रिश्ता है। ऊंचाई में परिवर्तन के साथ जलवायु परिवर्तन होता है और जिसके कारण प्राकृतिक वनस्पति का स्वरुप बदलता है।
Aug 11, 2016 15:21 IST
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प्राकृतिक वनस्पति का मतलब है वह वनस्पति जो मनुष्य द्वारा विकसित नहीं की गयी है । यह मनुष्यों से मदद की जरूरत नहीं है और जो कुछ भी पोषक तत्व इन्हें चाहिए, प्राकृतिक वातावरण से ले लेते है। जमीन की ऊंचाई और वनस्पति की विशेषता के बीच एक करीबी रिश्ता है। ऊंचाई में परिवर्तन के साथ जलवायु परिवर्तन होता है और जिसके कारण प्राकृतिक वनस्पति का स्वरुप बदलता है। वनस्पति का विकास तापमान और नमी पर निर्भर करता है। यह मिट्टी की मोटाई और ढलान जैसे कारकों पर भी निर्भर करता है। इसे तीन विस्तृत श्रेणियों में वर्गीकृत किया गया है: वन, घास स्थल और झाड़ियां।

उष्णदेशीय सदाबहार वन

इन्हें उष्णकटिबंधीय वर्षावन भी कहा जाता है और ये  भूमध्य रेखा के पास के क्षेत्रों में और कटिबंधों के करीब पाये जाते है। यह क्षेत्र गरम होते हैं और यहाँ साल भर भारी वर्षा होती है। इन जंगलों को सदाबहार कहा जाता है क्योंकि इनके पत्ते कभी नहीं झड़ते हैं। पक्की लकड़ी वाले पेड़ जैसे शीशम, आबनूस और महोगनी यहां काफी मात्रा में पाये जाते हैं। भारत में इनका वर्गीकरण इस प्रकार है - पूर्वोत्तर भारत, पश्चिमी घाट के पश्चिमी ढलान, अंडमान एवं निकोबार द्वीप समूह।

उष्णदेशीय पतझड़ी वन

ये वर्षाकालिक वन हैं जो भारत के काफी हिस्सों में पाये जाते हैं, जैसे कि पश्चिमी घाट के पूर्वी ढलान पर, हिमालय के तराई क्षेत्र पर, बिहार, उत्तर प्रदेश, उड़ीसा, पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और मध्य प्रदेश। ये पेड़ पानी के संरक्षण के लिए शुष्क मौसम में अपने पत्ते गिरा देते हैं। साल, सागौन, नीम और शीशम पक्की लकड़ी वाले  पेड़ हैं जो इन जंगलो में पाये जाते हैं। बाघ, शेर, हाथी, लंगूर और बंदर इन क्षेत्रों में पाये जाने वाले आम जानवर हैं।

उष्णदेशीय शुष्क पतझड़ी वन

यह वनस्पति उन क्षेत्रों में पायी जाती है जहां वार्षिक वर्षा 50 और 100 सेमी के बीच होती है। यह पूर्वी राजस्थान, उत्तरी गुजरात, पश्चिमी मध्य प्रदेश, दक्षिण-पश्चिमी उत्तर प्रदेश, दक्षिण पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी घाट के बारिश वाले क्षेत्र में पाये जाते है।

रेगिस्तान और अर्द्ध शुष्क वनस्पति

इस तरह की वनस्पति 50 सेमी से कम वर्षा वाले क्षेत्रों में पायी जाती है। यहां पेड़ छोटी झाड़ियों के रूपों में होते हैं। आम तौर पर उनकी अधिकतम ऊंचाई 6 सेमी तक होती है। इन पेड़ों की जड़ें गहरी, मोटी और पत्तियां कांटेदार होती है। यह वनस्पति पश्चिमी राजस्थान, उत्तरी गुजरात और पश्चिमी घाट के बारिश वाले क्षेत्र में पायी जाती  है।

सदाबहार वनस्पति

यह समुद्र-तट और निचले डेल्टा क्षेत्रों में पाया जाता है। इन क्षेत्रों में, उच्च धारा की वजह से खारा पानी फैलता है। यहाँ मिट्टी दलदली होती है। गंगा- ब्रह्मपुत्र डेल्टा, महानदी, कृष्णा, गोदावरी, कावेरी आदि नदियों के डेल्टा क्षेत्र और पूर्वी और पश्चिमी तट के कुछ हिस्से इस वनस्पति के तहत आते है।

नम उप-उष्णदेशीय पर्वतीय वनस्पति

यह वनस्पति 1070-1500 मीटर की ऊंचाई पर प्रायद्वीपीय भारत में पाया जाता है। यह वनस्पति सदाबहार है। पेड़ों की लकड़ी लगभग नरम होती हैं। यह पश्चिमी घाट, पूर्वी घाट, नीलगिरी, कार्डामम हिल्स और अन्नामलाई की पहाडी जैसे क्षेत्रों में पाया जाती है।

नम शीतोष्ण पर्वतीय वनस्पति

यह वनस्पति 1500 मीटर की ऊंचाई पर पायी जाती है। यह ज्यादातर प्रायद्वीपीय भारत में पायी जाती है। इसके जंगल बहुत घने नहीं होते। वहाँ सतह पर झाड़ियां होती हैं। यह अन्नामलाई की पहाड़ियों, नीलगिरि और पालनी में पाया जाता है। इस जंगल के मुख्य पेड़ हैं - मैगनोलिया, युकलिप्टुस, और एल्म।

हिमालयी वनस्पति

ऊंचाई में भिन्नता के अनुसार कई तरह की प्रजातियां इन पहाड़ों में पायी जाती है। ऊंचाई में वृद्धि के साथ, तापमान में गिरावट आती है। 1500 मीटर से लेकर 2500 मीटर तक की ऊंचाई के बीच के पेड़ों का आकार शंकु की तरह होता है। चीड़, पाइन और देवदार महत्वपूर्ण शंकुधारी पेड़ हैं जो इन जंगलों में पाए जाते हैं।