भारत सरकार द्वारा समय-समय पर कई क्रांति की शुरुआत की गई है, जिनमें से एक गोल क्रांति है। इस क्रांति की शुरुआत 1960-70 के दशक में की गई थी, जो कि देशभर में आलू उत्पादन को बढ़ाने को लेकर थी। इसमें केंद्रीय आलू अनुसंधान संस्थान ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई थी, जिसके बाद मैदानी इलाकों में आलू उत्पादन में बढ़ोतरी हुई थी और आलू सब्जियों का राजा बन गया था।
‘गोल क्रांति’ का मुख्य उद्देश्य क्या था
गोल क्रांति का मुख्य उद्देश्य आलू उत्पादन में टेक्निकल सुधार कर फसलों की बर्बादी को रोकना और देश के प्रत्येक हिस्से में आलू की पहुंच को बढ़ाना था। इसके अलावा अन्य उद्देश्य इस प्रकार हैंः
-देशभर में आलू स्टोर करने के लिए कोल्ड स्टोरेज को बढ़ाना, जिससे आलू जल्दी खराब न हो।
-आलू की ऐसी प्रजातियों को उगाना, जो कि कम समय में उग सके और बीमारियों से भी बचे रहे।
-आलू को कम कीमत पर उपलब्ध करवाना, जिससे गरीब से गरीब व्यक्ति को भी कार्बोहाइड्रेट मिल सके।
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सीड प्लॉट तकनीक से मिला फायदा
गोल क्रांति को सफल बनाने में डॉ. पुष्कर नाथ की सीड प्लॉट तकनीक से फायदा मिला था। दरअसल, पहले भारत के मैदानी इलाकों में आलू उत्पादन करने के लिए पहाड़ों से बीज मंगवाए जाते थे, जिससे अधिक लागत भी आती थी और बीमारी से फसल भी खराब हो जाती थी, लेकिन सीड प्लॉट तकनीक के बाद से भारत के मैदानी इलाकों में ही आलू के बीज तैयार किये जाने लगे, जिससे यूपी, बिहार और हरियाणा में आलू का उत्पादन बढ़ा।
क्या रहे ‘गोल क्रांति’ के परिणाम
गोल क्रांति से पूरे देश को फायदा मिला। इसी के परिणाम हैं कि आज भारत, चीन के बाद दूसरा सबसे बड़ा आलू उत्पादक देश बन गया है। वहीं, राज्यों की बात करें, तो उत्तर प्रदेश देशभर में सबसे अधिक आलू उत्पादन करने वाला राज्य है। वहीं, पश्चिम बंगाल और बिहार इसके बाद आते हैं। इनके अलावा अन्य राज्यों में भी आलू का उत्पादन किया जाता है और हर रसोई तक आलू की पहुंच संभव हुई है। यही वजह है कि आलू को सब्जियों का राजा भी कहा जाता है। इसके साथ ही यह एक बड़ी नकदी फसल भी है।
नोटः कई बार परीक्षाओं में केंद्रीय आलू अनुसंधान संस्थान के बारे में पूछ लिया जाता है कि यह कहां पर स्थित है, तो इसका जवाब हिमाचल प्रदेश का शिमला शहर है।
