लोहा अक्सर पानी और ऑक्सीजन के साथ मिलकर रिएक्शन करता है। इससे लोहे पर जंग की कई परतें जम जाती है। हालांकि, क्या आप जानते हैं कि भारत में एक लोहे का पिलर ऐसा भी है, जिसका इतिहास हजारों साल पुराना है। इस पिलर में आज तक जंग नहीं लगा है। क्या आप जानते हैं कि यह पिलर कहां है और कौन-सा है, यदि नहीं, तो इस लेख के माध्यम से हम इस बारे में जानेंगे।
किस पिलर में आज तक नहीं लगा है जंग
दिल्ली के महरौली स्थित कुतुब मीनार परिसर में मौजूद लौह स्तंभ प्राचीन भारतीय धातु विज्ञान का एक ऐसा अद्भुत अजूबा है, जिसने दुनिया भर के आधुनिक वैज्ञानिकों को भी हैरत में डाल रखा है। 1,600 से अधिक साल से खुले आसमान के नीचे, कड़ी धूप, बारिश और प्रदूषण सहने के बावजूद इस लोहे के खंभे में आज तक जंग नहीं लगी है।
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क्या है इतिहास और कब हुआ था निर्माण
इतिहासकारों और स्तंभ पर ब्राह्मी लिपि में उकेरे गए संस्कृत लेखों के अनुसार, इसका निर्माण चौथी या पांचवीं शताब्दी ईस्वी में गुप्त साम्राज्य के दौरान हुआ था। इसे विशेष रूप से सम्राट चंद्रगुप्त विक्रमादित्य के शासनकाल में बनवाया गया था। माना जाता है कि भगवान विष्णु के सम्मान में मूल रूप से इसे मध्य प्रदेश के उदयगिरि में विष्णुपाद पहाड़ी पर स्थापित किया गया था, जिसे सदियों बाद दिल्ली लाया गया।
कितना बड़ा है लौह स्तंभ
यह लौहे का खंभा लगभग 7.2 मीटर यानि 23 फीट 8 इंच ऊंचा है और इसका वजन लगभग 6 टन है। इसे लोहे के किसी एक सांचे में ढालकर नहीं, बल्कि प्राचीन भारत की 'फोर्ज वेल्डिंग' (Forge Welding) तकनीक का इस्तेमाल करके लोहे के गर्म टुकड़ों को पीट-पीटकर जोड़ा गया था।
क्यों नहीं लगी है जंग
इस स्तंभ के जंग न खाने का रहस्य सुलझाने के लिए IIT Kanpur के धातुकर्म विशेषज्ञों ने 2002 में एक रिसर्च की थी। इस रिसर्च में इसके कभी खराब न होने के दो मुख्य वैज्ञानिक कारण सामने आए थे:
फास्फोरस की अधिकता: आधुनिक लोहे में फास्फोरस की मात्रा लगभग शून्य होती है। लेकिन, प्राचीन भारतीयों ने इस लोहे को पिघलाने के लिए कोयले के साथ चूने का उपयोग नहीं किया था, जिससे इसमें फास्फोरस की मात्रा बहुत अधिक लगभग 1 फीसदी रह गई। फास्फोरस लोहे को जंग लगने से बचाता है।
मिसावाइट की परत: लोहे में मौजूद फास्फोरस और हवा की नमी ने मिलकर इस स्तंभ के चारों ओर 'मिसावाइट' नामक एक बेहद पतली लेकिन मजबूत सुरक्षात्मक परत बना दी है। यह परत एक प्लास्टिक या पेंट की कोटिंग की तरह काम करती है, जो ऑक्सीजन और पानी को अंदर के लोहे के संपर्क में आने ही नहीं देती।
