अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में उतार चढ़ाव और पेट्रोल डीजल के बढ़ते दामों के बीच भारत अब ऐसे ईंधन विकल्पों पर जोर दे रहा है, जो लोगों के फ्यूल खर्च को कम करें और पर्यावरण के लिए भी बेहतर साबित हों. इसी वजह से इन दिनों फ्लेक्स फ्यूल टेक्नोलॉजी चर्चा के केंद्र में है। सरकार से लेकर ऑटोमोबाइल कंपनियां तक इसे भारत के भविष्य के ईंधन के रूप में देख रही हैं.
दिलचस्प बात यह है कि 5 जून 2026 को विश्व पर्यावरण दिवस के मौके पर देश की पहली फ्लेक्स-फ्यूल कार लॉन्च होने जा रही है। वहीं पहली फ्लेक्स-फ्यूल मोटरसाइकिल भी बाजार में दस्तक देने के लिए तैयार है। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर फ्लेक्स फ्यूल क्या है और इससे आम लोगों को क्या फायदा होगा?
क्या होता है फ्लेक्स फ्यूल?
सरल भाषा में कहें तो फ्लेक्स फ्यूल ऐसी तकनीक है, जिसमें वाहन का इंजन केवल पेट्रोल से ही नहीं, बल्कि पेट्रोल और एथेनॉल के अलग अलग मिश्रणों पर भी चल सकता है. एथेनॉल एक बायोफ्यूल है, जिसे गन्ने, मक्का और अन्य कृषि उत्पादों से तैयार किया जाता है। यही वजह है कि इसे पारंपरिक ईंधनों की तुलना में अधिक पर्यावरण-अनुकूल माना जाता है।
फ्लेक्स फ्यूल वाहन E10, E20, E85 और यहां तक कि E100 यानी 100 प्रतिशत एथेनॉल पर भी चलने में सक्षम होते हैं.
अचानक क्यों बढ़ गई चर्चा?
फ्लेक्स फ्यूल को लेकर चर्चा इसलिए तेज हुई है क्योंकि भारत अब इस तकनीक को बड़े स्तर पर अपनाने की दिशा में कदम बढ़ा रहा है। सरकार का मानना है कि इससे देश की तेल आयात पर निर्भरता घटेगी, प्रदूषण कम होगा और लोगों का ईंधन खर्च भी घट सकता है।
हाल ही में केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने घोषणा की कि 5 जून को देश की पहली फ्लेक्स फ्यूल कार लॉन्च होगी, जो E100 ईंधन पर चल सकेगी। इसके अलावा दोपहिया वाहन क्षेत्र में भी फ्लेक्स फ्यूल बाइक लॉन्च होने जा रही है।
कैसे कम हो सकता है फ्यूल खर्च?
फ्लेक्स फ्यूल को लेकर सबसे ज्यादा दिलचस्पी इसकी लागत को लेकर है। एथेनॉल की कीमत आमतौर पर पेट्रोल से कम होती है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह पेट्रोल के मुकाबले लगभग 30 से 35 रुपये प्रति लीटर तक सस्ता पड़ सकता है। ऐसे में अगर वाहन ज्यादा एथेनॉल मिश्रित ईंधन पर चलता है तो कुल ईंधन खर्च में अच्छी बचत हो सकती है।
हालांकि एथेनॉल में पेट्रोल की तुलना में ऊर्जा क्षमता थोड़ी कम होती है, इसलिए वाहन प्रति किलोमीटर थोड़ा अधिक ईंधन खपत कर सकता है। लेकिन कम कीमत के कारण कुल खर्च फिर भी कम रहने की संभावना रहती है।
किसानों को भी मिलेगा फायदा
फ्लेक्स फ्यूल सिर्फ वाहन मालिकों के लिए ही नहीं, बल्कि किसानों के लिए भी एक बड़ा अवसर बन सकता है। एथेनॉल का उत्पादन मुख्य रूप से गन्ने और अन्य कृषि फसलों से किया जाता है। ऐसे में इसकी मांग बढ़ने से किसानों को अपनी उपज का बेहतर बाजार मिल सकता है और उनकी आय में भी वृद्धि हो सकती है।
साथ ही भारत को विदेशी तेल खरीदने पर कम खर्च करना पड़ेगा, जिससे देश की अर्थव्यवस्था को भी फायदा होगा।
पर्यावरण के लिए कैसे बेहतर?
पेट्रोल और डीजल जैसे जीवाश्म फ्यूल के जलने से कार्बन उत्सर्जन और कई हानिकारक गैसें निकलती हैं, जो वायु प्रदूषण का बड़ा कारण हैं। इसके मुकाबले एथेनॉल अपेक्षाकृत स्वच्छ ईंधन माना जाता है। इसके इस्तेमाल से प्रदूषण और कार्बन उत्सर्जन को कम करने में मदद मिल सकती है। यही कारण है कि दुनिया के कई देश बायोफ्यूल को बढ़ावा दे रहे हैं।
क्या है भारत की बड़ी योजना?
पीएम मोदी ने के नेतृत्व में भारत पहले ही E20 यानी 20 प्रतिशत एथेनॉल मिश्रण की दिशा में तेजी से आगे बढ़ चुका है। अब सरकार भविष्य में E85 और E100 जैसे उच्च एथेनॉल मिश्रण वाले ईंधनों को बढ़ावा देने की योजना पर काम कर रही है।
इस दिशा में टाटा मोटर्स, मारुति सुजुकी, महिंद्रा, टोयोटा और होंडा जैसी कई बड़ी कंपनियां फ्लेक्स-फ्यूल वाहनों पर काम कर रही हैं।
क्या बदल सकता है भारत का फ्यूल भविष्य?
फ्लेक्स फ्यूल कोई चमत्कारी समाधान नहीं है, लेकिन यह निश्चित रूप से पेट्रोल-डीजल पर निर्भरता कम करने की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है। यदि एथेनॉल उत्पादन और वितरण का नेटवर्क मजबूत होता है, तो आने वाले वर्षों में वाहन चलाना पहले से सस्ता, पर्यावरण के लिए बेहतर और देश के लिए अधिक आत्मनिर्भर बनाने वाला साबित हो सकता है।
