भारत में आपने श्रापित गांव से मशहूर ‘कुलधरा’ के बारे में जरूर सुना या पढ़ा होगा। यह गांव राजस्थान के जैसलमेर में स्थित है, जिसके बारे में कहा जाता है कि यह गांव एक ही रात में खाली हो गया था। इस गांव के लोगों ने गांव को श्राप दिया और यहां से चले गए।
आज यहां खंडहर रह गए हैं, जिन्हें देखने के लिए दूर-दूर से पर्यटक पहुंचते हैं। हालांकि, शाम होने के बाद कोई भी पर्यटक यहां नहीं रूकता है। कुछ लोग इसे भूतिया गांव बताते हैं, लेकिन क्या है इसके पीछे का सच और गांव का इतिहास, जानने के लिए यह लेख पढ़ें।
किसने बसाया था कुलधरा गांव
कुलधरा गांव के इतिहास को देखें, तो यहां राजस्थान के पाली जिले से कुछ ब्राहाम्ण आए थे, जिन्होंने कुलधरा समेत 84 गांव बसाए थे। राजस्थान के थार रेगिस्तान के पास उन्होंने न सिर्फ गांव बसाए, बल्कि वॉटर हार्वेस्टिंग का एक मजबूत सिस्टम भी बनाया था, जिससे वर्षा के पानी को जमा कर उपयोग में लाया जाता था। साथ ही, यहां साल में दो बार खेती भी होती थी।
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व्यापार का केंद्र हुआ करता था कुलधरा गांव
पाली ब्राह्मणों ने यहां आकर गांव बसाने के साथ-साथ खुद को भी समृद्ध किया था। उन्होंने यहां से व्यापार करना शुरू किया और धीर-धीरे यहां अन्य राज्यों से व्यापारी भी आने लगे थे। कुछ समय बाद यह गांव राजस्थान के प्रमुख व्यापारिक केंद्रों में से एक हो गया था।
जैसलमेर के दीवान सालीम सिंह से परेशान थे ग्रामीण
15वीं-16वीं शताब्दी में जैसलमेर के दीवान सालीम सिंह हुआ करते थे। वह पूरे जैसलमेर से टैक्स इकट्ठा करते थे। उस समय में उनकी हवेली पूरे जैसलमेर में सबसे भव्य हवेलियों में से एक थी। अधिक टैक्स की वजह से ग्रामीण उनसे परेशान थे।
क्यों खाली हो गया था कुलधरा गांव
कुलधरा गांव के खाली होने के पीछे एक नहीं, बल्कि कई कारण थे। दरअसल, यहां 300 साल पहले बहने वाली काक नदी पर ग्रामीणों ने बांध बना दिया था, जिससे समय के साथ-साथ नदी का पानी सूखता चला गया था।
वहीं, नदी के सूखने की वजह से गांव के कुएं भी खाली हो रहे थे। पानी की कमी की वजह से यहां का व्यापार भी कम हो गया था, जिससे कुछ लोग यहां से चले गए थे। ऐसे में सालीम सिंह ने यहां रहने वाले लोगों से अधिक टैक्स लेना शुरू कर दिया था। वहीं, रात के समय यहां डाकू भी ग्रामीणों को लूट लेते थे। इन सभी कारणों को देखते हुए लोगों ने अपने घरों को छोड़ना शुरू कर दिया था।
एक रात में खाली नहीं हुआ गांव
कुलधरा गांव एक रात में खाली नहीं हुआ था, बल्कि यहां से धीरे-धीरे लोगों ने पलायन किया था। कर्नल जेम्स टोड ने अपनी किताब ‘एनल्स एंड इंटीक्विटिज ऑफ राजस्थान’ में राजस्थान की घटनाओं का जिक्र किया है। उन्होंने लिखा है कि 15 से 16वीं शताब्दी में यहां 1588 लोग रहते थे और 1815 में यहां 800 लोग थे। ऐसे में यहां लोगों का पलायन एक साथ नहीं हुआ, बल्कि बहुत समय बाद तक लोग रहते रहे हैं।
कहां गए गांव के लोग
अलग-अलग स्रोतों के मुताबिक, यहां रहने वाले कुछ लोग जोधपुर चले गए थे, क्योंकि यह सालीम सिंह की उत्तराधिकार क्षेत्र से बाहर था। वहीं, कुछ लोगों ने उत्तराखंड समेत अन्य राज्यों में पलायन किया था।
ASI द्वारा है संरक्षित
आज इस गांव को भारतीय पुरातत्व विभाग ने अपनी देखरेख में ले रखा है। यहां पर्यटक पहुंचते हैं, जिन्हें गाइड द्वारा अलग-अलग कहानियां सुनाई जाती हैं। हालांकि, तथ्यों पर आधारित इस गांव की कहानी अलग है।
