उत्तर प्रदेश के प्रत्येक जिले की अपनी कहानी, इतिहास और अनूठी परंपराएं हैं। इन सभी से मिलकर एक नए उत्तर प्रदेश का निर्माण होता है। हालांकि, आज भी इसकी जड़ों में यहां का समृद्ध इतिहास देखने को मिलता है। इतिहास के कुछ पन्ने पलटें, तो हमें यहां दुनिया की सबसे बड़ी मेहराबदार इमारत भी देखने को मिलती है। यह इमारत अवध वास्तुकला का बेमिसाल नमूना भी कही जाती है। इस लेख में हम इस बारे में विस्तार से जानेंगे।
किस जिले में है सबसे बड़ी मेहराबदार इमारत
उत्तर प्रदेश की राजधानी यानि कि लखनऊ में दुनिया की सबसे बड़ी मेहराबदार इमारत मौजूद है। यह बड़ा इमामबाड़ा है, जो कि सिर्फ एक धार्मिक या ऐतिहासिक इमारत नहीं है, बल्कि यह मुगल और राजपूत स्थापत्य कला से अलग विकसित हुई 'अवध वास्तुकला' एक बेहतरीन उदाहरण मानी जाती है।
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इस नाम से भी जाना जाता है बड़ा इमामबाड़ा
आपको बता दें कि बड़ा इमामबाड़ा आसफी इमामबाड़ा के नाम से भी जाना जाता है। यह अपने इतिहास, इंजीनियरिंग तकनीक और रहस्यों के लिए दुनिया भर में मशहूर है।
क्यों किया गया था निर्माण
इसके निर्माण की बात करें, तो1783-84 के दौरान पूरे अवध क्षेत्र में भीषण अकाल पड़ा था। नवाब आसफुद्दौला लोगों को बिना काम दिए दान देकर उनके आत्मसम्मान को चोट नहीं पहुंचाना चाहते थे। नवाब ने इमामबाड़े का निर्माण शुरू करवाया। दिन में आम लोग इसे बनाते थे और रात में अमीर लोग पहचान छिपाकर इसे गिराते थे, ताकि निर्माण कार्य लंबा चले और अकाल के दौरान रोजगार मिलता रहे।
बिना खंभों के बना है सेंट्रल हॉल
इस इमारत में मुख्य केंद्रीय हॉल लगभग 50 मीटर लंबा, 16 मीटर चौड़ा और 15 मीटर ऊंचा है। इतनी बड़ी और भारी-भरकम छत को बिना किसी पिलर, लोहे की बीम या गर्डर के सहारा दिया गया है। इसे बनाने में लोहे या लकड़ी का प्रयोग नहीं हुआ है। यह पूरी तरह से छोटे आकार की लखौरी ईंटों और उड़द की दाल, गुड़, चूना, गोंद व बेल के गूदे से तैयार विशेष गारे के इंटरलोकिंग सिस्टम से बना है।
इमामबाड़े को लेकर कुछ खास बातें
-इमामबाड़े के हॉल की दीवारों पर यदि एक छोर पर माचिस की तीली भी जलाई जाए या हल्की फुसफुसाहट की जाए, तो वह 50 मीटर दूर दीवार के दूसरे छोर पर साफ सुनाई देती है।
-भूलभुलैया की खिड़कियों और गलियारों की बनावट इस तरह है कि दिन भर सूरज की रोशनी और हवा हर कोने तक पहुंचती है।
-कुछ लोग ऐसे भी कहते हैं कि इसके अंदर से कई गुप्त सुरंगें निकलती थीं जो सीधे अयोध्या, दिल्ली और कानपुर तक जाती थीं। हालांकि, यह अभी तक प्रमाणित नहीं है।
