भारत के इतिहास में अंग्रेजों का शासनकाल 200 वर्षों का रहा है। यहां ब्रिटिश अधिकारियों ने समय-समय पर कई संधियों को लागू किया। संधियों के माध्यम से भारतीय रियासतों पर दबाव बनाया गया और
ब्रिटिश अधिकारियों ने धीरे-धीरे भारत का पूरा नियंत्रण ले लिया। इस कड़ी में ईस्ट इंडिया कंपनी की ओर से भारत में सहायक संधि को लागू किया गया। हालांकि, क्या आप जानते हैं कि भारत का वह शहर कौन-सा था, जिसने सबसे पहले सहायक संधि को अपनाया था, यदि नहीं, तो इस लेख के माध्यम से हम इस बारे में जानेंगे।
क्या थी सहायक संधि
सबसे पहले हम सहायक संधि के बारे में जान लेते हैं। दरअसल, सहायक संधि के तहत भारतीय राजाओं को अपनी खुद की सेना के बजाय ब्रिटिश सेना की एक टुकड़ी को अपने पास रखना होता था, जिसका पूरा खर्च राजा द्वारा उठाया जाता था।
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दरबार में होता था रेजिडेंट
सहायक संधि के तहत प्रत्येक दरबार में ब्रिटिश का एक रेजिडेंट होता था, जो कि राजा के फैसलों पर नजर रखता था।
नौकरी पर लगी थी रोक
भारतीय रियासतें ब्रिटिश के अलावा किसी अन्य यूरोपियों को अपने दरबार में नौकरी पर नहीं रख सकते थे, जिनमें फ्रांसीसी और डच शामिल थे।
बिना अनुमति युद्ध नहीं
राजा अंग्रेजों की आज्ञा के बिना युद्ध नहीं लड़ सकते थे, हालांकि अंग्रेजों ने बाहरी हमलों से रक्षा के लिए वादा किया था।
किसने लागू की थी सहायक संधि
सहायक संधि को भारत के गवर्नर-जनरल रहे लॉर्ड वेलेजली द्वारा 1798 में लागू किया गया था। वेलेजली का मुख्य उद्देश्य ब्रिटिश साम्राज्य का विस्तार करना था। भारत में फ्रांसीसी प्रभाव पूरी तरह खत्म हो और भारतीय रियासतें ब्रिटिश के नियंत्रण में हो सके, इसलिए इस संधि को लागू किया गया था।
किस शहर ने सबसे पहले अपनाई थी सहायक संधि
भारत में हैदराबाद के निजाम रहे निजाम अली खान ने 1798 में सहायक संधि को अपनाया था। इसके बाद 1799 में मैसूर और तंजावर व 1801 में अवध साम्राज्य में इस संधि को अपनाया गया था।
रियासतों पर क्या पड़ा प्रभाव
सहायक संधि अपनाने के बाद रियासतें अंदर से कमजोर हो गई थीं, क्योंकि उनके पास ब्रिटिश सेना थी, जिसका खर्च अधिक था। ऐसे में रियासतों पर अधिक आर्थिक बोझ पड़ रहा था। इस वजह से कई रियासतें कर्ज में डूब गई थीं और ब्रिटिश नियंत्रण में पूरी तरह चली गई थीं।
