छत्तीसगढ़ को 36 किलों का गढ़ कहा जाता है। यह राज्य अपनी विविध संस्कृति और अनूठी परंपराओं के लिए जाना जाता है। इसके अलावा यहां का समृद्ध इतिहास इसे अन्य राज्यों से अलग बनाता है। इतिहास को समृद्ध बनाने में यहां के किलों का भी महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है। इस कड़ी में यहां एक किला ऐसा भी है, जिसे राज्य का सबसे पुराना किला होने का गौरव प्राप्त है।
यह किला आज भी आपनी पुरानी शान से खड़ा हुआ है, जिसके बारे में आज भी राज्य के इतिहास के पन्नों में पढ़ा जा सकता है। इस लेख में हम छत्तीसगढ़ के सबसे पुराने किले के बारे में जानेंगे।
छत्तीसगढ़ का सबसे पुराना किला कौन-सा है
अब हम छत्तीसगढ़ के सबसे पुराने किले के बारे में जान लेते हैं। आपको बता दें कि चैतुरगढ़ के किले की पहचान छत्तीसगढ़ के सबसे पुराने किले के तौर पर होती है। इस किले को ‘लाफागढ़’ नाम से भी जाना जाता है।
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किसने किया था किले का निर्माण
किले का इतिहास देखें, तो यह नागवंशी शासकों के समय से अस्तित्व में रहा है। हालांकि, बाद में 11वीं शताब्दी में कलचुरी राजवंश ने राज किया। इस राजवंश के राजा पृथ्वीदेव प्रथम द्वारा किले को और भी मजबूत बनाया गया था।
किले की प्राकृतिक दीवारें
लाफागढ़ को भारत के सबसे मजबूत किलों में गिना जाता है। यहां किले के चारों ओर एक गहरी खाई बनाई गई है और किले के सामने विशाल चट्टाने मौजूद हैं। यही वजह है कि इस किले को किसी भी दुश्मन द्वारा जीतना बहुत मुश्किल था।
3600 मीटर की ऊंचाई पर है किला
चैतुरगढ़ का किला एक पहाड़ी पर 3600 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। यह राज्य के कोरबा जिला से 70 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। यह राजस्थान के पाली से भी कुछ किलोमीटर की दूरी पर बना हुआ है।
किले में मौजूद हैं ये 5 तालाब
चैतुरगढ़ का किला अपने 5 तालाबों के लिए भी जाना जाता है। यहां तीन तालाबों में हमेशा पानी रहता है, जबकि दो मानसून में भरते हैं। ये तालाब इस प्रकार हैंः
-सिंघी तालाब
-सूखी तालाब
-गर्गज तालाब
-भूखी डबरी
-कैकड़ा तालाब
इनमें गर्गज, सूखी और कैकड़ा तालाब में हमेशा पानी देखने को मिल जाएगा।
किले में महिषासुर मर्दिनी मंदिर है प्रमुख
इस किले में महिषासुर मर्दिनी मंदिर प्रमुख मंदिरों में शामिल है। यह 3600 फीट की ऊंचाई पर है। इस मंदिर को लेकर खास बात यह है कि बाहर चाहे कितनी भी गर्मी क्यों न हो, लेकिन मंदिर में तापमान बहुत ही कम रहता है। इस वजह से किले के इस स्थान को कश्मीर भी कहा जाता है। इस मंदिर में 12 हाथों वाली माता की आकृति चट्टानों में बनाई गई है, जिसे देखने के लिए बड़ी संख्या में पर्यटक पहुंचते हैं।
