इतिहास में सत्ता तक पहुंचने की कहानियां अक्सर राजघरानों और विरासत से जुड़ी होती हैं, लेकिन शम्सुद्दीन इल्तुतमिश (Shams ud-Din Iltutmish) की कहानी इससे बिल्कुल अलग है। कभी गुलाम के रूप में जीवन शुरू करने वाला यह व्यक्ति अपनी प्रतिभा, सैन्य कौशल और राजनीतिक समझ के दम पर दिल्ली की गद्दी तक पहुंचा। यही वजह है कि उसे सिर्फ एक सुल्तान नहीं, बल्कि दिल्ली सल्तनत को मजबूत नींव देने वाला शासक भी कहा जाता है।
गुलामी से दिल्ली की गद्दी तक का सफर
शम्सुद्दीन इल्तुतमिश (1211-1236 ई) दिल्ली सल्तनत का तीसरा सुल्तान था और उसे, इसका वास्तविक संगठक (Real Consolidator) कहा जाता है। इल्तुतमिश का जन्म मध्य एशिया के इलबरी तुर्क कबीले में हुआ था। बचपन में ही उसे गुलाम बना दिया गया, लेकिन उनकी असाधारण प्रतिभा ने जल्द ही उसे दूसरों से अलग पहचान दिलाई।
इल्तुतमिश ने पहले ग़ोरी शासकों और बाद में कुतुबुद्दीन ऐबक (गुलाम वंश का संस्थापक) का विश्वास जीता। उसकी योग्यता से प्रभावित होकर ऐबक ने अपनी पुत्री का विवाह उससे कर दिया। इस तरह एक गुलाम से शुरू हुआ उसका सफर धीरे-धीरे शाही परिवार तक पहुंच गया।
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अराम शाह को हराकर संभाली गद्दी
1210 ई. में कुतुबुद्दीन ऐबक की मृत्यु के बाद दिल्ली सल्तनत में सत्ता का संकट पैदा हुआ। अराम शाह के कमजोर नेतृत्व से असंतुष्ट तुर्क अमीरों ने इल्तुतमिश का साथ दिया। 1211 ई. में उसने अराम शाह को हराकर दिल्ली की गद्दी संभाली।
सिर्फ योद्धा नहीं, कुशल प्रशासक भी
सुल्तान बनने के बाद इल्तुतमिश ने समझ लिया था कि किसी राज्य को केवल युद्धों के दम पर लंबे समय तक नहीं चलाया जा सकता। इसके लिए मजबूत प्रशासन और आर्थिक व्यवस्था भी जरूरी है।
उन्होंने इक़्ता व्यवस्था को व्यवस्थित किया, योग्य अधिकारियों की नियुक्ति की और शासन को अधिक संगठित बनाया। आर्थिक व्यवस्था को मजबूती देने के लिए चांदी का टंका और तांबे का जीटल जारी किया।
विद्रोहों से लेकर मंगोल खतरे तक
इल्तुतमिश के सामने सत्ता संभालते ही कई चुनौतियां खड़ी थीं। उन्होंने ग़ज़नी के शासक यल्दोज़ को पराजित किया और बंगाल तथा सिंध जैसे विद्रोही क्षेत्रों पर दोबारा नियंत्रण स्थापित किया।
दिल्ली को बनाया सत्ता का केंद्र
इल्तुतमिश ने दिल्ली को केवल शासन की राजधानी नहीं रहने दिया, बल्कि इसे सत्ता, प्रशासन और संस्कृति के प्रमुख केंद्र के रूप में विकसित किया। उन्होंने कुतुब मीनार के निर्माण को आगे बढ़ाया और मस्जिदों, जलाशयों तथा अन्य सार्वजनिक निर्माण कार्यों को भी प्रोत्साहित किया।
बेटी रज़िया को बनाया उत्तराधिकारी
इल्तुतमिश अपने योग्य पुत्र नासिरुद्दीन महमूद को उत्तराधिकारी बनाना चाहते थे, लेकिन उसकी असामयिक मृत्यु हो गई। इसके बाद उन्होंने अपनी प्रतिभाशाली पुत्री रज़िया को उत्तराधिकारी घोषित किया। 1236 ई. में इल्तुतमिश की मृत्यु के बाद रज़िया ने दिल्ली की गद्दी संभाली।
क्यों याद किया जाता है इल्तुतमिश?
इल्तुतमिश का महत्व सिर्फ इस बात में नहीं है कि वह एक गुलाम से दिल्ली का सुल्तान बना। उसकी सबसे बड़ी उपलब्धि यह थी कि उसने दिल्ली सल्तनत को बिखरने से बचाकर उसे एक मजबूत राजनीतिक और प्रशासनिक व्यवस्था में बदला।
