कितने प्रकार की होती है याचिका, जानें यहां
याचिका एक औपचारिक लिखित कानूनी अनुरोध होता है। इसे किसी नागरिक, संस्था या वकील द्वारा न्यायलय या किसी हाई सरकारी अथॉरिटी के सामने प्रस्तुत किया जाता है।
आपने अक्सर याचिका के बारे में सुना या पढ़ा होगा। याचिका एक प्रकार का औपचारिक और लिखित कानूनी अनुरोध है, जिसे किसी नागरिक, संस्था या वकील द्वारा कोर्ट या किसी हाई सरकारी अथॉरिटी के सामने प्रस्तुत किया जाता है। सरल शब्दों में कहें, तो जब कोई व्यक्ति या समूह न्याय पाने, अपने अधिकारों की रक्षा करने या सरकार के किसी फैसले को चुनौती देने के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाता है, तो उस लिखित अपील को ही 'याचिका' कहा जाता है।
कितने प्रकार की होती है याचिका
कानूनी तौर पर याचिका अलग-अलग प्रकार की होती हैं, जिन्हें हम यहां नीचे समझेंगेः
रिट याचिका(Writ)
जब किसी नागरिक के मौलिक अधिकारों का हनन होता है, तो वह सीधे हाई कोर्ट या सुप्रीम कोर्ट में रिट याचिका दायर कर सकता है। सुप्रीम कोर्ट में संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत और हाई कोर्ट में संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत याचिका दायर होती है। इसके तहत पांच प्रकार की रिट जैसे बंदी प्रत्यक्षीकरण व परमादेश आदि जारी की जाती हैं।
जनहित याचिका (PIL-Public Interest Litigation)
यह सबसे प्रमुख याचिकाओं में से एक है। सामान्य याचिकाओं में पीड़ित व्यक्ति को ही अदालत जाना पड़ता है, लेकिन जनहित याचिका में अगर मुद्दा समाज के हित जैसे पर्यावरण प्रदूषण, बाल मजदूरी या भ्रष्टाचार का है, तो कोई भी जागरूक नागरिक या NGO अदालत में याचिका दायर कर सकता है। भारत में पीआईएल (PIL) का जनक पूर्व मुख्य न्यायाधीश जस्टिस पी.एन. भगवती को माना जाता है।
पुनर्विचार याचिका (Review Petition)
संविधान के अनुच्छेद 137 के तहत अगर किसी व्यक्ति को लगता है कि सुप्रीम कोर्ट के अंतिम फैसले में कोई स्पष्ट कानूनी गलती रह गई है, तो वह उसी फैसले पर फिर से विचार करने के लिए 'रिव्यू पिटीशन' दायर कर सकता है।
उपचारात्मक याचिका (Curative Petition)
जब किसी मामले में अंतिम फैसला आ चुका हो और उसकी पुनर्विचार याचिका भी खारिज हो गई हो, तब न्याय पाने का बिल्कुल अंतिम कानूनी विकल्प 'क्यूरेटिव पिटीशन' होता है। इसकी शुरुआत 2002 के ऐतिहासिक 'रूपा अशोक हुर्रा बनाम अशोक हुर्रा' केस से हुई थी।
दया याचिका (Mercy Petition)
जब सुप्रीम कोर्ट से भी फांसी या कोई कठोर सजा बरकरार रहती है, तो अपराधी राष्ट्रपति या राज्यपाल के सामने दया की गुहार लगा सकता है। अनुच्छेद 72 के तहत राष्ट्रपति को फांसी सहित किसी भी सजा को माफ करने की शक्ति होती है। वहीं, राज्यपाल के पास अनुच्छेद 161 के तहत राज्य के कानूनों के तहत सजा कम करने की शक्ति होती है, लेकिन वे फांसी की सजा पूरी तरह माफ नहीं कर सकते।
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