भारत की आधिकारिक करेंसी रुपया है। इसका चलन आज का नहीं है, बल्कि 16वीं शताब्दी का है। भारत में रुपया चलन का श्रेय इतिहास के उस शासक को जाता है, जिसने मुगलों को भी हरा दिया था। हालांकि, बांदा किले की घेराबंदी के दौरान एक तोप का गोला उनके पास आकर गिरा और उनकी मौत हो गई। इस लेख में हम रुपया और इसके चलन व चलाने वाले शासक के बारे में विस्तार से जानेंगे।
भारत में कब और किसने चलाया रुपया
भारत में आधिकारिक रूप से रुपया का चलन वर्ष 1540 से 1545 के बीच हुआ था। इसे शुरू करने का श्रेय सूर राजवंश के संस्थापक और महान शासक शेरशाह सूरी को जाता है। सूरी ने जब हुमायूं को हराकर दिल्ली के गद्दी संभाली, तो भारत की अर्थव्यवस्था और व्यापार को सुधारने के लिए मुद्रा सुधार किए थे।
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कैसे हुई 'रुपया' शब्द की उत्पत्ति
रुपया शब्द के इतिहास की बात करें, तो यह संस्कृत के शब्द 'रुप्यकम्' आया है, जिसका अर्थ "चांदी का सिक्का" या "गढ़ी हुई चांदी" होता है। भारत के इतिहास में मौर्य काल में चाणक्य ने अपने ग्रंथ 'अर्थशास्त्र' में चांदी के सिक्कों के लिए 'रूप्य रूप' शब्द का प्रयोग किया है, लेकिन एक मानक और मुद्रा के नाम के रूप में 'रुपया' शब्द का पहली बार प्रयोग शेरशाह सूरी के काल में ही शुरू हुआ था।
शेरशाह सूरी ने क्या किए मुद्रा सुधार
दिल्ली में शेरशाह सूरी के शासनकाल से पहले तांबा और चांदी को मिलाकर सिक्के तैयार किये जाते थे, जिन्हें टका या जीतल कहा जाता था। हालांकि, इनका कोई निश्चित मानक नहीं था। ऐसे में व्यापार में काफी असुविधा होती थी।
शेरशाह सूरी ने जब दिल्ली की गद्दी संभाली, तो पुरानी मुद्राओं को बंद कर दिया और 'त्रि-धातु' सिस्टम की शुरुआत की, जिसमें सोना, चांदी और तांबे के अलग-अलग सिक्के ढाले गए। इस कड़ी में उन्होंने चांदी का एक शुद्ध सिक्का जारी किया, जिसे 'रुपया' नाम दिया गया था।
रुपये की मुख्य विशेषताएं
-सूरी द्वारा जारी किया गया रुपया का सिक्का 11.66 ग्राम का होता था। इसमें करीब 91.5% शुद्ध चांदी होती थी।
-इन सिक्कों के एक तरफ इस्लाम का कलमा और चारों खलीफाओं के नाम होते थे, तो दूसरी तरफ शेराशाह सूरी का नाम फारसी और देवनागरी लिपी में लिखा होता था।
-सूरी ने रोज के लेन-देन करने के लिए तांबे का सिक्का भी चलाया, जिसे दाम या पैसा कहा जाता था। आपको बता दें कि एक रुपये में कुल 40 दाम होते थे।
-बाद में मुगलों ने भी रुपया को अपनाया और चांदी के सिक्कों का निर्माण करवाया। वहीं, ब्रिटिश भारत में भी रुपया को अपनाया गया और इसके मानक बनाए रखे गए। वर्ष 1835 में अंग्रेजों ने 'कॉपर कलेक्टिव कॉइनेज एक्ट' के तहत पूरे भारत के लिए एक समान रुपया जारी किया।
