आगरा के ताजमहल में हिंदू मंदिर तेजो महालय मंदिर होने का दावा इलाहाबाद हाई कोर्ट पहुंच गया है। कोर्ट ने इस मामले में सर्वे के लिए एडवोकेट कमीशनर नियुक्त करने की मांग को लेकर दाखिल याचिका पर केंद्र और एएसआई को जवाबी हलफनामा दाखिल करने की अनुमति दी है। यह आदेश न्ययमूर्ति रोहित रंजन अग्रवाल ने कोर्ट में लॉर्ड श्री अग्नेश्वर नागनाथेश्वर विराजमान तेजो महालय मंदिर और हरि शंकर जैन समेत अन्य दाखिल याचिकाओं पर दिया गया है।
क्या है तेजो महालय का विवाद
याचिकाकर्ताओं ने ताज महल परिसर में प्राचीन शिव मंदिर होने का दावा किया है। उनके मुताबिक, ताज महल परिसर में देवता अग्नेश्वर महादेव नागनाथेश्वर स्थापित हैं, जिन्हें 1155-56 ईस्वी में राजा परमर्दि देव द्वारा बनवाया गया था। बाद में यह जगह राजा मान सिहं के हाथ में चली गई थी और इनके बाद 17वीं सदी में इस जगह पर जयपुर के राजा जय सिंह का अधिकार हो गया था।
याचिकाकर्ताओं का दावा है कि मुगल शासक शाहजहां ने जय सिंह से यह जगह ले ली थी और इस पर मुमताज महल का मकबरा बनवा दिया। स्मारक में कई बदलाव किए गए हैं। याचिकाकर्ताओं का दावा है कि यहां 109 ऐसे पुरातात्विक सुबूत हैं, जो कि यह साबित करते हैं कि यह हिंदू मंदिर हुआ करता था।
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आगरा में 2015 से लंबित है मामला
आगरा की दीवानी अदालत में 2015 से आगरा के ताज महल का मामला लंबित है। इस मामले में यह घोषणा करने की मांग हुई थी कि ताज महल में प्राचीन शिव मंदिर है। मुकदमे में याचिकाकर्ताओं ने ताज महल का वैज्ञानिक सर्वेक्षण कराने और फोटोग्राफी के लिए एडवोकेट कमिश्नर नियुक्त करने की याचिका दी थी, जिसे खारीज कर दिया गया था।
इसके बाद रिविजन डाला गया, जिसे जिला जज ने पोषणीय न होने का कारण देते हुए दोबारा से खारिज कर दिया गया था। आपको बता दें कि विवादित संपत्ति के दक्षिण-पूर्वी कोने पर बनी एक संरचना को एएसआई के रिकॉर्ड में एक गौशाला के रूप में दर्ज किया गया है। ऐसे में यहां विवाद और भी बढ़ जाता है।
सुप्रीम कोर्ट का क्या है रूख
ताज महल के विवाद को लेकर सुप्रीम कोर्ट अपना रूख पहले ही स्पष्ट कर चुका है। साल 2022 में यहां ताज महल के नीचे बने 22 कमरों के खोलने की PIL याचिका डाली गई थी, जिससे हिंदू मंदिर का सच पता चल सके। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने इसे प्रचार के लिए दायर याचिका माना था और कहा था कि सदियों से चले आ रहे इतिहास को वैसे ही रहने दिया जाए।
फिर इलाहाबाद हाई कोर्ट क्यों पहुंचा मामला
अब आप सोच रहे होंगे कि जब सुप्रीम कोर्ट इस मामले में अपना मत स्पष्ट कर चुका है, तो इलाहाबाद हाई कोर्ट मामला कैसे पहुंच गया? दरअसल, सुप्रीम कोर्ट में 2022 में एक PIL दायर की गई थी, जो कि खारिज कर दी गई थी।
वहीं, इलाहाबाद हाई कोर्ट में पहुंचा मामला एक दीवानी मामला है, जो कि आगरा कोर्ट में 2015 से चल रहा है। इस वजह से इस मामले पर कोर्ट अलग से सुनवाई कर रहा है। यह मामला निजी तौर पर दर्ज किया गया है, जिसमें याचिकाकर्ता ने खुद को शिव का भक्त बताते हुए पूजा के अधिकार की मांग की है।
